वी.के.मूर्ति को मिला दादा साहब फाल्के सम्मान

आधुनिक और परिष्कृत तकनीकी का इस्तेमाल कर उन्होंने दृश्यों को और कलात्मक बनाया। उन्होंने वर्ष 1959 में भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म 'कागज के फूल' में सिनेमोटोग्राफी की थी। वह गुरुदत्त के सभी फिल्मों के सिनेमेटोग्राफर रहे। मूर्ति ने 'जिद्दी' (1948), 'बाजी' (1951), 'जाल' (1952), 'प्यासा' (1957) और 'चौदहवीं का चांद' (1960) के साथ ही अन्य फिल्मों में भी सिनेमोटोग्राफी की थी।
मूर्ति का जन्म सन् 1923 में हुआ था। वह करीब पांच दशक तक मुंबई फिल्म नगरी में काम करने के बाद इन दिनों बेंगलुरू में रह रहे हैं। मूर्ति को यह सम्मान राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील देंगी लेकिन अभी इसकी तारीख तय की जानी है। मूर्ति को 10 लाख रुपये, एक स्वर्ण कमल और शॉल ओढ़ा कर सम्मानित किया जाएगा। प्रति वर्ष फिल्मों में उल्लेखनीय योगदान के लिए सरकार दादा साहब फाल्के सम्मान प्रदान करती है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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