#FilmReview: बैंजो, हर रॉकस्टार रणबीर कपूर नहीं होता!
फिल्म - बैंजो
वो कंगना रनौत ने कहा था ना रीबॉक ना सही, रीबूक ही सही...बस ऐसा ही कुछ फील आएगा आपको रितेश देशमुख की ये नई फिल्म देखकर। और दुख ये है कि इसमें उनकी कोई गलती नहीं है।

अब आते हैं फिल्म के डायरेक्टर पर। रवि जाधव मराठी फिल्मों के बेहतरीन डायरेक्टर माने जाते हैं, लेकिन बॉलीवुड की खासियत है, यहां फिल्म की शैली दर्शक के हिसाब से बदल जाती है। बैंजो में कुछ गलत नहीं है, फिल्म की स्टारकास्ट के अलावा।
अब आते हैं तीसरी बात पर जो फिल्म का प्लॉट भी है। तो भईया कुछ फिल्में होती हैं जो महान बन जाती है। और फिर उस क्षेत्र में आप कुछ भी बनाएं तो ये सोच कर बनाएं कि अगर उस महान फिल्म के 100 मीटर के दायरे में भी आने की आपने कोशिश की तो आपको महंगा पड़ सकता है और बैंजो ऐसी ही एक फिल्म।
प्लॉट
बैंजो है आमची मुंबई का एक लोकल बैंड की, जो कभी-कभी किसी महोत्सव में अपनी कला दिखाता है, मगर इन्हें लगता है कि वे अपनी इस कला को अपना भविष्य बना सकते हैं। और उन्हें ये यकीन दिलाती हैं नरगिस फखरी जो विदेश से आई हैं और इसलिए उनकी अजीब सी हिंदी माफ है।
डायरेक्शन
रवि जाधव बेशक अच्छे डायरेक्टर होंगे पर बैंजो को उन्होंने एक्शन और ड्रामा से भरपूर, कॉमेडी के पंचलाइन डालकर पूरी कॉमर्शियल फिल्म बनाने की कोशिश की है। और इसमें उनका मुद्दा खो जाता है, डूबती हुई लोक कला। ये गलती इससे पहले यशराज फिल्म्स ने आजा नच ले में की थी। लेकिन बैंजो और बुरी तरह विफल नज़र आती है। क्योंकि रवि कहानी शुरू करते हैं पर कहीं भी उसे पकड़ ही नहीं पाते।
अभिनय
रितेश देशमुख ने कोशिश की है कि वो अपनी भूमिका के साथ न्याय करें पर वो कन्फ्यूज़ नज़र आते हैं। कहीं पर एक्शन, कभी ड्रामा, कभी कॉमेडी, कभी रोमांस, उनके कैरेक्टर में इतनी परत हैं कि वो किसी एक पर फोकस कर ही नहीं पाते।
नरगिस फखरी ने वैसे भी आज तक ज़्यादा कुछ किया नहीं और यहां भी वो यही करती नज़र आती हैं। हालांकि डांस उन्होंने ठीक किया है पर बाकी फिल्म में वो आपको ऊबा देंगी।
फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट ठीकठाक है। डांस मास्टर धर्मेश में अच्छा टैलेंट है और वो यहां भी उसे दिखाते हुए नज़र आते हैं।
निगेटिव पक्ष
रवि जाधव की सबसे बड़ी कमी है फिल्म की स्टारकास्ट जो कहीं से भी फिल्म में फिट नहीं बैठती। एक रॉक बैंड में रितेश देशमुख बहुत ही हद तक मिसफिट हैं। ऊपर से रोमांस करते हुए वो कंफर्टेबल नहीं लगते। फिल्म इतनी फिल्मों से मिलती है कि पूछिए मत। कहानी बिल्कुल नॉर्मल है। और आपको पता है कि कहानी यही है। गली से उठकर मशहूर बनने तक की।
मज़बूत पक्ष
फिल्म का मज़बूत पक्ष है फिल्म का म्यूज़िक। विशाल शेखर ने फिल्म के म्यूज़िक पर मेहनत की है और वो दिखी है। लेकिन फिल्म के साथ ही फिल्म का म्यूज़िक भी जहां तक उम्मीद है, इग्नोर कर दिया जाएगा।


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