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    'बाटला हाउस' फिल्म रिव्यू

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    Rating:
    3.5/5

    Batla House Movie Review: John Abraham | Mrunal Thakur | FilmiBeat

    दिल्ली के एल-18 बटला हाउस में हुए एनकाउंटर पर आधारित है जॉन अब्राहम की फिल्म 'बाटला हाउस'। सितंबर 19, 2008 को दिल्ली के जामिया नगर इलाके में इंडियन मुजाहिदीन के संदिग्ध आतंकवादियों के खिलाफ मुठभेड़ हुई थी, जिसमें दो संदिग्ध आतंकवादी आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद मारे गए। जबकि दो अन्य भागने में कामयाब हो गए। वहीं, एक और आरोपी ज़ीशान को गिरफ्तार कर लिया गया। इस मुठभेड़ का नेतृत्व कर रहे एनकाउंटर विशेषज्ञ और दिल्ली पुलिस निरीक्षक मोहन चंद शर्मा इस घटना में मारे गए। इस एनकाउंटर के बाद देश भर में मानवाधिकार संगठनों का आक्रोश, राजनीतिक उठा पटक और आरोप- प्रत्यारोपों का माहौल बन गया और मीडिया में भी मामला लंबे समय तक गर्म रहा।

    फिल्म की कहानी

    फिल्म की कहानी

    13 सितंबर 2008 को दिल्ली में हुई सिलसिलेवार बम धमाकों की जांच के लिए डीसीपी संजीव कुमार यादव अपनी टीम के साथ बाटला हाउस एल-18 पहुंचते हैं। वहां के संदिग्ध आतंकियों के साथ हुए मुठभेड़ में एक अफसर घायल हो जाता है, जबकि अफसर के.के (रवि किशन) की मौत हो जाती है। यह मुठभेड़ तो कुछ वक्त में खत्म हो जाता है। लेकिन इसका प्रभाव दिल्ली पुलिस और खासकर संजीव कुमार यादव को लंबे समय तक शक के दायरे में लाकर खड़ा कर लेता है। उस दिन बाटला हाउस में पुलिस ने आतंकियों को मारा था? या विश्वविद्यालय में पढ़ने वालों मासूम बच्चों को सिर्फ मज़हब की आड़ में नकली एनकाउंटर में खत्म कर वाहवाही लूटनी चाही थी?

    मीडिया से लेकर सत्ताधारी की विरोधी राजनीतिक पार्टियां इसे फेक एनकाउंटर का नाम देती है। दिल्ली पुलिस मुर्दाबाद के नारे लगते हैं, लोग पुतले जलाते हैं। इस पूरे मामले में संजीव कुमार यादव को ना सिर्फ बाहरी उठा पटक से गुज़रना पड़ता है, बल्कि पोस्ट ट्रॉमैटिक डिसॉर्डर से भी जूझना पड़ता है। इस पूरे सफर में संजीव कुमार का साथ देती हैं उनकी पत्नी नंदिता कुमार (मृणाल पांडे)। फिल्म में उनका किरदार छोटा लेकिन अहम है। खास बात है कि फिल्म में कहीं भी पुलिस वालों का महिमा मंडन नहीं किया गया है। लिहाजा, यह संतुलित लगती है। कई शौर्य पुरस्कारों से सम्मानित डीसीपी संजय कुमार यादव खुद को और अपनी टीम को बेकसूर साबित कर पाते हैं या नहीं? यह देखने के लिए आपको सिनेमाघर की ओर रुख करना पड़ेगा।

    अभिनय

    अभिनय

    इसे जॉन अब्राहम की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में एक मान सकते हैं। डीसीपी संजीव कुमार यादव के किरदार में जॉन बेहद संयमित और मजबूत दिखे हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में जब वह कानून के सामने कटघरे में खड़े होते हैं तो गुस्सा और विवशता दोनों ही जॉन के चेहरे पर झलकती है। उनका एक संवाद भी है, जब वह वकील से कहते हैं- आपका और मेरा सच एक कैसे हो सकता है? आपने कभी सीने पर गोली खाई है?

    मृणाल ठाकुर ने अपने संक्षिप्त रोल को सच्चाई से निभाया है। बाकी सह कलाकार मनीष चौधरी, रवि किशन, वकील बने राजेश शर्मा और प्रमोद पाठक ने सराहनीय काम किया है। आतंकी आदिल अमीन के किरदार में क्रांति प्रकाश झा ने भी ध्यान बटोरा है। वहीं, नोरा फतेही को निर्देशक ने सिर्फ एक गाने भर के लिए ना रखकर एक अहम किरदार दिया है, यह फैसला हक में रहा है। इस वजह से 'साकी साकी' फिल्म में ढूंसा हुआ सा गाना नहीं लगता।

    तकनीकि पक्ष

    तकनीकि पक्ष

    तारीफ की बात यह है कि इस एनकाउंटर के बाद पैदा हुए हर दृष्टिकोण को फिल्म में शामिल किया गया है। कहानी आपको असंगत नहीं लगती है। रचनात्मक आजादी लेते हुए निर्देशक निखिल आडवाणी ने कुछ जोड़ घटाव भी किया है। खासकर फिल्म का फर्स्ट हॉफ मजबूती के साथ गुंथा गया है। जहां आपको पुलिस वालों के चेहरे पर हिम्मत, शिकन, मानसिक द्वंद, अपराधबोध, किसी को खोने का दर्द सब भली भांति दिखाया गया है।

    लगभग ढ़ाई घंटे में बनी यह फिल्म थोड़ी छोटी हो सकती थी। कुछ सीन दोहराए से लगते हैं, वहीं कुछ सीन सीटीमार संवाद के लिए बनाए गए हैं, जिसे छांटा भी जा सकता था। क्लाईमैक्स कोर्ट रूम ड्रामा को भी थोड़ा और प्रभावी बनाया जा सकता है, ताकि दर्शक उसी सोच को लेकर सिनेमाघर से बाहर निकलते। बहरहाल, 'बाटला हाउस एनकाउंटर केस' लंबे समय से सुर्खियों में रही थी, लिहाजा इस केस से सभी वाकिफ हैं। लेकिन फिर भी फिल्म में एक संस्पेंस कायम रखा गया है। इसका श्रेय रितेश शाह की स्क्रीनप्ले को जाता है। यह फिल्म के पक्ष में काम कर सकती है।

    देंखे या ना देंखे

    देंखे या ना देंखे

    इस 15 अगस्त थियेटर में परिवार के साथ कोई फिल्म देखना चाहते हैं और आप असल घटनाओं से जुड़ी फिल्मों को पसंद करते हैं.. तो बाटला हाउस जरूर जाएं। फिल्मीबीट की ओर से फिल्म को 3.5 स्टार।

    English summary
    Inspired by the 2008 Batla House encounter case, John Abraham's film Batla House is gritty, well researched and superly weaved. Film directed by Nikkhil Advani.
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