मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर फिल्म रिव्यू - एक अच्छा टॉपिक लेकिन बिल्कुल ढीली कहानी
राकेश ओम प्रकाश मेहरा की मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर के एक सीन में एक छोटा बच्चा और उसकी मां, आमिर खान के गाने आती क्या खंडाला पर अपनी झोपड़ी में खुशी खुशी माच रहे हैं। उनके बीच का प्यार साफ साफ दिख रहा है और आप भी मुस्कुराते रह जाएंगे। लेकिन दुख ये है कि इससे ज़्यादा फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो आपका दिल छू जाए।
सरगम, (अंजली पाटिल) एक अकेली मां हैं। उसका आठ साल का बेटा है कान्हा (ओम कनौजिया)। ये मां बेटे मुंबई की एक बस्ती में रहते हैं। सरगम की ज़िंदगी कान्हा के ही इर्द गिर्द घूमती है और कान्हा, अपनी मां का हाथ बंटाने की पूरी कोशिश करता है। वहीं सरगम और पप्पू (नितेश वाधवा) के बीच प्यार परवान चढ़ रहा है।

गांधी नगर के लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं क्योंकि उनके एरिया में टॉयलेट की व्यवस्था नहीं है। एक दिन खुले में शौच जाने के दौरान, एक पुलिसवाला सरगम का रेप करता है। कान्हा, अपनी मां का दुख देखकर परेशान होता है और उसकी सुरक्षा के लिए चिंता करता है। कान्हा खुद ही एक टॉयलेट बनवाने ज़िम्मा लेता है। भले ही उसे प्रघानमंत्री को चिट्ठी क्यों ना लिखनी पड़े।
मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर का विचार भले ही बहुत बढ़िया लेकिन फिल्म का लेखन बड़ा ही लचर है जो आपको बुरी तरह से निराश कर देता है। फिल्म से आप कहीं भी भावनात्मक रूप से जुड़ ही नहीं पाते हैं और किरदारों का दुख आपके दिल को नहीं छूता है।
राकेश ओम प्रकाश मेहरा जैसे डायरेक्टर जो रंग दे बसंती जैसी फिल्में दे चुके हैं, उनसे इतनी बिखरी हुई फिल्म की उम्मीद नहीं की जा सकती है। फिल्म का निर्देशन कहीं से भी अनुभवी नहीं लगता है और ये फिल्म आपका दिल और उम्मीदें दोनों तोड़ देगी। कहीं कहीं पर फिल्म सच्चाई छोड़ कर काफी मेलोड्रामा करती है। डायलॉग्स भी कोई असर नहीं छोड़ते हैं।
अभिनय की बात करें तो अंजली पाटिल अपने इधर उधर भागते किरदार को संभालने की कोशिश करती हैं। उनका होली का सीन फिल्म का बेस्ट सीन है और उसे देखने के लिए ज़रूर आप ये फिल्म देख सकते हैं।
ओम कनौजिया, उम्मीदों के बोझ से दबे दिखाई देते हैं। चूंकि वो फिल्म की मेन लीड हैं, उन पर अच्छे अभिनय का काफी दबाव है जो परदे पर दिखता है। कुछ डायलॉग्स बोलते समय वो बहुत ही असहज दिखाई देते हैं। बाकी के बच्चे - रिंगटोन (आदर्श भारती), निराला (प्रसाद) और मंगला (साईना आनंद), कहानी को मज़ेदार बनाते हैं लेकिन फिल्म में उनका ज़्यादा रोल ही नहीं है। मकरंद देशपांडे और अतुल कुलकर्णी जैसे एक्टर भी भूल जाने वाले कैमियो में नज़र आते हैं।
पावेल डिल्लू का छायांकन कुछ भी नया नहीं है। मेघना सेन की एडिटिंग भी कच्ची है। रेखा भारद्वाज की आवाज़ में कान्हा रे बेहद खूबसूरत गाना है वहीं बाजा बाजा ढोल बाजा भी सुनने में अच्छा लगता है।
अक्षय कुमार की फिल्म टॉयलेट एक प्रेम कथा भी इसी विषय पर बनी थी लेकिन मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर, अपने विषय की सतह पर ही रह जाती है और समस्या की जड़ तक पहुंच ही नहीं पाती है। अच्छे विषय के बाववूद फिल्म बस एक फीकी सी कहानी बनकर रह जाती है जो एक सामाजिक मुद्दे पर बात करती है। हमारी तरफ से फिल्म को 2 स्टार।


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