उस आखिरी पत्ते से जुड़ी है पाखी की जिंदगी- लुटेरा रिव्यू
बचपन में आपने एक राजा की कहानी सुनी होगी। जिसमें राजा की जान एक तोते में बंद होती है। राजा के दुश्मन उसकी जान लेने के लिए उस तोते को ढूंढते हैं लेकिन नहीं ढ़ूंढ पाते। फिर एक दिन एक अजनबी आकर राजा का भरोसा जीत लेता है और उस तोते के बारे में पता करके उसकी जान ले लेता है और राजा मर जाता है। रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म लुटेरा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जिसमें पाखी यानी सोनाक्षी सिन्हा में जान छिपी है उसके पिता यानी जमींदार साहब की। फिर एक दिन एक अजनबी आता है पाखी का दिल जीतता है और उसे छोड़कर चला जाता है। लुटेरा फिल्म उन लोगों के लिए नहीं बनी है जो कि जिंदगी की तेज रफ्तार में भाग रहे हैं। बल्कि ये फिल्म उन्हीं को खुद से जोड़ पाएगी जो कि इस रफ्तार में भी लम्हों को रोककर प्यार के लिए वक्त निकालना पंसद करते हैं।
अगर एक्टिंग की बात की जाए तो पाखी के किरदार में सोनाक्षी सिन्हा ने वाकई जान डाल दी है। यूं लगा ही नहीं कि सोनाक्षी आज की लड़की हैं बल्कि पाखी के किरदार में सोना इतनी रच बस गयीं कि यूं महसूस हुआ सोनाक्षी उसी जमाने की हैं। सोनाक्षी के मंह से निकले एक एक लफ्ज सीधे दिल को छूते हैं। और हर एक सीन में सोनाक्षी का परफेक्शन नज़र आता हैी। सोनाक्षी के साथ रणवीर सिंह ने भी बेहतरीन एक्टिंग की है। लेकिन जैसा कि पहले से सभी को महसूस हो रहा था फिल्म में सोनाक्षी रणवीर से बाजी मार ले गयीं।
कहानी- लुटेरा फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा ने पाखी का किरदार निभाया है जो कि मानिकपुर गांव में अपने पिता जमींदार साहब के साथ रहती है। पाखी को अस्थमा की बीमारी है और उसके पिता पाखी को बहुत प्यार करते हैं। जमींदार साहब के लिए पाखी वो तोता है जिसमें उनकी जान बसती है। एक दिन उस गांव में वरुण श्रीवास्तव (रणवीर सिंह) की एंट्री होती है। आगे की कहानी जानने के लिए पढ़िये स्लाइड्स।


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