REVIEW: साल 2016 की क्लासिक लव स्टोरी.. 'मिर्जिया'..
भारत में कई लोक कथाएं मशहूर है। उन्हीं में से एक कहानी पर बनी है 'रंग दे बसंती' फेम निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म 'मिर्जिया'.. मिर्जा और साहिबां की महान प्रेम कहानी.. हीर- रांझा, सोनी- महिवाल की तरह मिर्जा- साहिबां की प्रेम कहानी भी ट्रैजेडी से भरपूर है।
राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने इस कहानी को काफी 'खूबसूरती' के साथ बड़े पर्दे पर उतारा है। फिल्म की कहानी लिखी है गुलजार ने। जबकि फिल्म में मिर्जा के किरदार में हर्षवर्धन कपूर और साहिबां बनीं सायामी खेर ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

कहानी
पूरी फिल्म में दो सामानांतर कहानी चलती है। एक कहानी है मिर्जा- साहिबां की.. तो दूजी कहानी मोनिश- सुचित्रा की। लिहाजा, कहीं ना कहीं पहले ही आपको अंदाजा हो जाएगा कि अगली कहानी में, अगला सीन क्या होने वाला है। क्योंकि पहली कहानी में आपने वो देखी होती है।
खैर, मिर्जिया- साहिबां बचपन से एक दूसरे से बेहद इश्क करते थे। मिर्जिया का तीरअंदाजी में कोई ज़ोर नहीं था, तो साहिबां की खूबसूरती अपार। लेकिन जीवन-स्तर में अंतर होने की वजह से दोनों एक नहीं हो पाते। साहिबां की शादी किसी और से होने वाली होती है, तभी मिर्जिया वहां आता है और रात के अंधेरे में साहिबां को घोड़े पे बिठाकर भाग जाता है। रात में दोनों एक पेड़ के नीचे आराम करते हैं.. काफी समय बाद घोड़ों की टापों की आवाज से मिर्जिया की नींद खुलती है। लोग उनका पीछा करते हुए नजदीक पहुंच चुके थे और तीर से हमला करते हैं। मिर्जिया भी अपनी तीर निकालने की कोशिश करता है, लेकिन सारी तीर दो टुकड़ों में टूटी होती है.. तभी, एक तीर आकर मिर्जिया की छाती चीड़ जाती है.. मिर्जिया मरते मरते साहिबां की ओर सवालिए नजर देखता जाता है.. तभी दूसरी तीर आती है, जिसे साहिबां अपने ऊपर ले लेती है। सालों से लोग इस सवाल का जवाब ढ़ूंढ़ते आए हैं.. शायद यही सोचते सोचते राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने भी एक फिल्म बना डाली.. बहरहाल, साहिबां ऐसा क्यों करती है, इसका जवाब जानने के लिए आपको सिनेमाघर तक जाना होगा।
निर्देशक ने मिर्जा- साहिबां की कहानी को नए जमाने के प्रेमी से जोड़कर दिखाया है। जोधपुर में रह रहे मोनिश- सुचित्रा की कहानी.. इनकी कहानी सबकुछ वैसे ही है, जैसा मिर्जा- साहिबां.. फिल्म का अंत और शानदार दिखाया जा सकता था.. जब मोनिश सामने वाले पर गोली चलाने के लिए अपनी बंदूर उठाता है, लेकिन उसमें एक भी बुलेट नहीं होती.. वह सुचित्रा की ओर सवालिए निगाहों से देखता है, तभी एक गोली आकर उसे लग जाती है। सुनकर यह काफी दर्दभरा लगता है.. लेकिन अफसोस यह सीन कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाया।
निर्देशन
मिर्ज़िया साल 2016 की सबसे खूबसूरत फिल्म मानी जा सकती है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा इसी खूबसूरती के बीच कहानी को दिलचस्प बनाना भूल गए। पूरी फिल्म में हर्षवर्धन और सैयामी का एक भी सीन प्रभाव नहीं छोड़ता।
अभिनय
पूरी फिल्म में हर्षवर्धन (मिर्जिया+ मोनिश) और सायामी (साहिबां+ सुचित्रा) ने दो किरदार निभाए हैं। डेब्यू फिल्म की नजर से देंखे तो दोनों ने बेहतरीन काम किया है। लेकिन कहीं ना कहीं, हर्षवर्धन कपूर को अपने ऊपर और काम करने की जरूरत है। जबकि सर्पोटिंग किरदारों में ओम पुरी, अनुज चौधरी, आर्ट मलिक ने अच्छा काम किया है।
संगीत
फिल्म का संगीत शंकर- एहसान- लॉय ने दिया है। जो कि बेहतरीन है। दलेर मेंहदी की आवाज में बैकग्राउंड में बज रह गाने काफी अच्छे हैं। हालांकि कहीं कहीं पर गाने कहानी को काटते भी दिखेंगे। फिल्म कविता की तरह लिखी गई है, लिहाजा, यदि आपको कविताओं के माध्यम के फिल्म देखना पसंद है, तो इसे एक बार देखना तो जरूर बनता है।
अच्छी बात/ बुरी बात
अच्छी बात- फिल्म संगीत.. सिनेमेटोग्राफी.. ग्राफिक्स.. अभिनय
बुरी बात- फिल्म में किसी भी किरदार को ज्यादा स्कोप नहीं दिया गया। वहीं, कहानी दमदार बनते बनते कमजोर रह गई। फर्स्ट हाफ आपका मन मोह सकती है, लेकिन सेकेंड हाफ के कुछ हिस्सों में आपको नींद आ सकती है।
देंखे या नहीं
फिल्म एक बार देखी जा सकती है, खूबसूरती के लिए। लेकिन यदि आप कविताओं के शौकीन नहीं हैं और आपको मिर्जा- साहिबां की कहानी में कोई दिलचस्पी नहीं है.. तो ना जाना ही बेहतर है..


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