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'प्रेम के बग़ैर सिनेमा नही बन सकता'

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यश चोपड़ा 30 से ज़्यादा फ़िल्में बना चुके हैं
उनसे पहले यह सम्मान सत्यजीत रे, अमिताभ बच्चन और शाहरूख़ खान को दिया जा चुका है .

दिल्ली में सम्मान समारोह के बाद पत्रकार रामकिशोर पारचा ने उनसे बात की.

पहले दादा साहेब फ़ाल्के सम्मान और अब फ्रांस का सबसे बड़ा सम्मान. कैसा लगता है? क्या आपकी यात्रा पूरी हो गई?

पचास साल का यह सफ़र रोमांचक है पर सबसे बड़े सम्मान का मतलब यह नहीं कि किसी का कैरियर समाप्त हो गया. ये केवल आदमी की ज़िम्मेदारी बढ़ा देते हैं. यह भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री की रचनात्मकता और देश से जुड़ा है. दुनिया मान रही है कि भारतीय सिनेमा रचनात्मकता की नई परिभाषा बुनने में कामयाब रहा है.

लेकिन 'चक दे इंडिया' के बाद यशराज बैनर कामयाबी से लगातार दूर है. आपकी कई फिल्में लगातार असफल रही हैं?

यह एक दौर है. आप हमेशा अपने हिसाब से सिनेमा नही बना सकते. समय के साथ कहानियाँ और पटकथाएँ बदल जाती हैं. इस मामले में मैं हमेशा फ्रेंच सिनेमा का कद्रदान रहा हूँ. वे अपनी हर फ़िल्म में एक नई कहानी और विचार लेकर सामने आता है. मैं हमेशा कहता रहा हूँ कि हमें उनके यहाँ कहानियो और पटकथाओं के लिए लगने वाली कार्यशालाओं में हिस्सेदारी करनी चाहिए.

'वीर ज़ारा' के बाद निर्देशन में आपकी हिस्सेदारी कम क्यों हो गई?

ऐसी बात नहीं. इस बीच हमने आदित्य, शाद अली, शिमित अमीन, संजय गडवी और कुणाल कोहली जैसे कई युवाओं को निर्देशन की बागडोर सौंपी जिन्होंने भारतीय दर्शकों का एक नए तरह के सिनेमा से परिचय करवाया. मैं आत्मविश्लेषण के दौर में रहा. अब फरवरी-मार्च में मैं अपनी नई फ़िल्म शुरू करूँगा पर जब तक कोई नया विचार मुझे प्रभावित नही करता मैं फ़िल्म बनाने के बारे में नही सोचता.

यश चोपड़ा की कुछ फ़िल्में दीवार त्रिशूल दाग़ सिलसिला वीर ज़ारा आदमी और इंसान चाँदनी लम्हे धूल का फूल

अपने दोनों बेटों के बारे में क्या सोचते हैं. बतौर निर्देशक आदित्य तो सफल रहे मगर उदय नहीं चल पाए?

वे दोनों मेहनती हैं पर कई बार ऐसा हो जाता है. हमारे यहाँ ऐसे कई लोग हैं जो हीरो बनने आए और बाद में निर्देशन करने लगे.

आपने अपने भाई बीआर चोपड़ा के साथ काम शुरू किया लेकिन लोगों का मानना है कि आप उनसे आगे निकल गए?

नहीं. मैं आज जो कुछ भी हूँ उनके ही कारण हूँ. मैंने उनके साथ 'धूल का फूल', 'आदमी और इंसान' जैसी जो फिल्में बनाई मैं उन्हें चाहकर भी नही दोहरा पाया. मैंने अपना बैनर भी काफ़ी बाद में बनाया.

और उसमें 'दाग़' से लेकर 'वीर ज़ारा' तक आप प्रेम त्रिकोण को बार-बार दोहराते रहे?

प्रेम के बगैर सिनेमा नही बन सकता . मैंने उसमे प्रेम और स्त्री की अस्मिता ही बात दोहराने की कोशिश की. चाहे वो 'चांदनी' हो 'लम्हे' या फिर 'सिलसिला'.

बिग बी और किंग खान को दोहराने का आपका सिलसिला भी चलता रहा?

मैं लकी रहा कि मैंने अमिताभ के साथ अपने करियर की 'दीवार,' 'त्रिशूल' और 'सिलसिला' जैसी सर्वश्रेष्ठ फिल्में बनाईं. वे हमारे सिनेमा के लिए उपलब्धि जैसे हैं, जिनका वास्ता सिनेमा देखने वाली कई पीढ़ियों से है और शाहरूख़ हमारे नए सिनेमा के विकसित चेहरे का आईना हैं. मैं इनके साथ बार-बार काम करना चाहता हूँ. उनके साथ कभी भी सिनेमा में प्रयोग किया जा सकता है.

पर आपने 'लम्हे' में जो प्रयोग किया वो लोगों को पसंद नही आया?

मैंने हमेशा नारी को एक नए रूप में परदे पर दिखाने की कोशिश की. हमें नारी के विभिन्न स्तरों को पहचानना चाहिए.

आपको लगता है कि भारतीय सिनेमा अब विश्व स्तर पर आ गया है?

यह तो पचास के दशक से से ही शुरू हो गया था. सत्यजीत रे, अदूर गोपालकृष्णन. मृणाल सेन से लेकर महबूब खान, बिमल रॉय इसके उदाहरण हैं.

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