जर्सी फिल्म रिव्यू- अपने दमदार अभिनय से दिलों में शतक लगाते हैं शाहिद कपूर

Rating:
3.0/5

निर्देशक- गौतम तिन्ननुरी

कलाकार- शाहिद कपूर, मृणाल ठाकुर, पंकज कपूर, रोनित कामरा

"सौ में से कोई एक होता है जिसे कामयाबी मिलती है, लेकिन अर्जुन की कहानी उन 99 लोगों की है जो नाकामयाब होकर भी कभी कामयाबी की उम्मीद नहीं छोड़ते हैं.." अर्जुन की जिंदगी पर लिखी किताब के विमोचन में मुख्य वक्ता कहते हैं। 'जर्सी' खेल में हार- जीत से अलग.. मुख्य किरदार द्वारा हमें जिंदगी की हार- जीत से रूबरू कराती है। यह एक रणजी स्टार क्रिकेटर की यात्रा को दिखाती है, जो अपने करियर के चरम पर खेल से बाहर हो जाता है। ये फिल्म नानी-स्टारर जर्सी (तेलुगु) की यह आधिकारिक हिंदी रीमेक है।

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मैदान से दूर अपने जीवन से निराश, पूर्व रणजी क्रिकेट खिलाड़ी अर्जुन तलवार (शाहिद कपूर) 36 साल की उम्र में खेल में वापस लौटने का फैसला करता है। वह अपनी पत्नी विद्या (मृणाल ठाकुर) की नजरों में अपनी योग्यता साबित करना चाहता है और बेटे (रोनित कामरा) की नजरों में हीरो बने रहना चाहता है। क्या 10 साल के अंतराल के बाद वह क्रिकेट की दुनिया में वापसी करने में सफल हो पाएगा?

यहां पढ़ते हैं फिल्म की पूरी समीक्षा-

कहानी

कहानी

अर्जुन 26 साल की उम्र में अचानक ही एक दिन क्रिकेट से दूरी बना लेता है। कुछ समय के बाद झूठे केस में फंसकर उसके हाथ से सरकारी नौकरी भी चली जाती है। ऐसे में घर की पूरी जिम्मेदारी उसकी पत्नी विद्या पर आ जाती है। समय के साथ अर्जुन अपने बेटे के और करीब आता जाता है और पत्नी से दूरी बढ़ती जाती है। विद्या उसे वापस नौकरी में भेजने के हर संभव प्रयास करती है.. लेकिन असफल रहती है। अर्जुन की जिंदगी का पन्ना उस दिन पलटता है.. जब बेटा उससे एक जर्सी की मांग करता है। अर्जुन किसी भी तरह अपने बेटे की ख्वाहिश पूरी करना चाहता है। कई दिनों तक वह प्रयास करता है, लेकिन रूपए नहीं जुटा पाता। अपने बेटे की नजरों में अपनी इज्जत बनाए रखने के लिए अर्जुन एक बार फिर क्रिकेट में वापसी करने की ठानता है। लेकिन 10 सालों के अंतराल के बाद.. और 36 साल की उम्र में खेल में वापसी आसान नहीं होती। ऐसे में अर्जुन किस तरह अपनी परिस्थितयों से लड़ता है.. इसी के इर्द गिर्द घूमती है पूरी कहानी।

अभिनय

अभिनय

शाहिद कपूर एक शानदार अभिनेता हैं और ये उन्होंने अपनी हर फिल्म के साथ साबित किया है। जर्सी में भी वह प्रभावशाली लगे हैं। खासकर जब वह क्रिकेट के मैदान में अपनी वापसी को लेकर संघर्षरत होते हैं तो काफी दमदार लगे हैं। अपने किरदार के द्वारा शाहिद निराशा, हताशा, गुस्सा, दुख, शर्म, जीत.. सभी भाव बेहतरीन दिखाते हैं। वहीं, विद्या के किरदार में मृणाल ठाकुर सटीक लगी हैं। दोनों के किरदार को काफी बारीकी से लिखा गया है। पंकज कपूर (कोच) के साथ शाहिद के कुछ बेहतरीन सीन्स हैं। रियल लाइफ पिता- पुत्र बड़े पर्दे पर साथ में बेहद सहज दिखते हैं। रोनित कामरा (बेटा) और शाहिद की केमिस्ट्री भी देखने लायक है।

निर्देशन

निर्देशन

गौतम तिन्ननुरी ने ही ओरिजनल फिल्म बनाई थी और रीमेक का जिम्मा भी उन्होंने खुद ही लिया। कोई दो राय नहीं कि रीमेक के प्रति वो पूरी तरह से पूरे सच्चे रहे हैं। अब तक बॉलीवुड में कई स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन क्रिकेट और इमोशन का ये मिश्रण कुछ अलग है। ये फिल्म खेल से ज्यादा आपसी रिश्तों की कहानी कहती है। ये पिता और बेटे की कहानी है.. एक पति और पत्नी की कहानी है.. एक वृद्ध कोच और एक खिलाड़ी की कहानी है। हालांकि फिल्म भावनात्मक स्तर पर उस मजबूती के साथ नहीं जुड़ पाती है, जितना निर्देशक कोशिश करते हैं। खासकर अर्जुन और विद्या की लव स्टोरी और उनका सफर काफी लंबा लगने लगता है। जिस वजह से आपके मन में कई सवाल उठने लगते हैं। लिहाजा, फिल्म का क्लाईमैक्स औसत बनकर रह जाता है।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी पक्ष

तकनीकी स्तर पर फिल्म अच्छी है। फिल्म की कहानी 10 सालों के अंतराल पर चलती है और इस अंतर को काफी सावधानी और सहजता से दिखाया गया है। फिल्म के प्रोडक्शन डिजाइन को इसके लिए तारीफ मिलनी चाहिए। अनिल मेहता की सिनेमेटोग्राफी कहानी को मजबूत बनाती है। साथ ही क्रिकेट से जुड़े हिस्से को अच्छी तरह से शूट और कोरियोग्राफ किया गया है। फिल्म जहां दिक्कत करती है, वो है एडिटिंग। 174 मिनट की ये फिल्म कुछ हिस्सों में बेहद धीमी गति से आगे बढ़ती है.. खासकर फिल्म का फर्स्ट हॉफ।

संगीत

संगीत

सचेत-परंपरा द्वारा जर्सी का चार-गानों का साउंडट्रैक औसत है। अच्छी बात है कि गाने कहानी के साथ साथ चलते हैं। वहीं, फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर अनिरुद्ध रविचंदर द्वारा रचित है, जो कि बेहतरीन है और कहानी में सही जगह पर सही मात्रा में भाव लाने का काम करती है। बता दें, अनिरुद्ध रविचंदर ने ही मूल तेलुगु फिल्म के लिए स्कोर और साउंडट्रैक की रचना की थी।

देखें या ना देखें

देखें या ना देखें

भले ही जर्सी एक स्पोर्ट्स ड्रामा है, लेकिन यहां खेल से जुड़े थ्रिल आपको नहीं मिलेंगे। यदि आप क्रिकेट के रोमांचक पलों की उम्मीद कर रहे हैं, तो आप शायद थोड़ा निराश हो सकते हैं। जर्सी क्रिकेट से ज्यादा रिश्तों के भावनात्मक पक्ष पर जोर देती है।यह पति और पत्नी, पिता और बेटे, कोच और खिलाड़ी के रिश्ते को तल्लीनता से दिखाती है।फिल्मीबीट की ओर से फिल्म को 3 स्टार।

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