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    'आर्टिकल 15' फिल्म रिव्यू: जातिवाद का भयानक चेहरा दिखाती है आयुष्मान खुराना की फिल्म

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    Rating:
    4.0/5

    Article 15 Movie Review: Ayushmann Khurrana | Anubhav Sinha| Manoj Pahwa |FilmiBeat

    'मैं और तुम इन्हें दिखाई ही नहीं देते हैं। हम कभी हरिजन हो जाते हैं तो कभी बहुजन हो जाते हैं। बस जन नहीं बन पा रहे कि जन गण मन में हमारी भी गिनती हो जाए। इंसाफ की भीख मत मांगो बहुत मांग चुके।'

    एक क्रांतिकारी दलित के किरदार में जब मोहम्मद ज़ीशान अयूब फिल्म में यह संवाद बोलते हैं, तो एक विवशता, एक गुस्सा उनके चेहरे पर दिखाई देता है। यह बेबसी आपको असहज करेगी। फिल्म में कई दृश्य और संवाद ऐसे हैं, जो जातिवाद पर सीधा प्रहार करते हैं। इसे निर्देशक अनुभव सिन्हा का साहस कहेंगे कि उन्होंने बिना तोलमोल के इस संवेदनशील विषय को बड़ी ही बेबाकी और ईमानदारी से सामने रखा है। यदि यह आपको असहज करती है तो अच्छी बात है, क्योंकि सच्चाई इतनी ही क्रूर है।

    Article 15 Movie Review

    'आर्टिकल 15' राज्य को धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर किसी नागरिक के साथ भेदभाव करने से रोकता है।

    यह फिल्म इसी मुद्दे को सामने रखती है, जिसे जानते हैं तो सभी हैं, लेकिन शायद मानते नहीं। यह मानसिकता पर प्रहार करती है और फिल्म खत्म होने के बाद भी सोचने को मजबूर करती है। लंबे समझ के बाद, या यूं कह लें कि गिनी चुनी फिल्मों के बाद जातिवाद पर प्रहार करती कोई फिल्म आई है।

    फिल्म की कहानी

    फिल्म की कहानी

    फिल्म की कहानी एक लोकगीत से शुरु होती है, जहां से निर्देशक आधार सामने रख देते हैं। आईपीएस अयान रंजन (आयुष्मान खुराना) सेंट स्टीफन से पढ़े लिखे हैं, विदेश से लौटे है और उनकी नई पोस्टिंग उत्तर प्रदेश के लालगांव में हुई है। अयान के आते ही उसे पता चलता है कि गांव से तीन दलित बच्चियां लापता हैं। जब तक उन्हें माहौल और केस समझने का मौका मिलता, अगले ही दिन तीन में से दो बच्चियों की लाश पेड़ से लटकी पाई जाती है। जबकि एक लड़की गुमशुदा रहती है। तलाशी और पूछताछ में सामने आता है कि एक वर्ग विशेष को उनकी औकात दिखाने के लिए ना केवल उनकी बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया बल्कि मारकर पेड़ से लटका दिया गया। अयान को ये बातें अदंर तक झंझोर देती हैं और साथ ही दर्शकों को भी। क्लाईमैक्स तक जाते जाते फिल्म कई परतों में खुलती है।

    फिल्म की कहानी

    फिल्म की कहानी

    अयान जब इस मामले के तह तक जाने की कोशिश करता है तो समाज का और भी भयानक चेहरा उसके सामने आने लगता है। जातिवाद का जहर वहां के मंत्री से लेकर मंहत और थानेदार तक फैला है, जिसे निकालना काफी मुश्किल है। पुलिस अफसर ब्रह्मदत्त (मनोज पाहवा) अयान को जातिवाद के दलदल से बाहर रहने की चेतावनी देता हुआ कहता है- ''आप लोगों का तो ट्रांसफर हो जाता है, हमें मार दिया जाता है।''

    लेकिन अयान की ईमानदारी ही उसका सबसे बड़ा हथियार है। कहीं ना कहीं फिल्म हमें एक उम्मीद भी देती है। उम्मीद एक बदलाव की, ईमानदारी की, एक अच्छे कल की। अयान की गर्लफ्रैंड अदिति (ईशा तलवार) फोन पर उसे बोलती है, ''मुझे हीरो नहीं चाहिए बल्कि एक ऐसा इंसान चाहिए जो हीरो का इंतजार ना करे।''

    अभिनय

    अभिनय

    सिर्फ लेखन ही नहीं, स्टारकास्ट के मामले में भी फिल्म बहुत दमदार है। ईमानदार आईपीएस के किरदार में आयुष्मान छाप छोड़ जाते हैं। बॉलीवुड में इस पुलिस अफसर को लोग लंबे समय तक याद रखेंगे। वहीं, कुमुद मिश्रा, मनोज पाहवा, सयानी गुप्ता अपने अपने किरदारों में उम्दा हैं। मोहम्मद जीशान अयूब कम वक्त के लिए हैं, लेकिन प्रभावशाली हैं।

    निर्देशन व तकनीकि पक्ष

    निर्देशन व तकनीकि पक्ष

    फिल्म कुछ असल घटनाओं से प्रेरित है। अनुभव सिन्हा का निर्देशन और गौरव सोलंकी के साथ किया गया उनका लेखन फिल्म को गहराई देता है। कुछ सीन बहुत ही उम्दा हैं, जहां बिना किसी संवाद के भी निर्देशक प्रसंग समझाने में सफल रहे हैं। मंगेश धाकड़े का संगीत प्रभावशाली है। फिल्म की सबसे तर्कसंगत बात है कि शुरु से लेकर अंत तक फिल्म अपने विषय नहीं भटकती।

    जरूर देंखे

    जरूर देंखे

    अनुभव सिन्हा की 'आर्टिकल 15' एक महत्वपूर्ण फिल्म है। बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक को समता का अधिकार हमारे संविधान में दिया गया एक मूलभूत अधिकार है। और फिल्म इस बात को सीधा सीधा कहती है। हमारी ओर से फिल्म को 4 स्टार।

    English summary
    With 'Article 15', director Anubhav Sinha and writer Gaurav Solanki borrow a leaf out of a real-life incident and spin a hard-hitting narrative which makes you realize how deep the caste-based crimes run in our society.
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