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    चुप फिल्म रिव्यू: आर बाल्की की इस बेहतरीन थ्रिलर के स्टार हैं दुलकर सलमान

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    Rating:
    3.5/5

    निर्देशक- आर बाल्की
    कलाकार- दुलकर सलमान, सनी देओल, पूजा भट्ट, श्रेया धनवंतरी

    "कागज के फूल बनाने वाले को कागज पर कलम चलाने वालों ने चुप करा दिया", गुरु दत्त को याद करते हुए डैनी (दुलकर सलमान) कहता है। आर बाल्की की ये कहानी सिनेमाप्रेमियों के लिए है। यहां निर्देशक एक फिल्म और समीक्षकों के बीच के रिश्ते को दिखाते हैं। दोनों ही सिनेमा से प्यार करते हैं और सिनेमाई जादू को महसूस करना चाहते हैं। कभी कुछ फिल्में समीक्षक के मानकों पर खरी उतरती है, तो कभी नहीं उतरती। लेकिन समीक्षक जो लिखते हैं या जिस तरह से लिखते हैं, उससे क्या कोई कहीं इतना प्रभावित हो रहा है कि वो जिंदगी की दिशा ही बदल ले! ये शायद हम कभी नहीं सोचते।

    खैर, यहां एक ऐसी इंटेंस थ्रिलर फिल्म की समीक्षा करनी है, जिसकी कहानी में एक सीरियल किलर फिल्म समीक्षकों को उनकी लिखी गई समीक्षा के लिए चुन चुन कर वीभत्स तरीके से मार रहा है! क्यों और कैसे? इसी जवाब के इर्द गिर्द घूमती है कहानी।

    कहानी

    कहानी

    फिल्म की शुरुआत होती है एक जाने माने समीक्षक नितिन श्रीवास्तव की बेरहम हत्या से। इंस्पेक्टर अरविंद माथुर (सनी देओल) इस हत्या की जांच कर ही रहे होते हैं कि इतने में दूसरी हत्या हो जाती है, फिर तीसरी.. सभी हत्याएं उतने ही वीभत्स तरीके से की जाती है और सभी मारे जाने वाले हैं 'फिल्म समीक्षक'। एक मनोरोगी मुंबई शहर में जाने माने फिल्म समीक्षकों को निशाना बना रहा है और पुलिस के पास इससे ज्यादा कोई सुराग नहीं है। वह कोई भी हो सकता है, एक असफल फिल्म निर्माता, एक नाराज अभिनेता या फिल्मों से प्यार करने वाला कोई मनोरोगी। इस केस में पुलिस का साथ देती हैं जेनोबिया (पूजा भट्ट), जो एक क्रिमिनल साइकोलॉजिस्ट हैं, और निला मेनन (श्रेया धनवंतरी), जो है एक एंटरटेनमेंट पत्रकार। शहर में माहौल ऐसा हो जाता है समीक्षक फिल्मों पर कुछ ही निगेटिव लिखना और बोलना ही बंद कर देते हैं। लेकिन फिर एक हत्या हो जाती है। ऐसे में पुलिस किस तरह हत्यारे तक पहुंचेगी और इस हत्याओं के पीछे की कहानी क्या है.. इस पर आगे की पटकथा बुनी गई है।

    अभिनय

    अभिनय

    सीता रामम के बाद दुलकर सलमान को इस फिल्म में देखना काफी दिलचस्प रहा। डैनी के जटिल किरदार को भी वो बड़ी सूक्ष्मता और सहजता के साथ निभाते हैं.. जो आपको हर फ्रेम से बांधे रखता है। एक साथ दो तरह की पर्सनालिटी को अभिनेता ने इतनी बखूबी दिखाया है कि आप उसकी दुनिया का हिस्सा महसूस करते हैं। दुलकर का अभिनय बेहद संतुलित रहा है। एक एंटरटेनमेंट पत्रकार की भूमिका में श्रेया धनवंतरी ने अच्छा काम किया है। वो काफी नैचुरल एक्टर हैं और ये खूबी बड़े पर्दे पर आकर्षित करती है। हालांकि यहां उनके किरदार को काफी सीमित रखा गया है।

    वहीं, कहना गलत नहीं होगा कि सनी देओल को बड़े पर्दे देखना किसी ट्रीट से कम नहीं है। दमदार संवाद हो या एक्शन सीन, यहां वो इंस्पेक्टर के किरदार बखूबी ढले नजर आए हैं। वहीं, सहायक रोल में पूजा भट्ट हैं और उन्हें लंबे समय के बाद बड़े पर्दे पर देखना मुझे अच्छा लगा। निला की मां के किरदार में सरन्या पोनवन्नन ने शानदार काम किया है। उनके किरदार को काफी मजेदार और अलग सा दृष्टिकोण दिया गया है, जो कहानी में भावनाओं का पुट जोड़ता है।

    निर्देशन

    निर्देशन

    एक निर्देशक के तौर पर आर बाल्की जिस तरह से एक कहानी को पर्दे पर लाते रहे हैं, वह हमेशा काफी दिलचस्प रहा है। इस दफा बाल्की और उनके लेखकों की टीम (राजा सेन और ऋषि विरमानी) ने फिल्म समीक्षकों और एंटरटेनमेंट पत्रकारों के काम को केंद्र बिंदु बनाकर कहानी लिखी है। उन्होंने कहानी को काफी दिलचस्प तरीके से एक मर्डर थ्रिलर में तब्दील किया है। जहां एक ऐसा मनोरोगी है, जिसे सिनेमा ने और खासकर गुरु दत्त की फिल्मों ने उसके कठिन समय में उसे उम्मीद दी। लेकिन जब उसके प्यार (सिनेमा और गुरु दत्त) को नीचा दिखाया जाता है, तो वह बदले की भावना लिए एक खास बदलाव लाने निकल पड़ता है। कहानी खासकर फर्स्ट हॉफ में काफी तेजी से आगे बढ़ती है, सभी किरदारों को स्थापित करती है और संस्पेंस से आपका पूरा ध्यान बांधे रखती है। लेकिन सेकेंड हॉफ में पटकथा कई जगह काफी खिंची हुई लगती है और आप सीधे क्लाईमैक्स का इंतजार करने लगते हैं।

    तकनीकी पक्ष और संगीत

    तकनीकी पक्ष और संगीत

    फिल्म की सिनेमेटोग्राफी काफी शानदार है। विशाल सिन्हा ने सिनेमा और गुरुदत्त को याद करते हुए, एक रोमांटिक गाने के जरीए यहां मुंबई और उसकी सिनेमाई जादू को बहुत खूबसूरती से दिखाया है। क्लाईमेक्स में गुरुदत्त से प्रेरित एक ऐसा फ्रेम है, जो सिनेमाप्रेमियों को जरूर हमेशा याद रहेगा। नयन भद्र की एडिटिंग फिल्म को मजबूत बनाती है.. खासकर फर्स्ट हॉफ में। सेकेंड हॉफ में कुछ हाई मोमेंट्स की दरकार थी। वहीं, फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर पर सराहनीय काम किया गया है।

    गुरु दत्त की क्लासिक फिल्म 'प्यासा' के चर्चित गाने 'जाने क्या तूने कहीं' और 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए' से बनाया गया शानदार बैकग्राउंड स्कोर एक रहस्यमय वातावरण बनाता है। लगभग 65 साल पहले लिखे गए साहिर लुधियानवी के शब्द आज भी प्रासंगिक लगते हैं और दिल छूते हैं। अमित त्रिवेदी द्वारा दिया गया संगीत कर्णप्रिय है।

    रेटिंग

    रेटिंग

    चुप की कहानी मूल रूप से संवेदनशील होने की बात करती है। यह सिनेमा को सेलिब्रेट, उससे प्यार और सम्मान देने की बात करती है। ऐसी सोच को कहानी में बदलकर बड़ी स्क्रीन तक लाना अपने आप में एक सराहनीय कदम है। फिल्म में थोड़ी बहुत कमियां हैं, लेकिन उससे यह एक बेहतरीन थ्रिलर बनने से नहीं चूकती है। फिल्मीबीट की ओर से 'चुप' को 3.5 स्टार।

    English summary
    Dulquer Salmaan, Sunny Deol, Pooja Bhatt and Shreya Dhanwanthary starrer film Chup: Revenge Of The Artist is releasing on 23rd September. This film is an immersive and intense thriiler by R Balki.
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