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Review : रोमांस और एक्शन के लिए नहीं.. सिर्फ इसलिए देखें लखनऊ सेंट्रल.. MUST WATCH

Posted By: madhuri
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Lucknow Central Movie Review: Farhan Akhtar film is a MUST WATCH | FilmiBeat
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3.0/5

कास्ट : फरहान अख्तर, डायना पेंटी, गिप्पी गिरेवाल, दीपक डोबरियाल, रौनित रॉय
निर्देशक : रंजीत तिवारी
प्रोड्यूसर : निखिल आडवाणी, मोनीशा आडवाणी, मधु जी. भोजवानी, Viacom 18 मोशन पिक्चर्स
लेखक : रंजीत तिवारी, असीम अरोड़ा
क्या है खास : रवि किशन
क्या है बकवास : डायना पेंटी का रोल अधपका सा लगता है, फिल्म के कुछ सीन्स में काट-छांट की जा सकती थी। घिसापिटा क्लाइमैक्स
कब लें ब्रेक : इंटरवल
शानदार पल : रवि किशन पर फिल्माया गया हर सीन बेहतरीन है।

प्लॉट

प्लॉट

शहर छोटे हैं, सपने नहीं.. मुरादाबाद के एक लड़के किशन मोहन गिरहोत्रा (फरहान अख्तर) का जिंदगी को लेकर यही कहना है। किशन सिंगर बनना चाहता है उसका सपना है कि वो एक दिन खुद का एल्बम रिकॉर्ड करे। वहीं खराब किस्मत और वुरे वक्त के कारण कुछ ऐसी परिस्थितियां बनती हैं कि उसे गलती से एक IAS ऑफिसर की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है।

हालांकि, किशन को एक उम्मीद की किरण तब नजर आती है, जब उसे पता चलता है कि लखनऊ सेंट्रल जेल में कैदियों का एक बैंड बनाया जा रहा है। ये बैंड स्टेट लेवेल पर बाकी जेलों की बैंड से कॉम्पिटीशन करेगा। ये सब NGO वर्कर गायत्री कश्यप (डायना पेंटी) की मदद से हो रहा है। इसी कॉम्पिटीशन के लिए किशन एक बैंड बनाता है। जिसमें विक्टर (दीपक डोबरियाल), पंजितजी (राजेश शर्मा), दिक्कत (इनामुलहक) और परमिंदर (गिप्पी गिरेवाल) हैं, लेकिन यहां पर एक ट्विस्ट है क्योंकि "किशन का प्लान कुछ और है!"

निर्देशन

निर्देशन

फिल्म से निर्देशन में डेब्यू कर रहे रंजीत तिवारी अपना वक्त जाया नहीं करते और मजह 15-20 मिनट में मेन प्लॉट पर आ जाते हैं। लखनऊ सेंट्रल एक रियल लाइफ म्यूजिक बैंड से इंस्पायर्ड है। जिसका नाम था हीलिंग हार्ट्स, इस बैंड को आदर्श कारकार जेल के कैदियों ने बनाया था।

वहीं, लखनऊ सेंट्रल के कुछ सीन्स हाल ही में आई यशराज फिल्म्स की कैदी बैंड से मिलते जुलते दिखाई पड़ते हैं।

इसके साथ ही लखनऊ सेंट्रल आपको बांधे रखने में कामयाब होती है। वहीं कुछ सीन्स जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं तो कुछ सीन में लॉजिक ही गायब है। ये कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म देखने जाएं तो किसी एक्शन या रोमांस नहीं बल्कि जेल की लाइफ देखने के लिए जरूर जाएं।

परफॉरमेंस

परफॉरमेंस

फरहान अख्तर अपने छोट शहर के लड़के के किरदार में ठीक-ठाक नजर आते हैं। वहीं गलत अंग्रेजी बोलने के तरीके में वो कहीं-कहीं अजीबो-गरीब सुनाई देते हैं।

वहीं रौनित रॉय और रवि किशन इस फिल्म में बेहतरीन लगे हैं। उन्होंने फिल्म में जबरदस्त कॉमेडी का भी तड़का बखूबी लगाया है। साथ ही दीपक डोबरियाल, राजेश शर्मा, इनामुलहक और गिप्पी गिरेवाल ने भी काफी अच्छा परफॉर्म किया है।

दूसरी तरफ डायना पेंटी का रोल बेहद खराब तरीके से लिखा गया है, जिसके चलते वे कुछ खास नहीं कर पाईं।

तकनीकि पक्ष

तकनीकि पक्ष

तुषार कांति रे ने अंधेरे से भरी जेलों में कैदियों की जिंदगी में होने वाली चमक को बखूबी दिखाया है। वहीं चारू श्री रॉय की एडिटिंग और अच्छी हो सकती थी।

म्यूजिक

म्यूजिक

जहां एक तरफ फिल्म पूरी तरह म्यूजिक के इर्द-गिर्द घूमती है, वहीं दूसरी तरफ इस फिल्म का म्यूजिक कुछ खास नहीं मालूम होता। फिल्म के गाने कावां-कावां के अलावा किसी और सॉन्ग ने कुछ खास इंप्रेस नहीं कर पाया।

वर्डिक्ट

वर्डिक्ट

फिल्म में कुछ कमियां होने के बाद भी लखनऊ सेंट्रल में आजादी की उड़ान को लेकर कुछ बेहतीन लम्हे भी हैं। जिसे देखने के लिए एक बार तो जाना बनता है।

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    English summary
    lucknow central movie review stroy plat and ratings.. know here

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