सिकंदर: आतंक के साए में बचपन

By Staff

निर्देशक: पीयूष झा
कलाकार: परजान दस्तूर, आयशा कपूर, अरूंदय सिंह, संजय सूरी, माधवन, सोनिया चोपड़ा

कश्मीर के सौंदर्य पर कथाकारों और फिल्म निर्माताओं ने फिल्‍में बनानी बंद कर दी थी। फिल्‍मों में फूलों से लदे शिकारों पर रोमांटिक गीत फिल्‍माएं जाने बंद हो गए थे। अब फिर से फिल्‍में बननी शुरू हो गई है। अब कश्मीर पर बनने वाली सभी फिल्मे आतंकवाद को केंन्‍द्र में रखकर बनाई जा रहीं है। इस विषय पर हमने हाल में कई फिल्‍में देखी है, कुछ प्रभावित करने वाली थी तो कुछ ऐसी ही थी।

सिकंदर इस कड़ी में एकदम नए रूप में है, क्योंकि इसके पात्र बच्चे हैं और कहानी उनके दृष्टिकोण से ही आगे बढती है। सिकंदर (परजान दस्तूर) और नसरीन (आयशा कपूर) दोस्त है। दोनों १४ के साल के है। दोनों स्‍कूल के बाद एक दूसरे मिलते है बात करतें है।

सिकंदर राज्य स्तर पर फुटबॉल खेलना चाहता है। उसे एक ग्रुप के लड़के परेशान करते रहतें है। वह यह सब नसरीन से छुपाता है। नसरीन उससे ज्‍यादा समझदार है वह उसे हर बात में सलाह देती है लेकिन यह बात सिकंदर उसे नहीं बताता है क्‍योंकि उसे लगता है कि यह मर्दों का मामला है और यही मामला है जो आगे चलकर उसकी मुसीबतों का कारण बनती है।

उदाहरण के लिए, उसे सड़क पर एक बंदूक मिलती है जिसके जरिए वह जिहादी नेता जहीर कादिर (अरूंदय सिंह) के सम्‍पर्क में आ जाता है। करिश्माई व्‍यक्तित्‍व और सहानुभूति वाला क‍ादिर सिकंदर को बंदूक चलाने की साधारण सी कला सिखाता है जिससे सिकंदर रोमांचित हो जाता है।

मामला तब गंभीर हो जाता है जब कादिर सिकंदर का इस्‍तेमाल अपने एक विरोधी, जो कि अब एक सुधारवादी उग्रवादी नेता (संजय सूरी) बन गया है और भारतीय सेना से हाथ मिलाकर चल रहा है, की हत्‍या करवाने के लिए सोचता है। तब कहानी में कई मोड़ आते है। जो हमें आश्चर्य करने पर मजबूर करते है। पात्रों के चरित्र बदलतें है। फिल्‍म की समाप्ति कुछ ज्‍यादा ही नाटकीय है जो आसानी से हजम नहीं होगी।

हालांकि फिल्म बच्चों के माध्‍यम से अपनी बात कहने की कोशिश करती है और अंत में कश्‍मीर के बच्‍चों की सही तस्‍वीर दिखाने का प्रयास करती है! लोगो द्धारा आसानी से प्रभावित कर लिए जाने वाले बच्‍चे कई ताकतों के बीच फंस कर कैसे खत्‍म हो जाते है।

लेखक-निदेशक पीयूष झा (उनकी दो पिछली फिल्‍में बॉलीवुड किंग और चलो अमेरिका हैं) कहानी कहने में निपुण है और कई तरह के मूड पैदा करने में सफल रहें है। सोमक मुखर्जी का छायांकन प्रभावी रहा है। फिल्‍म का संपादन, संगीत, गीत और ध्वनि डिजाइन बहुत ही अच्छा बन पड़ा है।

अभिनय में परजान दस्तूर ने काफी प्रभावित किया है। फिल्‍म ब्‍लैक के बाद एक आयशा ने एक और अवार्ड जीतने वाला अभिनय किया है। संजय सूरी और माधवन ने भी ठीक ठाक रहें है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि फिल्‍म आतंक के साए में पल रहे बच्‍चों के अबोध बचपन को आतंकी गतिविधियों में शामिल होने की दास्‍ता बयां करती है जो संभव है दिल हो छू जाए।

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