अभिनेत्रियों को सिर्फ ग्‍लैमर के लिए फिल्‍म में रखा जाता है: सुधीर मित्रा

Sudhir Mishra
मुंबई। 'हजारों ख्‍वाहिशें ऐसी', 'धारावी' और 'चमेली' जैसी फिल्‍मों का निर्देशन कर चुके डायरेक्‍टर सुधीर मित्रा का कहना है कि फिल्‍मों में अभि‍नेत्रियों की प्रतिभा के साथ न्‍याय नहीं किया जाता है। उन्‍हें सिर्फ ग्‍लैमर परोसने के लिए फिल्‍म में रखा जाता है। सच तो यह है कि अभिनेत्रियों को उनकी प्रतिभा के आधार पर फिल्‍म में नहीं चुना जाता है।

इसका कारण पूछने पर सुधीर ने बताया कि जब से फिल्‍म इं‍डस्‍ट्री को एक निवेश की जगह के रूप में देखा जाने लगा है, तबसे अभिनेत्रियों का इस्‍तेमाल सिर्फ ग्‍लैमर परोसने के लिए होता है क्‍यों‍कि निवेशकों को अपना पैसा निकालना होता है। फिल्‍म 'जाने भी दो यारों' से बतौर असिस्‍टेंट डायरेक्‍टर अपने करियर की शुरूआत करने वाले सुधीर का यह भी मानना है कि व्‍यावसायिकता के इस दौर में भी पैरलल सिनेमा ने अपनी अलग पहचान बना रखी है और फिल्‍मों में महिलाओं को सशक्‍त किरदारों में प्रस्‍तुत किया है।

1950 के दशक में आयी 'मुगल ए आजम' और 'मदर इंडिया' इसका एक सटीक उदाहरण है। सुधीर ने बताया कि गुरूदत्‍त ने भी अपनी फिल्‍मों में महिलाओं को एक सशक्‍त रूप में दिखाया लेकिन 1990 के बाद व्‍यावसायिकता ने फिल्‍मी पर्दे पर अभिनेत्रियों को एक 'ग्‍लैमर डाल' के रूप में ही दिखाया। ऐसी फिल्‍में कम ही आती है जिनमें महिलाओं की भूमिका सशक्‍त हो।

सुधीर ने कहा कि अगर वह अपनी फिल्‍मों में महिलाओं को एक मजबूत किरदार में दिखाते हैं तो इसका कारण उनका पालन पोषण है। मेरी जिंदगी पर मेरी मां और मेरी दादी का विशेष प्रभाव रहा है।

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