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    लूटकेस फिल्म रिव्यू - इस फिल्म का हर किरदार आपका दिल जीत लेगा, कॉमेडी का बढ़िया डोज़

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    Rating:
    2.5/5

    फिल्म - लूटकेस
    डायरेक्टर - राजेश कृष्णन
    स्टारकास्ट - कुणाल खेमू, रसिका दुग्गल, गजराज राव, रणवीर शौरी, विजय राज़ व अन्य
    प्लेटफॉर्म - हॉटस्टार

    हम सब की ज़िंदगी आम है। बेरंग सी है। लेकिन अगर इसमें चटक लाल रंग भर जाए तो ज़िंदगी कैसी होती है? राजेश कृष्णन की लूटकेस को मुख्य पात्र नंदन (कुणाल खेमू) के जैसी। लेकिन क्या ज़िंदगी में रंग भरना इतना आसान होता है और क्या हर रंगीन सी दिखने वाली इस खुशी में कुछ भी काला नहीं है? ये जानने के लिए आपको नंदन की दुनिया में उलझना पड़ेगा।

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    नंदन की दुनिया वैसे छोटी है, उसकी पत्नी लता और उसका बेटा। लूटकेस देखा जाए तो हमारे समाज की साफ सच्चाई है कि एक छोटा सा, आम सा आदमी भले ही रंगीन सपने देख सकता है लेकिन उन्हें सच करना बहुत मुश्किल है।

    फिल्म शुरू से एक ही एक शानदार सफर का वादा करती है। हिंदी सिनेमा में डार्क कॉमेडी के साथ वैसे भी ज़्यादा एक्सपेरिमेंट नहीं किया गया है। लूटकेस भी एक बार फिर से वो कोशिश करती है। फिल्म में सारे मसाले एकदम सही मात्रा में डाले गए हैं।

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    लेकिन चूल्हा जलाने के बाद ये मसाले पकते कैसे हैं ये जानने के लिए आपको हम फिल्म की पूरी समीक्षा दे देते हैं -

    कहानी

    कहानी

    फिल्म की कहानी वही है जो आमतौर पर होती है। एक आम आदमी को एक पैसों से भरा बैग मिल जाए और फिर उस बैग के पीछे पड़े लोग धीरे धीरे सामने आते जाएंगे और चूहे बिल्ली जैसा ये खेल और भी मज़ेदार होता जाएगा। लूटकेस में भी यही होता है। नंदन को जैसे ही बैग मिलता है, धीरे धीरे उस बैग के कई हकदार कहानी में जुड़ते चले जाएंगे।

    किरदार

    किरदार

    गजराज राव फिल्म इस बार एक विलेन की भूमिका में दिखाई देंगे। मिनिस्टर पाटिल, जिसका वो बैग है। मिनिस्टर पाटिल के साथ काम करता है इंस्पेक्टर कोलटे जिसकी भूमिका में रणवीर शौरी काफी सशक्त रूप से दिखाई देते हैं। विजय राज़ वही कर रहे हैं जो वो बेस्ट करते हैं - गैंगस्टर बनना। वहीं रसिका दुग्गल इस बार कुछ अलग करती दिखाई दी हैं और उन पर पति पर हमेशा भड़की हुई एक आम औरत लता का किरदार जमता है।

    कॉमेडी टाइमिंग

    कॉमेडी टाइमिंग

    फिल्म की कॉमिक टाइमिंग अच्छी है। खासतौर से कुणाल खेमू की। फिल्म के डायलॉग्स और एडिटिंग इसकी कॉमिक टाइमिंग और शानदार बनाती है। फिल्म की शुरूआत ही एक अच्छी कॉमेडी का वादा करती है जब सुलभ शौचालय के सामने नंदन को 2000 की नोटों से भरा सूटकेस मिल जाता है। लेकिन फिर भी ये कॉमेडी दर्शकों के लिए ज़्यादा काम नहीं करती है। ऐसा लगता है कि चुटकुले शुरू होते हैं लेकिन सही जगह खत्म नहीं हो पाते हैं। हालांकि कपिल सावंत के डायलॉग्स आपको कुछ बेहतरीन पंचलाइन्स ज़रूर देते हैं। और इनमें से ज़्यादाकर गजराज राव के हिस्से आती हैं जो दर्शकों से तालियां बटोरेंगे।

    अभिनय

    अभिनय

    फिल्म की स्टारकास्ट शानदार है और इसलिए हर किरदार अपने बेस्ट फॉर्म में दिखता है। कुणाल खेमू में दर्शक को खींचने और बांधे रखने का हुनर जो उनके नंदन में भी साफ दिखाई देता है। आम आदमी के किरदार में उनका भोलापन भा जाता है और यही मासूमियत फिल्म के क्लाईमैक्स में भी सब कुछ पता होते हुए भी आपको बांधे रखती है।

    डायरेक्शन

    डायरेक्शन

    राजेश कृष्णन ने फिल्म को बांधे रखने की पूरी कोशिश की है लेकिन उनकी फिल्म उनकी कहानी से ज़्यादा उनकी शानदार स्टारकास्ट की वजह से काम करती है। हर कोई फिल्म की कमज़ोरियों को अपनी अभिनय क्षमता से भरने की पूरी कोशिश करता दिखाई देता है। दिक्कत बस इतनी है कि ये कोशिश कई बार साफ दिखाई दे जाती है और वहीं पर दर्शकों से फिल्म छूटती दिखती है। फिल्म एक शानदार कॉमेडी का वादा अपने पहले सीन से करती है लेकिन अपनी ही उम्मीदों के बोझ तले दब जाती है।

    तकनीकी पक्ष

    तकनीकी पक्ष

    फिल्म में राजेश कृष्णन की पटकथा, अच्छे संवादों और कहानी के बावजूद पूरी फिल्म को बांधने में असफल हो जाती है। इसलिए फिल्म का व्यंग्य और डार्क कॉमेडी वादे बड़े करता है लेकिन चलते चलते थक जाता है। सिनेमैटोग्राफर सानू जॉन का कैमरा फिल्म के लिए अच्छा काम करता है। आनंद सुबाया की एडिटिंग फिल्म को दिशा देने की कोशिश करती है लेकिन असफल दिखती है।

    अधूरे चुटकुले

    अधूरे चुटकुले

    फिल्म की कमी है चीज़ों को शुरू कर उन्हें पूरा नहीं करना। जैसे कि पूरी फिल्म में नंदन की दीदी का ज़िक्र होता है, लोग दीदी का इंतज़ार करते हैं लेकिन दीदी आती ही नहीं है। वो एंगल वैसे ही अधूरा छोड़ दिया गया है जो कि निराश करता है। इस तरह फिल्म में कई चीज़ें जो एक अच्छे सब प्लॉट की ओर इशारा करती हैं लेकिन उन्हें पूरा नहीं करती हैं।

    जीत जाती है दिल

    जीत जाती है दिल

    इन कमियों के बावजूद फिल्म अपने शानदार किरदारों से आपका दिल जीतती है। हर किरदार का ग्राफ फिल्म में अच्छा है। नंदन की भूमिका में कुणाल खेमू जहां Employee of the Month बनना चाहते हैं नहीं रसिका दुग्गल लता के किरदार में घर चलाने के बोझ और पड़ोसियों के तानों तले दबी हुई महिला बनकर दिल जीतती हैं। लता और नंदन के नन्हें से बेटे के रूप में आर्यन प्रजापति भी कुछ हंसी के फुहारों छोड़ते हैं।

    कहां हुई चूक

    कहां हुई चूक

    फिल्म का म्यूज़िक और गाने इसकी गति तोड़ते हैं तो वहीं अच्छे चुटकुलों की शुरूआत होना पर उनका फ्लैट गिर जाना कहीं ना कहीं दर्शकों को निराश करता है। इसलिए फिल्म आपका दिल नहीं जीतती है लेकिन इसके एक्टर्स आपका दिल जीत लेते हैं।

    देखें या ना देखें

    देखें या ना देखें

    लूटकेस एक बेकार फिल्म नहीं है बस सादी खिचड़ी है जिसके साथ पापड़ और अचार नहीं है। इसलिए भूख ज़्यादा हो तो सादी खिचड़ी भी खा सकते हैं। और कभी कभी गर्मागर्म खिचड़ी भी स्वादिष्ट लग जाती है। तो बस समझ लीजिए लूटकेस वही खिचड़ी है। फिल्म में आपका समय बर्बाद नहीं होगा बशर्ते आपका मूड है तो।

    English summary
    Lootcase film review - Know full review of Kunal Kemmu, Rasika Duggal starrer film streaming on Disney Hotstar.
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