दिल को छू देने वाली फिल्म है 'फेरारी की सवारी'

Ferrari Ki Sawaari Film Review
निर्माताः विधु विनोद विनोद चोपड़ा
निर्देशकः राजेश मापुस्कर
संगीतः प्रीतम
कलाकारः शरमन जोशी, बोमन इरानी, रित्विक साहोर,विजय निकम और विद्या बालन (आइटम सांग-माला जो दे)

एक पिता जिसके लिए उसका बेटा और उसके बेटे की इच्छाएं ही सबकुछ हैं एक छोटा लड़का जिसके लिए क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि उसकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा है। इन दो किरदारों और उनके दिल की गहराई में बसने वाली भावनाओं का ताना बाना है निर्देशक राजेश मापुस्कर की फिल्म 'फेरारी की सवारी'।

आम इंसान के दिल में उसकी पहुंच से बढ़कर बसने वाले सपनों और उन सपनों को सच करने की कोशिश में तमाम मुश्किलों को सहने और उनसे पार पाने की जुगत में लगे बाप बेटे की जिंदगी को बड़ी ही खूबसूरती से परदे पर उतारा गया है। फिल्म इंडस्ट्री में कई व्यावसायिक फिल्में बनती हैं और काफी कमाई भी करती हैं पर सच्ची भावनाओं पर आधारित फिल्में बहुत कम ही देखने को मिलती है 'फेरारी की सवारी' इन फिल्मों में से एक है।

रुसी (शरमन जोशी) अपने बेटे कायो (रित्विक साहोर) से बहुत प्यार करता है और उसके लिए उसके बेटे से बढ़कर और कुछ नहीं है। दूसरी तरफ कायो जिसके लिए क्रिकेट खेल से बढ़कर उसकी जिंदगी का अहम हिस्सा है और उसका सबसे बड़ा सपना है इंग्लैंड में स्थित लार्ड्स मैदान में क्रिकेट खेलना। अपने बेटे के लिए कुछ भी कर गुजरने की सोच रखने वाला रुसी अपने बेटे की इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए वो सब कुछ करता है जो कि उसने कभी अपने सपने में भी नहीं सोचा था।

रुसी एक फेरारी कार बिना उसके मालिक से पूछे लेकर आता है और फिर उनका रोमांच से भरा और तमाम मुश्किलों से भरा सफर शुरु होता है। इस फेरारी की सवारी रोलर कोस्टर की तरह ही बहुत रोमांचक है। इस पूरे सफर के रास्ते में कई नये किरदार भी फिल्म की कहानी का हिस्सा बनते जाते हैं और साथ ही दर्शकों को भी अपने साथ इस अनोखे सफर का एहसास कराते है।

फिल्म में शरमन जोशी ने अपने उम्दा अभिनय से यह दिखा दिया कि वो अकेले भी फिल्म को सफल बना सकते हैं। बोमन इरानी जैसा कि अपनी हर एक फिल्म में हंसी के ठहाकों का तड़का लगाते हैं वैसे ही इस फिल्म में भी उन्होंने अपने दादाजी के किरदार में काफी मस्ती और मजाक का माहौल बनाया है।

फिल्म का सबसे मजबूत पहलू है रित्विक साहोर का अभिनय जिसने कायो के किरदार में अपने अभिनय प्रतिभा से जान डाल दी है। फिल्म का स्क्रीनप्ले काफी उम्दा है। फेरारी की सवारी करते समय फिल्म में जिन किरदारों से पहचान कराई गई उनमें से सबसे प्रभावशाली है लालची राजनीतिज्ञ और उसके बेवकूफ बेटे का किरदार। इसके अलावा भी कहानियां जो कि फिल्म को और भी रोमांचक बनाती है।

फिल्म के किरदारों को कुछ इस तरह दर्शाया गया है कि दर्शक खुद को उन किरदारों से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। कहना गलत नहीं होगा कि अगर फिल्म को सही मायने में इंज्वाय करना है तो एक बच्चे की नज़र से देखना होगा। क्योंकि एक बच्चे के दिल में सच्ची भावनाएं होती हैं उन्दी सच्ची भावनाओं को इस फिल्म में भी दर्शाया गया है। कहा जा सकता है कि निर्देशक राजेश मापुस्कर ने अपनी इस पहली फिल्म से यह साबित कर दिया की निर्माता विधु विनोद चोपड़ा ने उनपर भरोसा करके कुछ गलत नहीं किया।

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