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    Manikarnika Movie Review : कंगना का शानदार अवतार, जीत ली जंग लेकिन फिर भी हार गई फिल्म

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    Rating:
    2.5/5
    Star Cast: कंगना रनौत, अंकिता लोखंडे, सुरेश ओबराय, जीशु सेनगुप्‍ता, अतुल कुलकर्णी
    Director: कृष

    मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी के एक सीन में बुरी तरह से जख्मी गुलाम घौस खान (डैनी डेनजोंपा) अपनी जिंदगी के आखिरी सांस गिन रहे होते हैं.. वे झांसी की रानी से कहते हैं कि वे 'जीता का जश्न' देखने के लिए जिंदा नहीं बचेंगे। फिल्म के आखिर में ऑडिएंस को भी कुछ ऐसा ही महसूस होता है। फिल्म ऑडिएंस को कोई खास एक्सपीरिएंस नहीं दे पाती।

    कंगना रनौत की डायरेक्टर डेब्यू बिना इधर-उधर टाइम वेस्ट किए सीधे मुद्दे पर पहुंच जाती है। शुरूआत होती है अमिताभ बच्चन की शानदार आवाज से जो ऑडिएंस को मणिकर्णिका की दुनिया में ले जाती है। जो लोग रानी के बचपन की झलक देखने की आस लिए गए हैं उन्हें निराश होना पड़ेगा।

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    'छबीली मणिकर्णिका' (कंगना रनौत) का साहस और वीरता पहले ही सीन में दिखा दिया जाता है। जहां उसे एक खतरनाक चीते से भिड़ते हुए दिखाया जाता है (इस सीन में VFX किसी मजाक से कम नहीं लगता)। वो घुड़सवारी, बाड़ लगाने में बहुत तीव्र है और जल्दी ही उस पर नजर पड़ती है कुलभूषण खरबंदा की.. जो उसकी शादी झांसी के महाराजा गंगाधर राव नेवलकर (जिसु सेनगुप्ता) से करवाना चाहता है। जिसके बाद मणिकर्णिका बन जाती है रानी लक्ष्मीबाई।

    जल्द ही, वो एक बेटे को जन्म देती है और उसका नाम रखती है दामोदर राव। दुर्भाग्य से बच्चा जिंदा नहीं रह पाता और रानी लक्ष्मीबाई समेत पूरा राज्य शोक में डूब जाता है। तभी इस्ट इंडिया कंपनी 'चूक का सिद्धांत' लेकर आती है। वहीं राजा और रानी एक बच्चे को गोद लेते हैं और उसका नाम अपने बेटे के नाम पर ही रखते हैं। जहां एक तरफ गंगाधर राव की बीमारी से जूझने के बाद मौत हो जाती है। वहीं दूसरी तरफ रानी लक्ष्मीबाई झांसी संभाल लेती हैं। 'लक्ष्मी विधवा हुई है, उसकी झांसी अभी सुहागन है।'

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    बाकी की फिल्म ब्रिटिश राज के खिलाफ रानी लक्ष्मी बाई की लड़ाई के इर्द-गिर्द घूमती है। वे ये संदेश साफ कर देती हैं कि 'हम लड़ेंगे.. ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी आज़ादी का उत्सव मनाएं।

    'मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी के लिए क्रिश के साथ-साथ कंगना को निर्देशक का क्रेडिट दिया गया है। हालांकि इस एक्ट्रेस को अभी अपने इस टैलेंट पर काफी काम करना बाकी है। वहीं के विजयेंद्र प्रसाद का लेखन निराश करता है।

    फिल्म जरूरत से ज्यादा रचनात्मक स्वतंत्रता की वजह से काफी खराब हो गई है। फिल्म के कई सीन आपको हंसने पर मजबूर कर देंगे। एक सीन में झलकारी बाई (अंकिता लोखंडे) अजीब तरह का डांस करती नजर आ रही हैं। वहीं अचानक रानी भी उनके साथ डांस करने लग जाती हैं। वहीं दूसरे सीन में जनरल ह्यूज रोज देवी काली के बारे में सोचते नजर आते हैं। फिल्म के डायलॉग बिल्कुल दमदार नहीं हैं।

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    परफॉर्मेंस की बात करें तो फिल्म के पहले सीन से लेकर आखिर तक सिर्फ कंगना ही कंगना नजर आती हैं। फिल्म में जब-जब ब्रिटिश के सामने झुकने पर रानी के गुस्से को दिखने की बात आती है तब-तब कंगना शानदार अभिनय करती नजर आती हैं। फिल्म की शुरूआत में कंगना का लहजा थोड़ा निराशाजनक है लेकिन जब इमोशनल सीन्स की बारी आती है तो वे ऑडिएंस को इंप्रेस करके छोड़ती हैं।

    गंगाधर राव के किरदार में जिसु सेनगुप्ता ठीत-ठाक लगे हैं। बॉलीवुड में डेब्यू कर रहीं अंकिता लोखंडे जान लगा देती हैं लेकिन उनका छोटा सा रोल ऑडिएंस को निराश कर देता है। वैभव तत्वावादी और ताहेर साबिर को कुछ खास परफॉर्म करने का मौका नहीं मिल पाया है। मिष्टी चक्रवर्ती भी ठीक-ठाक परफॉर्म कर गई हैं।

    वहीं अतुल कुलकर्णी, मोहम्मद जीशान आयूब और डैनी डेनजोंपा जैसे शानदार एक्टर्स के खराब रोल देखकर काफी बुरा लगता है।

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    किरण देवहंस और गनाना शेखर वीएस की सिनेमैटोग्राफी काफई शानदार है। रामेश्वर भागवत और सुराग जगपतप की एडिटिंग और अच्छी हो सकती थी। म्यूजिक की बात करें तो 'विजयी भावना' को छोड़कर कोई भी गाना इंप्रेस नहीं कर पाता। जहां एक तरफ तलवारबाज़ी वाले सीन शानदार हैं वहीं दूसरी तरफ जंग के सीन दोहराव से भरे और पकाऊ लगते हैं।

    जहां एक तरफ कंगना रनौत ये साफ करती हैं कि मणिकर्णिका सिर्फ उनकी फिल्म है और वहीं इस फिल्म की स्टार हैं। वहीं दूसरी तरफ वे भूल जाती हैं कि फिल्म की सफलता टीम वर्क से होती है। हमारी तरफ से इस फिल्म को 2.5 स्टार्स।

    English summary
    While Kangana Ranaut makes sure that Manikarnika is her sole battlefield where she is the brightest star, she fails to realize that it's the way a team plays as a whole which determines its success. I am going with 2.5 stars.
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