युवा चाहते हैं बड़े भी देखें अक्षय को और कहें 'ओह माई गॉड'
अहमदाबाद (कन्हैया कोष्टी)। यामिनी सिनेमा हॉल से निकली और घर पहुँची। चेहरे पर मुस्कान थी। पति जल्पेश के साथ ओह माय गॉड (ओएमजी) देख कर वह घर पहुँची और घर पहुँचते ही उसने अपनी सास से कहा, 'हम आपकी और पापा (ससुर) के लिए टिकट मंगवा देंगे। आप दोनों यह फिल्म जरूर देखने जाइए।'
कैसा लगा यह संवाद। जल्पेश और यामिनी नाम सुन कर पहली ही नजर में स्पष्ट लगता है कि यह एक युवा युगल है। आज के जमाने में न तो जय संतोषी माँ, रामायण, भक्त प्रह्लाद, महाभारत, राजा हरिश्चंद्र जैसी फिल्में बनती हैं और न ही एक फूल दो माली, आराधना या फिर ऐसी ही अनेक पुरानी फिल्मों जैसी फिल्में बनती हैं, जो गीतों और कहानियों से कर्णप्रिय व दर्शनीय होती थीं। पीढि़याँ बदलीं, जमाना बदला, आधुनिक तकनीकें जुड़ती गईं, नई पीढ़ी की दिलचस्पी बदलती गई, उसी के मुताबिक अब फिल्में बनती हैं। इसमें न तो फिल्मों का दोष है और न ही उनके निर्माता-निर्देशकों का। ऐसी स्थिति में पुरानी पीढ़ी के लोग अब ज्यादातर नई फिल्में देखना पसंद नहीं करते।
नई फिल्मों के प्रति पुरानी पीढ़ी की इस नकारात्मक भावना के बीच जल्पेश-यामिनी जैसा युवा युगल अपने बड़ों को ओएमजी देखने के लिए न केवल प्रेरित करता है, बल्कि टिकट तक लाकर देने को तैयार है। आखिर क्या है ऐसा इस फिल्म में। खैर फिल्म में जो है, वह तो अब जगजाहिर हो चुका है। फिल्म का स्पष्ट संदेश तो हम पहले भी बता चुके हैं कि हमें भगवान को ढूँढने के लिए मंदिरों-मस्जिदों-गिरजाघरों-गुरुद्वारों में जाने की जरूरत नहीं है। वह हमारे भीतर ही है।
दरअसल युवा पीढ़ी इस फिल्म से इस कदर प्रभावित हुई है कि वह अपनी पुरानी पीढ़ी यानी अपने बड़ों के मन में बनी वह भ्रांति हटाने को कहती है कि हर नई फिल्म मसालेदार या फिर धूमधड़ाके वाले संगीत को ही नहीं परोसती।
रिलीझ होने के दो सप्ताह बाद ओएमजी देखने वाले निखिल ने भी कहा कि यह फिल्म अंधविश्वास और धर्म के नाम पर होने वाले ढोंग को धता बताती है। हकीकत में हमारे बड़े हमें बचपन से मंदिरों में ले जाते हैं और मूर्ति स्वरूप बैठे ईश्वर को ही हम ईश्वर मानते हैं। ऐसा नहीं कि उस मूर्ति में ईश्वर नहीं है, लेकिन ईश्वर का साक्षात्कार मात्र और मात्र अनुभव का विषय है। यह बात गीता जैसे ग्रंथ भी साबित करते हैं। इसके बावजूद हम भगवान को सीमित मंदिरों में ढूंढते हैं, जो व्यापक में है। जो कण-कण में है, उसे किसी एक मूर्ति में ही क्यों देखा जाए।
अगर युवा पीढ़ी यह फिल्म देख कर इतनी प्रभावित है, तो इसका एक कारण यह भी है कि प्रतिस्पर्धा के इस दौर में आज की युवा पीढ़ी जहाँ सफलताएँ पाने की लगन में खूब मेहनत करने को तत्पर है, वहीं वह अपनी इस मेहनत में ईश्वर का सहयोग भी चाहती है। यही कारण है कि आज आप किसी भी मंदिर में चले जाएँ, वहां वृद्धों के मुकाबले युवा दर्शनार्थियों की संख्या ज्यादा होती है। ऐसे में यदि युवा पीढ़ी इस फिल्म के सार को समझ जाए और अपने भीतर, आत्मचिंतन के जरिए ईश्वर का सहयोग प्राप्त करने की कोशिश करने की सीख ले, तो यह सीख वर्षों से पुरानी परम्परा में जीते आए हमारे बुजुर्गों को भी लेनी ही चाहिए। शायद इसीलिए युवा पीढ़ी अपने बड़ों को यह फिल्म दिखाने को आतुर दिखती है।


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