समीक्षा : मिलेंगे-मिलेंगे को नहीं मिलेंगें दर्शक

निर्देशक : सतीश कौशिक
निर्माता : एस.के. फिल्म इंटरप्राइजेस, बोनी कपूर
संगीत : हिमेश रेशमिया
लेखक : शिराज अहमद
स्टार्स:1.5/5
समीक्षा : मिलेगे-मिलेंगे क्या कहना चाह रही है ये तो आप नाम से ही समझ गए होंगे। लेकिन शायद डायरेक्टर साहब दर्शकों को ये ना समझा पाये। ठीक है फिल्म की कहानी आपने हॉलीवुड से चुरा ली लेकिन थोड़ा तरीका भी आप हॉलीवुड से चुरा लेते तो बेहतर होता। पूरी फिल्म में हर चीज कमजोर नजर आती है। केवल किस्मत के भरोसे बनायी गई इस फिल्म शायद ही इसमें सितारे कलाकारों का साथ दें। फिल्म में नयापन कुछ भी नहीं है।
संगीत भी लोगों को बांध नहीं सकता और किरदारों की बात करें तो शाहिद और करीना दोनों ही लोगों को अपने से बांध रखने में नाकामयाब हैं। इसमें सितारों का दोष नहीं बल्कि स्टोरी का ऊबाऊपन दोष है। जो करीना और शाहिद को एक साथ देखना चाहते हैं वो तो शायद एक बार सिनेमाघर तक चले जाये क्यों कि शायद ही उन्हें ये दोनों दोबारा साथ नजर आयें। फिलहाल लंबे समय बाद रीलिज हुई य़े फिल्म बोनी कपूर और सतीश कौशिक दोनों को शायद ही खुश होने का मौका दे। ऐसे में कहा जा सकता है कि मिलेंगे-मिलेंगे को शायद ही दर्शक मिलें।
देखें : मिलेंगे-मिलेंगे की तस्वीर
कहानी : फिल्म में करीना ऐसे किरदार में है जो कि किस्मत में बहुत विश्वास करती हैं और एक टैरो कार्ड रीडर किरण खेर के कहने पर अपने प्यार को ढूंढने बेंकॉक चली जाती है।जहां प्रिया की मुलाक़ात होती है शाहिद कपूर से। शाहिद करीना से झूठ बोलकर उसका मिस्टर राइट बनने की कोशिश करता है। करीना भी शाहिद से प्यार करने लगती है।
लेकिन जब उसे सच्चाई पता चलती है तो वो शाहिद को छोड़ने का फैसला कर लेती है लेकिन फिर भी शाहिद को एक चांस देती है और कहती है कि अगर तुम मेरी किस्मत में हो तो जरूर मिलोगे। खैर कहानी तीन साल आगे बढ़ती है, दोनों की शादियां होने वाली होती है, दोनो के मंगेतर हैं लेकिन दोनों एक-दूसरे को भूल नहीं पाते हैं और अंत में एक हो जाते है।


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