Dhak Dhak Movie Review: फातिमा, रत्ना पाठक शाह, दीया मिर्जा और संजना की इस रोड ट्रिप से प्यार हो जाएगा

निर्देशक- तरुण दुदेजा
कलाकार- रत्ना पाठक शाह, दीया मिर्जा, फातिमा सना शेख, संजना सांघी
"कभी कभी खुश होने के लिए सिर्फ आंखें खोलने की देर होती है.." माही (रत्ना पाठक शाह) अपनी साथी बाइकर्स से कहती हैं। लंबे अरसे के बाद, एक ऐसी महिला- केंद्रित फिल्म आई है, जहां फेमिनिज्म के नाम पर सिर्फ पुरुषों को विलेन नहीं बताया गया है। ये कहानी चार ऐसी महिलाओं की, जो आंखें खोलकर अपनी खुशी हासिल करने में विश्वास रखती हैं। यह आत्म खोज के बारे में हैं। यह जानने के बारे में कि जीवन में क्या महत्वपूर्ण है: मंजिल, सफर, या शायद वे लोग जिनसे आप उस सफर के दौरान मिलते हैं?
कहानी
फिल्म की कहानी चार महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमती है; स्काई (फातिमा), माही (रत्ना पाठक शाह), उज्मा (दीया) और मंजरी (संजना सांघी)। चारों अलग-अलग पृष्ठभूमि, अलग अलग उम्र के पड़ांव से हैं, लेकिन कहीं ना कहीं अपनी जिंदगी से असंतुष्ट। खुशी पाने की जिद इन्हें एक साथ लाती है.. और ये दिल्ली से खारदुंग ला (लेह) एक बाइक ट्रिप प्लान करते हैं। 7 दिनों में मंजिल पाने की आस में चारों निकल पड़ते हैं। लेकिन क्या वे इस सफर में सफल हो पाएंगे और यह यात्रा उनके जीवन को कैसे बदल देगी? फिल्म इन्ही सवालों का जवाब देगी।
निर्देशन व तकनीकी पक्ष
धक धक महिलाओं से जुड़े कई मुद्दों पर गंभीरता से बात करती है। लेकिन साथ ही ये एक फील गुड फिल्म है। इसके किरदारों में आत्म विश्वास है, अल्हड़पन है, कुछ कमजोरियां भी हैं, और संवेदनशीलता भी। फिल्म इनकी जर्नी को इस तरह दिखाती है कि आप लगातार इन किरदारों के नजदीक होते जाते हैं। ये तरुण दुदेजा के निर्देशन का कमाल है। अपने सफर में चारों महिलाओं का सामना कई और लोगों से भी होता है, जो कहीं ना कहीं उनके सफर का हिस्सा बनते चले जाते हैं। खास बात है कि ये छोटे छोटे किरदार भी बेहद प्रभावी हैं। सेकेंड हॉफ में फिल्म की गति थोड़ी धीमी होती दिखती है, लेकिन इसके किरदार आपको बांधे रखेंगे। फिल्म के संवाद लिखे हैं परिजात जोशी और तरुण दुदेजा ने, जो कि दिल छूने वाले हैं। एक दृश्य में स्काई एक अन्य आदमी से बात करते हुए पूछती है, "आप पहाड़ों में रह कर भी बोर होते हो?" जिस पर वो व्यक्ति, जो एक मजदूर है, जवाब देते हुए कहता है- "धूल मिट्टी भर गया है आंख में यहां रोड बनाते बनाते, पहाड़ अब मुझे सुंदर नहीं लगते.."
धक धक जिंदगी से जुड़ी कई सीख देती जाती है, लेकिन बोर नहीं करती है। संवाद में एक तरह का ह्यूमर भी है। इसकी कहानी में सरलता है। और कहानी का बराबर साथ देती है फिल्म की लोकेशन। दिल्ली, हो या मनाली या लेह.. हर लोकेशन की खूबसूरती को सिनेमैटोग्राफर श्रीचिथ विजयन दामोदर ने बखूबी कैप्चर किया है। मनीष शर्मा की एडिटिंग अच्छी है। वहीं, फिल्म के संगीत और बैकग्राउंड स्कोर को भी पूरे नंबर मिलते हैं। अफसोस है कि इस फिल्म का प्रमोशन काफी ठंडा रहा। ऐसी फिल्मों का जोर शोर से प्रचार होना चाहिए था, ताकि ज्यादा से ज्यादा दर्शक थियेटर की ओर रुख करें और इस बेहतरीन कहानी को सराहें।
अभिनय
अभिनय की बात करें.. तो ये फिल्म का एक पॉजिटिव पक्ष है। माही के किरदार में रत्ना पाठक शाह ने कमाल का काम किया है। जिस सरलता के साथ वो आपको हंसाती हैं और रूला भी देती है.. वो एक दिग्गज कलाकार ही कर सकता है। वहीं, दीया मिर्जा, फातिमा सना शेख ने भी अपने किरदारों को पूरी सहजता के साथ निभाया है। इस तरह की भावपूर्ण भूमिका में दीया को देखना दिलचस्प है। संजना सांघी भी अपने किरदार में एक मासूमियत लाने में सफल रही हैं, जो उनके किरदार के लिए जरूरी था।
रेटिंग
कुल मिलाकर, धक धक एक बेहतरीन रोड ट्रिप फिल्म है। फिल्म की पटकथा कसी हुई है, साथ ही परफॉमेंस दमदार हैं। फेमिनिज्म का आधार लिये, ये फिल्म दोस्ती और भरोसे की बात करती है। यह एक ऐसी फिल्म है जो अपनी खामोशी में बहुत कुछ कहती है। इस वीकेंड बड़े पर्दे पर कुछ दमदार और खूबसूरत देखना चाहते हैं, तो 'धक धक' जरूर देंखे। फिल्मीबीट की ओर से फिल्म को 3.5 स्टार।


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