मीनाक्षी सुंदरेश्वर फिल्म रिव्यू: सान्या मल्होत्रा - अभिमन्यु डसानी की कच्ची - पक्की सी नेटफ्लिक्स लव स्टोरी
फिल्म - मीनाक्षी सुंदरेश्वर
निर्देशक - विवेक सोनी
प्रोड्यूसर - करण जौहर, अपूर्व मेहता
लेखक - अर्श वोरा, विवेक सोनी
स्टारकास्ट - सान्या मल्होत्रा, अभिमन्यु डसानी व अन्य
अवधि - 2 घंटा 20 मिनट
प्लेटफ़ॉर्म - नेटफ्लिक्स
जोड़ियां ऊपर वाला बनाता है ये तो हम सबने ही सुना होगा, लेकिन ऐसा हम में से कई लोग मानते हैं और ऐसे ही कुछ मानने वाले मुख्य पात्र बनते हैं फिल्म मीनाक्षी सुंदरेश्वर का। हमारे देश में शादियां दो ही तरीके की मानी जाती है - या तो प्रेम विवाह यानि कि दो लोगों की सहमति से की गई शादी या फिर अरेंज मैरिज यानि कि आपका पूरा कुनबा और समाज जिस विवाह की मंज़ूरी दे।
मीनाक्षी सुंदरेश्वर इसी दूसरे तरीके की शादी को भगवान का आदेश मानने वाली फिल्म है। कहानी है मदुरै के दो परिवारों की। एक परिवार में एक विवाह योग्य कन्या और दूसरे परिवार में एक विवाह योग्य वर। दोनों का विवाह एक भयंकर गलतफ़हमी के बावजूद भगवान की मर्ज़ी मान के कर दिया जाता है।

कारण धर्म से भी जोड़ा जाता है। लड़के का नाम है सुंदरेश्वर और लड़की का नाम मीनाक्षी। मीनाक्षी सुंदरेश्वर, दक्षिण का एक बहुत बड़ा और माना हुआ मंदिर है। कहते हैं ना universe conspires। बस वही मानना इन दो परिवारों का हो जाता है जिसके बाद एक ही मीटिंग में मीनाक्षी और सुंदरेश्वर की शादी तय कर दी जाती है। दोनों अगली बार मिलते हैं सीधा अपनी शादी के दिन।
यहीं से शुरू होता है मीनाक्षी सुंदरेश्वर का मुख्य मुद्दा - अरेंज मैरिज और उसमें होने वाली दिक्कतें। इन दिक्कतों को पार करते हुए मीनाक्षी और सुंदरेश्वर अपनी शादी में प्यार कैसे ढूंढ पाते हैं, यही फिल्म की कहानी है।
बेहद खूबसूरत है प्लॉट
फिल्म का प्लॉट काफी दिलचस्प है। अरेंज मैरिज में फंसे दो अजनबी जो बस अपनी शादी को शुरू कर एक दूसरे को समझने, जानने की कोशिश करने वाले हैं, उन्हें परिस्थितियां एक दूसरे से अलग कर देती हैं। ऐसे में एक अरेंज मैरिज कपल, केवल अरेंज मैरिज की दिक़्क़तों से ही नहीं, बल्कि Long Distance Relationship की भी दिक्कतों से जूझता है। लेकिन फिल्म की खास बात ये है कि ये मुश्किल फिल्म के मुख्य किरदार साथ में झेलने का वादा करते हैं और यहीं से फिल्म आगे बढ़ती है।
शुरू होते ही गिर पड़ती है फ़िल्म
मीनाक्षी और सुंदरेश्वर की शादीशुदा ज़िंदगी में आने वाली दिक़्क़तों का जो भी ताना बाना निर्देशक विवेक सोनी बुनते हैं वो उसी में इतना उलझ जाते हैं कि फिल्म की उलझनें उसके सामने फीकी पड़ने लगती हैं। फिल्म के दोनों मुख्य किरदारों के ज़रिए, विवेक सोनी के पास आज की युवा पीढ़ी की नब्ज़ पकड़ने का मौका था। उनकी दिक्कतों और परेशानियों को समझते हुए स्क्रीन पर परोसने का मौका था लेकिन इन सारी परेशानियों को विवेक सोनी भले ही कागज़ या लैपटॉप पर लिख ले गए लेकिन परदे पर उतारने में सफल नहीं हो पाते हैं। यही कारण है कि मीनाक्षी और सुंदरेश्वर की कहानी आपको कितनी भी दिलचस्प लगे, उस कहानी से आप किसी भी स्तर पर जुड़ नहीं पाते हैं।
तकनीकी पक्ष
ज़्यादा तकनीकियों में ना जाएं तो भी फिल्म की बनावट ही आपको बहुत ज़्यादा प्रभावित करने में नाकामयाब हो जाती है। फिल्म की कास्टिंग दो साउथ इंडियन परिवारों के साथ हुई है लेकिन उनमें से कुछ हद तक सान्या के किरदार मीनाक्षी और उसके दादाजी को छोड़कर और कोई भी इसे निभा नहीं पाता। बात करें डायलॉग्स की तो रोमांटिक ड्रामा में एक भी डायलॉग ऐसा नहीं है जो आपके साथ रह जाए। दोनों मुख्य किरदारों के संवादों का भी कोई हिस्सा आपको याद नहीं रहेगा। ना ही ऐसा कोई सीन होगा जो आपको दमदार लगे या बेहतरीन स्तर पर प्रभावित कर जाए।
अभिनय
अगर अभिनय की बात करें तो अभिमन्यु डसानी अपनी पिछली फिल्म की छवि नहीं तोड़ पाते हैं। उन्हें एक शांत स्वभाव के लड़के का किरदार मिला है जिसे वो पूरी तरह से निभाने की कोशिश करते हैं। लेकिन उनका किरदार ऐसे ढंग से लिखा ही नहीं गया जिससे आप कोई जुड़ाव महसूस करें। सान्या मल्होत्रा बेशक चुलबुली, खुले विचारों वाली, हंसमुख लड़की के किरदार में आपको अच्छी लगेंगी। काफी हद तक उनसे उम्मीदें भी बंधती हैं कि वो इस फिल्म की नैया पार लगा देंगी लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं पाता है। लेकिन दोनों ही मुख्य किरदारों के बीच की केमिस्ट्री दिखाई नहीं दे पाती है।
क्या है अच्छा
अगर फिल्म के अच्छे पक्ष की बात करें तो मीनाक्षी सुंदरेश्वर का प्लॉट काफी नया और अच्छा है। बस इसका इस्तेमाल पूरे तरीके से नहीं किया जा पाता है। लेकिन फिल्म का म्यूज़िक और बैकग्राउंड स्कोर जो कि फिल्म को बचाने की पूरी कोशिश करता है। इसके लिए जस्टिस प्रभाकरण की तारीफ की जानी चाहिए। तितर बितर और मन केसर जहां अच्छे गाने हैं वहीं रत्ती रत्ती रेज़ा रेज़ा इस एल्बम में ताज़ापन लेकर आता है।
अच्छे किरदार लेकिन फीकी फ़िल्म
फिल्म में यूं देखा जाए तो दो अपोज़िट किरदारों को एक बार फिर से साथ लाकर खड़ा कर दिया गया है। ठीक वैसा ही जैसे आपने तनु वेड्स मनु या फिर हाल ही में आई हसीन दिलरूबा में देखा होगा। वहीं फिल्म में टिपिकल ड्रामेबाज़ी भी नहीं है जो एक नई दुल्हन को अपने ससुराल में देखने का रिवाज़ सा बना हुआ है। सेकंड हाफ में फिल्म थोड़ा ड्रामे की ओर बढ़ती है जब मीनाक्षी, अपने ससुराल में विद्रोह की छोटी सी चिंगारी डालती है। यहां से फ़िल्म में मीनाक्षी और सुंदरेश्वर की केमिस्ट्री में शानदार ट्विस्ट आने की गुंजाइश होती है लेकिन फिल्म और धीमी गति से आगे बढ़ती है और केवल निराश करती है।
बेहद निराशाजनक क्लाईमैक्स
मीनाक्षी सुंदरेश्वर जितने आशाजनक नोट पर शुरू होती है, क्लाईमैक्स पर आकर फिल्म उतना ही निराश करती है। पूरी फिल्म जिस मुद्दे पर बनाई गई है, ना ही उन मुद्दों से जुड़ी समस्याओं पर ज़्यादा बात होती है और ना ही उनका कोई हल निकाला जाता है। ले देकर फिल्म में रजनीकांत का एक फिल्मी एंगल बचता है लेकिन उसे भी उतने ही लचर तरीके से इस्तेमाल कर व्यर्थ कर दिया जाता है।
देखें या ना देखें
मीनाक्षी सुंदरेश्वर वो फिल्म है जो आप जीवन में बहुत ज़्यादा बोर हो रहे हैं तो ही देख सकते हैं। अन्यथा ये फिल्म आपको उम्मीद देकर बुरी तरह निराश करेगी। और निराश फ़िल्मों के लिए फिलहाल किसी के भी जीवन में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।


Click it and Unblock the Notifications











