'गंगूबाई काठियावाड़ी' फ़िल्म रिव्यू - दमदार व्यक्तित्व पर बनी संजय लीला भंसाली की एक कमजोर फिल्म
निर्देशक- संजय लीला भंसाली
कलाकार- आलिया भट्ट, अजय देवगन, सीमा पाहवा, शांतनु माहेश्वरी, विजय राज, जिम सरभ
कमाठीपुरा के वेश्यालय को उजड़ने से बचाने हेतु प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलने जा रही गंगूबाई अपने पत्रकार दोस्त से कहती हैं, "15 मिनट में उनके सीने से गुलाब ना जीत लिया तो मेरा नाम गंगू नहीं"। आत्मविश्वास से लबरेज़ और ख्वाब देखने की हिम्मत के साथ गंगूबाई कमाठीपुरा के 'बदनाम गली' की हर औरत के हक की लड़ाई लड़ने को तैयार रहती थीं। वो बेहतर कल चाहती थीं। जैसा कि फिल्म की चंद लाइनें कहती हैं- "तकदीर में आंसू थे, फिदरत में हंसी, हीरोइन बनने आई थी खुद सिनेमा बन गई.."
संजय लीला भंसाली ने आलिया भट्ट के साथ गंगूबाई की दुनिया को बड़े पर्दे पर लाने के लिए हुसैन जैदी की किताब 'माफिया क्वींस ऑफ मुंबई' के एक अध्याय 'द मैट्रिआर्क ऑफ कमाठीपुरा' को चुना। फिल्म की इस कहानी में ट्रैजेडी है, रोमांच है, रोमांस है, संगीत है, मुद्दा है; लेकिन क्या ये प्रभावित कर पाती है? नहीं। ये दमदार कहानी कमजोर लेखन और निर्देशन से ग्रस्त दिखती है। फिल्म में नाटकीयता हावी दिखता है, जो भावनात्मक स्तर पर आपको कहानी या किरदार से जुड़ने ही नहीं देता है।
कहानी
काठियावाड़ के एक संपन्न परिवार में जन्मी गंगा हरजीवनदास (आलिया भट्ट) फिल्म अभिनेत्री बनने का ख्वाब देखती थीं। उसे रमणीक लाल नाम के व्यक्ति से प्यार था, जो उसे 16 साल की उम्र में ही हीरोइन बनाने का लालच देकर मुंबई ले आया और कमाठीपुरा के वेश्यालय में हजार रूपए में बेच दिया। एक रात में गंगा की जिंदगी पूरी तरह से पलट गई। वो गंगा से गंगू बन गई। जब उसे एहसास हुआ कि वो ऐसी खाई में गिर चुकी है, जहां से निकलना अब मुमकिन नहीं, तो उसने अपनी किस्मत को स्वीकार लिया। वो देह व्यापार में जरूर गई लेकिन उसमें आत्मविश्वास की कमी नहीं थी। अपने इसी आत्मविश्वास, मददगार स्वभाव और मशहूर डॉन रहीम लाला (अजय देवगन) के दम पर उन्होंने उस क्षेत्र का चुनाव जीता और जल्द ही गंगू से गंगूबाई बन गई। वह वेश्यावृति में धकेली गई लड़कियों के हक के लिए लड़ाई लड़ती, उनके समान अधिकारों की वकालत करतीं। देश में वेश्यावृति को वैध बनाने के मुद्दे को लेकर गंगूबाई ने उस समय के प्रधानमंत्री तक से मुलाकात कर ली थी। गंगा से गंगूबाई बनने तक का सफर उन्होंने किन रास्तों से होकर तय किया.. इसी के इर्द गिर्द घूमती है पूरी फिल्म।
निर्देशन
संजय लीला भंसाली की पिछली फिल्मों से यदि इसे अलग रखकर की आंका जाए तो निर्देशन के मामले में यह काफी औसत है। फिल्म हिस्सों में अच्छी है, लेकिन प्रभावी नहीं है। एक अच्छे क्लाईमैक्स के साथ निर्देशक आपको बांधने की कोशिश करते हैं, लेकिन वेश्यावृति जैसे विषय और गंगूबाई जैसी दमदार महिला पर बनी ये फिल्म आपको अंत में किसी सोच के साथ नहीं छोड़ती।
कोई शक नहीं कि इस फिल्म से आपको गंगूबाई की जिंदगी की बेहतरीन झलक मिलेगी। लेकिन उनकी जिंदगी की घटनाओं को कहानी के रूप में पिरोना लेखक- निर्देशक का काम था, जहां फिल्म निराश करती है। यहां दृश्य कट टू कट गुजरते जाते हैं। जब तक आप एक दृश्य से बंधने की कोशिश करते हैं, दूसरा दृश्य आ जाता है। गंगूबाई के अलावा बाकी सभी किरदार काफी हल्के मालूम पड़ते हैं। कुछेक दृश्यों को छोड़कर फिल्म के संवाद में भी दम नहीं दिखता है।
अभिनय
गंगूबाई काठियावाड़ी के किरदार में आलिया भट्ट ने अच्छा काम किया है, खासकर भावुक दृश्यों में उनके चेहरे पर आए दर्द के हाव आपका ध्यान खींचते हैं। आलिया ने इस भूमिका के लिए काफी मेहनत की है और पर्दे पर वह दिखता है। समाज सेविका वाले भाग में उनकी आवाज और अंदाज को एक भारीपन दिया गया है, जिसे उन्होंने अच्छा निभाया है। लेकिन फिर भी इसे आलिया का बेस्ट परफॉर्मेंस करार नहीं दिया जा सकता। शांतनु माहेश्वरी अपने किरदार में खूब जंचे हैं। रहीम लाला के किरदार में अजय देवगन प्रभावित करते हैं, लेकिन उनके हिस्से कुछेक सीन ही हैं। देखा जाए तो गंगूबाई के अलावा फिल्म के बाकी सभी किरदार कमजोर लेखन से ग्रस्त हैं। रजियाबाई की भूमिका में विजय राज की जोर शोर से एंट्री होती है, लेकिन कहानी में उनके लिए कुछ खास नहीं है।
तकनीकी पक्ष
गंगूबाई काठियावाड़ी तकनीकी पक्ष में भी औसत दिखती है। संजय लीला भंसाली की फिल्में अपने भव्य सेट्स, वाइड शॉट्स, छोटी से छोटी डिटेलिंग के लिए जानी जाती हैं। प्रोडक्शन डिजाइनिंग में ये फिल्म भी आकर्षित करती है। फिल्म का ज्यादातर हिस्सा कमाठीपुरा में ही गुजरता है, लिहाजा वहां की गलियों और सड़कों पर भी फोकस किया गया है। सिनेमेटोग्राफर सुदीप चटर्जी कमाठीपुरा को एक किरदार की तरह स्थापित करने की कोशिश करते हैं। कुछ हद तक वो सफल भी रहे हैं, लेकिन ढ़ाई घंटे लंबी इस फिल्म में कई दृश्य दोहराते से लगे हैं। फिल्म के एडिटिंग की जिम्मेदारी संजय लीला भंसाली ने ही संभाली है, और यहां वो निराश करते हैं।
संगीत
ब्रैकग्राउंड में ठुमरी के साथ फिल्म की शुरुआत होती है, जो एक मूड सेट करता है। फिल्म का संगीत संजय लीला भंसाली ने ही दिया है। "ढ़ोली दा" हो या "मेरी जान".. इस फिल्म के कुछ गाने झूमने को मजबूर करते हैं तो कुछ सुकुन देते हैं.. तो कुछ गंभीर। लेकिन फिल्म में जिस तरह से इन्हें शामिल किया गया है वह असर नहीं छोड़ते। बता दें, इससे पहले गुजारिश, राम-लीला, पद्मावत और बाजीराव मस्तानी में भी संजय लीला भंसाली ने खुद ही संगीत दिया था, जिसके गीत आज भी लोगों की जुबां पर हैं।
देखें या ना देखें
संजय लीला भंसाली ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को एक से बढ़कर एक फिल्में दी हैं। लेकिन गंगूबाई काठियावाड़ी उनकी बनाई सबसे कमजोर फिल्मों में शामिल है। आलिया भट्ट की अदाकारी अच्छी है। यदि गंगूबाई जैसी दमदार व्यक्तित्व की कहानी बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं तो फिल्म एक बार देखी जा सकती है। फिल्मीबीट की ओर से गंगूबाई काठियावाड़ी को 2.5 स्टार।


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