जब 'कमीने' हिट है तो 'साली' पर एतराज क्यों?

अचरज तो तब होता है जब अचानक से सोया हमारा सेसेर बोर्ड जाग उठा है और उसने सुधीर मिश्रा की आने वाली फिल्म...ये साली...के टाईटल पर आपत्ति दर्ज करायी है, और निर्देशक साहब ने सफाई देते हुए कहा है कि साली कोई गाली नहीं है ये तो एक खूबसूरत रिश्ता है। फिल्म के बैनर और पोस्टरों पर काफी खर्चा हो गया है इसलिए नाम बदलना मुश्किल है।
मिश्रा ने कहा कि हमने 1 अक्टूबर 2010 को ही फिल्म के प्रोमो सेंसर बोर्ड को भेज दिए थे, जिसे पास कर दिया गया। अब अचानक नाम पर आपत्ति क्यों? मुझे लगता है कि शर्मिला जी को टाइटल से निजी आपत्ति है। वैसे साली कोई गाली नहीं होती। सभी इसका इस्तेमाल रोजमर्रा की जिंदगी में करते हैं।
इसमें मिश्रा की कोई गलती नहीं है उन्होंने बड़ी ही सफाई से कह दिया कि साली तो एक रिश्ते का नाम है, हमारा सवाल सेसंर बोर्ड से है जो हमेशा निष्क्रिय रहता है। आज वो साली पर उंगलिया उठा रहा है तो कल वो कहां था जब विशाल भारद्वाज की कमीने धूम मचा रही थी। कमीने तो कोई रिश्ता नहीं होता आखिर उस समय फिल्म के निर्देशक से नाम बदलने को क्यों नहीं कहा गया?
यहां पर सुधीर मिश्रा की बात वाजिब लगती है कि शर्मिला टैगोर अपनी निजी राय के तहत फिल्म का टाईटल बदलने को कह रही है। ये तो हमारी दुनिया का नियम है कि अगर एक कोई गलती से सफल हो जाता है तो लोग उसी को फॉलो करने लगते है इसलिए अगर बॉलीवुड में कमीने हिट हो सकता है तो साली भी रंग जमा सकती है।
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