धाकड़ फिल्म रिव्यू- एक्शन से भरपूर, लेकिन सिरदर्द है कंगना रनौत की ये फिल्म
निर्देशक- रजनीश घई
कलाकार- कंगना रनौत, अर्जुन रामपाल, दिव्या दत्ता
लव-स्टोरी, कॉमेडी, संस्पेंस हो या एक्शन.. किसी भी फिल्म के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है पटकथा। धाकड़ में यही कमी खलती है। यहां कंंगना रनौत से बैक टू बैक एक्शन सीन्स को खूब देखने को मिलेंगे, लेकिन कहानी के नाम पर फिल्म बेहरमी से ठगती है। एक्शन फिल्म के नाम पर गन्स चलाने और गाड़ियां उड़ाने तक तो ठीक था, लेकिन जब तक पटकथा में दम ना हो, सभी बेकार जाते हैं।
धाकड़ कहानी है एक प्रशिक्षित और खतरनाक एजेंट अग्नि (कंगना रनौत) की, जिसे एक अंतरराष्ट्रीय मानव और हथियारों के तस्कर रुद्रवीर को खत्म करने का एक मिशन सौंपा गया है, जो दस साल से रडार से दूर है। क्या अग्नि इस मिशन में सफल हो पाएगी? यही बनाती है आगे की कहानी।
कहानी
फिल्म शुरु होती है ड्रैगनफ्लाई उर्फ़ एजेंट अग्नि के एक लंबे धमाकेदार एक्शन सीन से। जहां वह अपनी जान पर खेलकर बाल तस्करी के एक समूह से कुछ बच्चों को बचाती है। साथ ही अग्नि के हाथों लगती है एक पेनड्राइव, जिसमें दी जानकारी उसे एशिया के सबसे बड़े बाल तस्कर समूह के मुखिया से जोड़ता है, जो है रूद्रवीर (अर्जुन रामपाल)। बच्चों को बहकाकर, सरकार के खिलाफ नफरत भरकर रूद्रवीर और उसकी साथी रोहिणी (दिव्या दत्ता) एक साम्राज्य खड़ा करते हैं। कोयले की खदानों को हथियाने के अलावा वो दुनियाभर में बाल तस्करी का धंधा करते हैं। उनके साम्राज्य को खत्म करने का जिम्मा उठाती है अग्नि। लेकिन इस मिशन में उसे कई और सच्चाइयों से रूबरू होना पड़ता है, जो उसके विश्वास तक को हिलाकर रख देता है। क्या रूद्र को खत्म करने के इरादे में अग्नि सफल होगी? इसी के इर्द गिर्द घूमती है पूरी फिल्म।
अभिनय
कंगना रनौत, दिव्या दत्ता, अर्जुन रामपाल सरीखे कलाकार होने के बावजूद कोई किरदार आपके दिल में नहीं उतर पाता.. कारण है फिल्म की पटकथा। फिल्म का लेखन इतना कमज़ोर है कि सभी किरदार अपने आप में कहीं गुम नजर आते हैं। ना कंगना की धाकड़ एक्शन, ना दिव्या दत्ता के हाव भाव.. कुछ भी फिल्म को नहीं बचा पाती। अर्जुन रामपाल लंबे समय के बाद निगेटिव भूमिका में नजर आए हैं.. लिहाजा फैंस को इससे काफी उम्मीदें थीं। लेकिन वो निराश करते हैं।
निर्देशन
रजनीश घई की डेब्यू फिल्म है धाकड़.. जिससे उन्होंने निराश किया है। निर्देशन पक्ष में फिल्म बेहद कमजोर है। यहां ना कहानी पर काम किया गया है, ना किरदारों को मजबूत बनाने पर। एक्शन सीन्स को भरने में निर्देशक इतने खोए लगते हैं कि पटकथा को उन्होंने पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। और अफसोस की बात है कि एक्शन सीन्स में भी नयापन नहीं है। शुरुआत से लेकर अंत तक फिल्म बेहद ऊबाऊ और कहीं कहीं लॉजिक से परे लगती है। साथ ही कई दृश्य दोहराए से लगते हैं।
तकनीकी पक्ष
फिल्म के एक्शन और स्टंट सीन्स को कोरियोग्राफ करने के लिए अमेरिका, कोरिया, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका से एक्शन डायरेक्टर्स को शामिल किया गया था। लेकिन अफसोस है कि फिल्म के एक्शन दृश्यों में कोई नयापन नहीं दिखता है। जापानी के सिनेमेटोग्राफर Tetsuo Nagata ने अच्छा काम किया है। फिल्म की शूटिंग मध्य प्रदेश और बुडापेस्ट में हुई है, जिसे काफी भव्यता के साथ कैमरे में कैद किया गया है।
संगीत
फिल्म का संगीत कंपोज किया है शंकर- एहसान-लॉय और धुव्र घानेकर ने, जो कि बेहद कमजोर है। फिल्म का कोई भी गाना याद नहीं रहता। एक लोरी "सो जा रे" फिल्म में इतनी बार गाया जाता है कि उसे सुनकर दर्शक भी सो जाएं। खैर, अच्छी बात है कि गाने कहानी के साथ साथ चलते हैं, लिहाजा फिल्म की लंबाई प्रभावित नहीं होती।
देंखे या ना देंखे
कंगना रनौत की धाकड़ कहानी के मामले में इतनी कमज़ोर है कि थियेटर में फिल्म देखने के दौरान आप सिर्फ इसके खत्म होने का इंतज़ार करते हैं। बेहद कमज़ोर लेखन का नजीता है कि कंगना रनौत, अर्जुन रामपाल और दिव्या दत्ता जैसे कलाकार भी ध्यान आकर्षित नहीं पाते। फिल्मीबीट की ओर धाकड़ को 2 स्टार।


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