तपन सिन्हा को दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड

तपन सिन्हा ने बंगाली और हिंदी में काबुलीवाला, अतिथि, उपहार और एक डॉक्टर की मौत जैसी बेहतरीन फ़िल्में बनाई हैं.
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1946 में कोलकाता के न्यू थीएटर में साउंड इंजीनियर के तौर पर की थी. 1950 में उन्हें ब्रिटेन के पाइनवुड स्टूडियो में काम करने का मौका मिला.
भारत लौटने के बाद उन्होंने उड़िया, बांग्ला और हिंदी में फ़िल्में बनाना शुरु किया.
मुख्य फ़िल्में
उनकी फ़िल्मों में अधिकतर आम आदमी की समस्याओं का सीधा-सपाट चित्रण देखने को मिलता है.
भारत की आज़ादी की 60वीं वर्षगाँठ पर उन्हें सरकार ने लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया था.
1956 में आई उनकी काबुलीवाला को बेहद पसंद किया गया. उनकी फ़िल्म में छबि बिसबास और काली बैनर्जी ने काम किया था. उसे बाद में हिंदी में भी बनाया गया. बर्लिन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में काबुलीवाला को संगीत की श्रेणी में पुरस्कृत किया गया था.
1991 में आई उनकी फ़िल्म एक डॉक्टर की मौत को भी ख़ूब सराहा गया. सामाजिक ताने-बाने से जूझते एक प्रतिभावान डॉक्टर की कहानी बयां करती इस फ़िल्म को दूसरी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.
साथ ही तपन सिन्हा को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और पंकज कपूर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था. उन्होंने बावर्ची जैसी फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिखी और कई फ़िल्मों का निर्माण भी किया.


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