REVIEW: ढिशूम, 100 टका पैसा वसूल...वरूण - जॉन के साथ डबल अक्षय धमाका
फिल्म - ढिशूम
मसाला फिल्में याद हैं? जैसी फराह खान बनाती थीं - मैं हूं ना, ओम शांति ओम टाइप। बस अगर वैसी मसाला फिल्म देखे बहुत टाइम हो गया है तो सही जगह याद आए हैं। दो एकदम स्मार्ट हीरो, एक परी जैसी हीरोइन, एकदम अमीर लोकेशन, एक आईटम गर्ल और एक मसालेदार प्लॉट।
ढिशूम में वो सब कुछ है जो आपको विशुद्ध मसाला फिल्मों में मिलता है। मार धाड़, एक्शन, रोमांस, कॉमेडी, गाना, सस्पेंस, ट्विस्ट, सरप्राइज़। लेकिन इन सब के अलावा अगर कुछ नहीं है तो ठहराव। कहते हैं ना कि हीरो होंडा चलाने वाले को एकदम से फरारी नहीं पकड़ा दी जाती है। लेकिन अगर पापा डेविड धवन हैं तो पकड़ाई जा सकती है।

इस फरारी को चलाते समय रोहित धवन ने पूरी कोशिश की है कि एक्सीडेंट ना हो....और सोचिए कि सरप्राइज़ क्या है? एक्सीडेंट नहीं होता है। लेकिन फिर भी एक्सीडेंट ना हो, ये कोशिश करते हुए फरारी बुरी तरह ठुकती है, भिड़ती है, स्क्रैच आता है और भी बहुत कुछ होता है।
[10 कारण क्यों देखें ढिशूम]
यानि कि रोहित धवन ने पूरी कोशिश की है कि फिल्म में कोई भी कमी ना दिखे और उनकी यही कोशिश फिल्म में हर जगह दिखी है। पर इसका मतलब ये नहीं कि फिल्म खराब है। फिल्म एवरेज है और कुछ बेतुके दृश्यों को छोड़कर पूरी फिल्म में मज़ा आएगा।
फिल्म का सबसे बेहतरीन हिस्सा है इसके दो अक्की! यानि कि अक्षय कुमार और अक्षय खन्ना। अक्षय कुमार का ज़बर्दस्त कैमियो जहां आपको काफी मज़ा देगा, वहीं अक्षय खन्ना का निगेटिव किरदार फिल्म की जान है।
जानिए फिल्म की पूरी समीक्षा -
प्लॉट
फिल्म का पूरा प्लॉट है 36 घंटे में होने वाला इंडिया पाकिस्तान का मैच और उसके ठीक पहले भारत के टॉप बैट्समैन विराज शर्मा का किडनैप हो जाना। एक भारत का ऑफिसर कबीर (जॉन अब्राहम) और एक यूएई का ऑफिसर जुनैद (वरूण धवन) मिलकर इस मिशन पर निकलते हैं।
अभिनय
वरूण धवन ने हमेशा की तरह वही किया है जो उन्हें करना सबसे अच्छा आता है। मैं दिखता हूं स्वामी पर हूं हरामी वाला एक्ट। पर वरूण जंचते हैं। उनका भोला सा, मासूम सा चेहरा उनके किरदार को फबता है। और उनका माशाल्लाह डांस उनके एक्ट पर चार चांद लगाता है। पर दिक्कत ये है कि वरूण हमेशा से यही करते आए हैं, इसलिए बार बार यही करते देखना थोड़ा पकाऊ है। दिलवाले, मैं तेरा हीरो से उनका किरदार कोई अलग नहीं था।
अब बात जॉन अब्राहम की, तो वो कॉप बनकर हमेशा अच्छे लगते हैं। इमोशन की उनकी ज़िंदगी में कोई जगह नहीं है और ये बात उनके लिए उनका रोल आसान कर देती है। क्योंकि फिल्म में भी उनके चेहरे पर ज़्यादा इमोशन नहीं नज़र आएगा।
जैकलीन फर्नांडीज़ ने फिल्म में काफी हद तक कैटरीना कैफ बनने की कोशिश की है पर वो अच्छी लगी हैं। हालांकि फिल्म में उनके लायक ज़्यादा कोई काम नहीं है, सिवाय एक गाने के। जितना काम उन्हें दिया गया, उन्होंने बखूबी किया है।
अक्षय खन्ना जब भी निगेटिव किरदार में आते हैं तो शानदार रूप से छाप छोड़ते हैं। रेस के बाद इस फिल्म से उनकी शानदार वापसी हो सकती थी, पर फिल्म की कमियों के कारण शायद ऐसा ना हो पाए।
स्टारकास्ट
फिल्म में स्टारकास्ट काफी लंबी है और सबने अपना काम बखूबी किया है। आते जाते किरदारों में भी सब फिल्म को थोड़ा और आगे बढ़ाते हैं और मज़ा आता है। नरगिस फखरी का ग्लैमर, लोगों को अच्छा लगेगा। वहीं अक्षय कुमार का गे किरदार आपको बेहद पसंद आएगा। साकिब सलीम भी भारत के बेस्ट बल्लेबाज़ बने हुए अच्छे लगे हैं जबकि सुषमा स्वराज के किरदार में मोना अंबेगांवकर जितनी भी देर स्क्रीन पर थीं बेहतरीन थीं। अंत में परिणीति का जानेमन आपको फिल्म की सारी कमियां थोड़ी देर के लिए ही सही पर भुला देगा।
निर्देशन
रोहित धवन ने फिल्म में बारीकियों पर ध्यान नहीं दिया है। हालांकि फिल्म 36 घंटे का एक मिशन थी, पर एक मसालेदार फिल्म बनकर रह गई, वो भी ऐसी जिसमें मसाले और नमक दोनों ही ज़्यादा है। सब कुछ एक ही फिल्म में डालने के चक्कर में वो किसी चीज़ पर फोकस नहीं कर पाए हैं। ना ही फिल्म में सस्पेंस है, ना ही एक्शन। स्क्रिप्ट काफी ढीली है और अगर अच्छी स्टारकास्ट नहीं होती तो फिल्म कब की हाथों से निकल जाती।
देखें या नहीं
मसाला फिल्मों के शौकीन हैं, तो हमारी तरफ से हां है, फिल्म देखने में कोई बुराई नहीं है। केवल एक अच्छी स्टारकास्ट के लिए।


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