बचपन में इस एक्ट्रेस के मां-बाप और भाई की हुई हत्या, रिश्तेदारों ने मिलकर टुनटुन के साथ गंदा काम...

Uma Devi Khatri Struggle Story

Uma Devi Khatri Struggle Story: सिनेमा जगत में ऐसे बहुत से कलाकार हैं, जिनकी जिंदगी में बहुत मुश्किलें थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने खूब नाम कमाया। आज हम आपको एक ऐसी ही स्टार की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिन्हें लोग 'टुनटुन' के नाम से जानते थे। वह भारत की पहली महिला कॉमेडियन थीं, जिन्होंने लोगों को खूब हंसाया, लेकिन उनकी अपनी जिंदगी बहुत दर्द भरी रही।

बचपन में ही अनाथ हो गईं थीं टुनटुन

उमा देवी खत्री का जन्म साल 1923 में उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ था। जब वह सिर्फ ढाई साल की थीं, तब जमीन के झगड़े में उनके माता-पिता को मार दिया गया। इसके बाद उनके भाई ने उनका ख्याल रखा, लेकिन जब वह 9 साल की हुईं, तो उनके भाई की भी हत्या कर दी

भाई की मौत के बाद टुनटुन बिल्कुल अकेली हो गई थीं। उन्हें रहने के लिए अपने रिश्तेदारों के पास जाना पड़ा, लेकिन वहां भी उनकी मुश्किलें कम नहीं हुईं। रिश्तेदारों ने उन्हें घर की नौकरानी बनाकर खूब परेशान किया। इस वजह से टुनटुन कभी स्कूल भी नहीं जा पाईं। लेकिन उन्हें बचपन से ही गाने का बहुत शौक था और वह रेडियो सुनकर रियाज करती थीं।

एक दिन उनकी मुलाकात अख्तर अब्बास काजी से हुई, जो उनके गाने के हुनर से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने टुनटुन से वादा किया कि वह उनकी मदद करेंगे। लेकिन भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद अख्तर पाकिस्तान चले गए। फिर भी भगवान ने टुनटुन के लिए एक और रास्ता खोल दिया। उनकी मुलाकात एक ऐसी लड़की से हुई, जो फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को जानती थी। वह टुनटुन को मुंबई ले आई और उनकी मुलाकात गोविंदा के माता-पिता से करवाई। गोविंदा के माता-पिता ने टुनटुन की मुलाकात कई डायरेक्टर्स से करवाई।

आखिरकार, उनकी मुलाकात मशहूर संगीतकार नौशाद से हुई। नौशाद को उनकी आवाज इतनी पसंद आई कि उन्होंने टुनटुन को फिल्म 'दर्द' (1947) में गाने का मौका दिया। 'अफसाना लिख रही हूं' गाना इतना हिट हुआ कि टुनटुन रातोंरात स्टार बन गईं। इसी गाने को सुनकर अख्तर अब्बास काजी पाकिस्तान से वापस आए और उन्होंने टुनटुन को शादी के लिए प्रपोज किया। 1947 में दोनों ने शादी कर ली।

शादी के बाद टुनटुन ने बच्चों के लिए सिंगिंग छोड़ दी, जिससे उनका वजन काफी बढ़ गया। बाद में जब उन्होंने वापसी की सोची, तो नौशाद ने उन्हें एक्टिंग करने की सलाह दी। टुनटुन ने शर्त रखी कि वह तभी एक्टिंग करेंगी, जब उनकी पहली फिल्म में हीरो दिलीप कुमार होंगे। उनकी यह इच्छा पूरी हुई और उन्होंने 1950 में फिल्म 'बाबुल' से एक्टिंग में डेब्यू किया।

टुनटुन ने कई फिल्मों में काम किया और वह भारत की पहली महिला कॉमेडियन के रूप में मशहूर हो गईं। 1992 में उनके पति अख्तर अब्बास काजी का निधन हो गया, जिसके बाद उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली। 2003 में टुनटुन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी जिंदगी भले ही मुश्किलों से भरी रही, लेकिन उनकी कॉमेडी और गाने आज भी लोगों को याद हैं।

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