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    'धोखा राउंड डी कार्नर' फिल्म रिव्यू: सस्पेंस थ्रिलर देखना पसंद करते हैं, तो यहां आपको मिल सकता है धोखा

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    Rating:
    2.0/5

    निर्देशक- कूकी गुलाटी
    कलाकार- आर माधवन, अपारशक्ति खुराना, खुशाली कुमार, दर्शन कुमार

    आतंकवादी हक़ गुल के कब्जे में बंदूक की नोक पर बैठी सांची कहती है, "एक कहानी है.. सुनोगे! एक बार झूठ और सच कहीं जा रहे थे। झूठ ने कहा कि गर्मी है। दोनों नहाने कुएं में उतरे, जैसे ही सच ने डुबकी लगाई, झूठ सच के सारे कपड़े लेकर भाग गया। और तब से झूठ पूरी दुनिया में सच के कपड़े पहनकर घूम रहा है। पूरी दुनिया मेरे पति की ही बात को सच मानती है और मैं सच की तरह इस कुएं में खड़ी हूं।"

    सच और झूठ की लड़ाई के इर्द गिर्द बुनी गई ये थ्रिलर काफी सपाट ट्विस्ट एंड टर्न्स के साथ आगे बढ़ती है, जब आखिर में "धोखा" सामने लाया जाता है। क्लाईमैक्स में निर्देशक आपको एक हाई नोट पर छोड़ने की कोशिश करते हैं। इस फिल्म का मूल कॉन्सेप्ट काफी दिलचस्प है। लेकिन किसी सोच को भी बड़े पर्दे पर उतारने के लिए कुछ चीजें अनिवार्य होती हैं, वो है अच्छी पटकथा और सोच को सपोर्ट करते कलाकार। 'धोखा राउंड डी कार्नर' इन दोनों ही पक्षों में कमजोर है।

    कहानी

    कहानी

    फिल्म की कहानी यथार्थ सिन्हा (आर माधवन) और सांची सिन्हा (खुशाली कुमार) की हंसी खुशी से भरपूर शादीशुदा जिंदगी से होती है। समय गुजरता जाता है कि और दोनों के बीच प्यार की जगह पनपने लगती है ईष्या, साजिश, शक और नफरत। दोनों किसी तरह जिंदगी की गाड़ी खींच रहे होते हैं, जब एक दिन एक आतंकवादी हक़ गुल जेल से भागकर उनके घर में आ छिपता है। उस वक्त घर में सिर्फ सांची होती है। हक गुल उसे बंधक बनाकर पुलिस के सामने अपनी मांगे रखता है।

    पुलिस जहां आतंकवादी को पकड़ने की प्लानिंग में लगी है, यथार्थ यह बताकर उनकी होश उड़ा देता है कि हक गुल की बंधक बनी उसकी पत्नी डिलूश़नल डिसॉर्डर (delusional disorder) की शिकार है। यानि की वो कोई भी कहानी खुद के मन में गढ़कर उसे सच मानने लगती है। सांची के बारे में और भी बातें जानकर पुलिस इंस्पेक्टर मलिक (दर्शन कुमार) यथार्थ से कहता है- "समझ नहीं आ रहा ऊपर कौन ज्यादा खतरनाक है, हक़ गुल या आपकी पत्नी.." दूसरी तरफ सांची अपनी कहानी हक़ गुल को सुनाती है, जो यथार्थ की कहानी से बिल्कुल अलग होता है। फिल्म इन्हीं चार किरदारों के इर्द गिर्द घूमती है। चारों के पास अपनी कहानी है और सभी कहानी एक दूसरे से बिल्कुल उलट। ऐसे में कौन सच्चा है कौन झूठा.. यही कड़ी फिल्म को अंत तक लेकर जाती है।

    तकनीकी पक्ष

    तकनीकी पक्ष

    हम पहले भी कई ऐसी फिल्में देख चुके हैं, जो एक ही कमरे में या सीमित लोकेशन पर शूट की गई है। ऐसे में ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि अपनी नैरेटिव को लोगों तक पहुंचाने के लिए दमदार संवाद और प्रभावशाली कलाकारों को सामने लाया जाए। लेकिन कूकी गुलाटी की फिल्म इस मामले में दर्शकों को धोखा दे जाती है। एक कमरे में कैद खुशाली और अपारशक्ति के दृश्य लगातार रिपीट होते लगते हैं। और यही वजह है कि महज 1 घंटे 52 मिनट की फिल्म भी काफी लंबी लगने लगती है। सच कहा जाए तो कहानी में कहीं भी थ्रिल महसूस नहीं होता।

    लेखन, निर्देशन से लेकर तकनीकि स्तर पर फिल्म औसत है। अमित रॉय की सिनेमेटोग्राफी कहानी में कुछ नया नहीं जोड़ती है। धर्मेंद्र शर्मा की एडिटिंग भी थोड़ी और चुस्त हो सकती थी। फिल्म का संगीत तनिष्क बागची, रोचक कोहली और गौरव दासगुप्ता ने दिया है, जो कि औसत से नीचे है। कह सकते हैं कि शुरुआती आधे घंटे के बाद से फिल्म काफी सपाट चलती है, जहां आप किसी हाई मोमेंट का इंतजार ही करते रह जाते हैं।

    निर्देशन

    निर्देशन

    इस फिल्म का निर्देशन और पटकथा लेखन कूकी गुलाटी ने किया है। फिल्म शुरुआत में आपका ध्यान बांधती है, खासकर जब तक किरदारों को स्थापित किया जाता है। लेकिन इंटरवल तक ही पहुंचते पहुंचते कहानी और किरदार सभी कमजोर पड़ने लगते हैं। साथ ही खासकर जिस तरह से मीडिया को फिल्म में चित्रित किया गया, वो काफी अनावश्यक लगता है। फिल्म के संवाद लिखे हैं नीरज सिंह ने, जिसके बारे में जितनी कम बात की जाए, सही है।

    अभिनय

    अभिनय

    फिल्म का कमजोर पक्षों में रहा है अभिनय। कोई शक नहीं कि आर माधवन एक दमदार अभिनेता हैं और लेकिन यहां उन्हें देखकर काफी हैरानी होती है। हां, यहां उनके किरदार को थोड़ा और तराशने की जरूरत थी और शायद वो खुद भी शूटिंग के दौरान ही इस बात को समझ चुके थे। और यही बात लागू होती है दर्शन कुमार पर। फिल्म में दोनों कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ते हैं, जो कि एक दर्शक के तौर पर हमारे लिए निराशाजनक है। आतंकवादी हक़ गुल के किरदार में अपारशक्ति ने अच्छा काम किया है। कह सकते हैं कि फिल्म में सबसे प्रभावी वही रहे हैं। वहीं, खुशाली कुमार ने इस फिल्म के साथ बॉलीवुड में डेब्यू किया है। कहानी के लिहाज से उनके पास अपनी अभिनय दक्षता दिखाने के लिए यहां काफी मौके थे, लेकिन उन्होंने यहां निराश किया है। शुरु से लेकर अंत तक चेहरे पर सिर्फ चुनिंदा हाव भाव नजर आते हैं।

    कुल मिलाकर, 'धोखा राउंड डी कार्नर' एक दिलचस्प सस्पेंस थ्रिलर बन सकती थी, लेकिन लचर पटकथा का नतीजा रहा कि यह बेहद औसत साबित हुई। फिल्मीबीट की ओर से 'धोखा' को 2 स्टार।

    English summary
    R Madhavan, Aparshakti Khurana, Khushali Kumar and Darshan Kumaar starrer film Dhokha Round D Corner is releasing on 23rd September. This film made on a good concept results in a boring thriller due to weak screenplay.
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