#Review: फ्रीकी अली, 10 मिनट में बाहर नहीं आए तो आपको 'खान - बीमारी' है!
फिल्म - फ्रीकी अली
WARNING:
- कुछ फिल्में अच्छी होती हैं और कुछ बेकार। पर कुछ फिल्में KHAN फिल्में होती हैं, जिनका अच्छे बुरे से कोई सरोकार नहीं होता। ये वही फिल्म है।
- कॉमेडी एक अच्छा क्षेत्र होता है लेकिन जब कॉमेडी सर्कस के हर चुटकुले पर हंसने वाले जज उसे सीरियसली ले लेते हैं तो कॉमेडी महान क्षेत्र बन जाता है।
- अरबाज़ खान एक एक्टर हैं, इस फिल्म में भी। क्यों हैं, ये तो हम भी पता लगा रहे हैं।
- इस फिल्म को सलमान खान ने प्रमोट किया है तो इसे देखना आपका धर्म है।

तो जैसा कि हम आपको बता रहे थे कि इस देश में किसी भी चीज़ के साथ अगर खान लग जाता है तो वो पवित्र हो जाती है, ऐसी ही पवित्र सी ये कहानी है एक कच्छे बेचने वाले की।
फ्रीकी अली में जितनी कॉमेडी है वो ट्रेलर में दिखाई जा चुकी है। फिल्म का ट्रेलर ही इसका सबसे अच्छा पार्ट था। फिल्म में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी केवल इसलिए हैं क्योंकि फिल्म के प्रोड्यूसर सलमान खान हैं।
कहानी
फिल्म है अली की जो अंडरगार्मेंट्स का बिज़नेस करता है। लेकिन लड़की वालों को पता है कि वो गार्मेंट्स का बिज़नेस करता है। शादी वाले दिन लड़की वालों को पता चलता है कि वो गार्मेंट नहीं अंडरगार्मेंट का बिज़नेस करता है और शादी टूट जाती है।
इस कच्छे बेचने वाले का एक दोस्त है - मक़सूद (अरबाज़ खान) जिसे लगता है कि मूंछों में वो कॉमिक टाइमिंग अच्छी रख लेता है। बहरहाल वो सब बाद में, मकसूद और अली मिलकर वसूली का धंधा डाल लेते हैं और एक दिन ऐसे ही एक गोल्फ क्लब में एक अमीर आदमी, इस कच्छे बेचने वाले को चैलेंज कर देता है कि वो अमीरों वाला खेल, गोल्फ खेल के दिखाए। वहीं पर अली को पहली नज़र में प्यार हो जाता है मेघा (एमी जैक्सन) से।
बस इसके बाद गली क्रिकेट खेलने वाला ये कच्छे बेचने वाला गरीब आदमी कैसे अमीरों के खेल की छुट्टी कर देता है यही फिल्म की कहानी है।
अभिनय
जब फिल्म में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी हों तो अभिनय की बात नहीं की जानी चाहिए। लेकिन उन्होंने ये फिल्म कर के ऐसी कोई तोप नहीं मारी। उन्हें अभिनय आता है सब जानते हैं, ऐसे में फ्रीकी अली जैसी ढीली ढाली स्क्रिप्ट क्यों, ये ज़्यादा गंभीर मुद्दा है।
अरबाज़ खान काफी सालों से एक्टिंग करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आज तक उनकी परफॉर्मेंस सेम है, इसके लिए बधाई। हां, इस फिल्म में उन्हें लगा कि मूंछे रख लेने से शायद उनकी कॉमेडी लोगों को समझ आए।
सीमा बिस्वास को कोई नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की मां क्यों बनाएगा और जस अरोड़ा को नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के साथ एक ही फ्रेम में एक्टिंग क्यों करवाएगा, ये सब गहन चिंतन का विषय है।
फिल्म में एमी जैक्सन भी हैं...सुंदर लगी हैं, तीन चार डायलॉग भी हैं, खैर वो बहुत सुंदर लगी हैं। बात यहीं खत्म करते हैं।
डायरेक्शन
सोहेल खान ने कुछ दिनों पहले कहा था कि उन्हें एक्टिंग में अच्छे रोल नहीं मिल रहे थे इसलिए उन्होंने निर्देशन करने की ठानी। लेकिन अब इससे ज़्यादा साफ तरीके से कैसे कहा जाए कि भाईजान....रहन दें, आपसे नहीं हो पाएगा।
कमज़ोर पक्ष
इस पूरी फिल्म में कुछ भी है मज़बूत नहीं है, यही फिल्म का कमज़ोर पक्ष है।
मज़बूत पक्ष
नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी को कांपती हुई सलामी, पूरी फिल्म शूट करने के लिए, लचर संवादों और ढीली स्क्रिप्ट के बावजूद।
मत देखिए
बहरहाल, 100 बात की एक बात ये है कि फिल्म में देखने लायक कुछ है नहीं।


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