मुसलमान भारत में सबसे ज़्यादा सुरक्षित: तबस्सुम

By रामकिशोर पारचा

तबस्सुम अब तक कई सम्मान और पुरस्कार हासिल कर चुकी हैं
अभिनेत्री और एंकर तबस्सुम ऐसी शख़्सियत हैं जिनके ज़िक्र के बिना भारतीय सिनेमा और टीवी की बात पूरी नहीं होती. रामकिशोर पारचा से उनकी बातचीत...

पंजाबी हिंदू पिता और मुस्लिम माँ की इस अभिनेत्री बेटी के बारे में कहा जा सकता है कि वे इंडस्ट्री में ही नहीं बल्कि समाज में भी आज़ादी के पहले से लेकर आजादी के बाद तक राष्ट्रीयता और धर्म निरपेक्षता की मिसाल हैं. हमने उनसे उनके ही बारे में कुछ सवाल पूछे--

आप अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में कुछ बताएं?

मेरे पिता अयोध्यानाथ पंजाबी हिंदू थे और मेरी माँ एक कट्टर मुस्लिम परिवार से. उनका प्रेम दोनों संप्रदायों को पसंद नही आया. तब आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानंद ने मेरी माँ को धर्मपुत्री बनाकर नया नाम शान्ति देवी दिया. इस मसले को लेकर स्वामी जी की हत्या कर दी गई.

आज़ादी के बाद दोनों कोलकाता चले गए क्योंकि लाहौर के बाद इंडस्ट्री वहीं थी. बाद में पूना होते हुए मुंबई आए. जब महबूब खान साहब ने गोविन्दा के पिता अरुण आहूजा को हिन्दी ठीक से न आने पर वापस कर दिया तो उन्हें हिन्दी और संस्कृत मेरी माँ ने ही सिखाई. अनिल शर्मा ने जब ग़दर की कल्पना की तो उस कहानी का आधार मेरे माता पिता की कहानी ही थी.

तो क्या बाद में आपने भी अपने माता पिता के प्रेम की परम्परा का निर्वाह किया?

(हंसती हैं) मैंने जानबूझ कर ऐसा कुछ नहीं किया, बस यह हो गया. लेकिन इस समय अपने रोमांस के बारे में बात करते हुए अच्छा नहीं लगता. मेरे परिवार के दोनों लोग एक दूसरे को जानते थे. अरुण गोविल उस समय बहुत छोटा था जब मेरी मुलाक़ात उनके बड़े भाई विजय गोविल से हुई.

पूरी दुनिया में आज तक आपसे अधिक और इतने सारे माध्यमों में किसी ने काम नहीं किया?

यह मेरी खुशकिस्मती है कि मेरे साथ इंडस्ट्री और टीवी की छह पीढ़ियाँ जुड़ी हैं. मैंने ढाई साल की उम्र में काम शुरू किया था. टीवी पर आज जो रियलिटी शो की दुनिया है, सही मायनों में उसकी शुरुआत मेरे स्टेज शो 'तबस्सुम हिट परेड' से ही हुई थी. सुनिधि चौहान, जॉनी लीवर और फाल्गुनी पाठक सबसे पहले मेरे ही शो में प्रतिभा दिखाने सामने आए थे.

और आपकी प्रतिभा की शुरुआत, आप तो इंडस्ट्री छोड़ना भी चाहती थी न?

तक़दीर के बाद घर वालों की मर्ज़ी नही थी कि मैं फिल्मों में काम करूँ. शांताराम से अलग होकर बाबूराव ने नर्गिस को लेकर यह फ़िल्म बनाई थी. मैंने उनकी छोटी बहिन की भूमिका की थी. उसके बाद सोहराब मोदी मंझधार में मुझे लेना चाहते थे तब राजेन्द्र कृष्ण और ओपी दत्ता ने कहा पैसे ज़्यादा मांगो, वो नहीं दे पाएंगे. मैंने दस हजार मांग लिए और मैं हैरान थी कि वे मान गए. इसके बाद करीब डेढ़ सौ फिल्में कीं और मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने बिमल रॉय की पहली फ़िल्म 'बाप बेटी' में नायिका की भूमिका की.

भारतीय टीवी की बात आपके बग़ैर पूरी नहीं होगी लेकिन आपने कभी किसी टीवी शो में अभिनय नहीं किया?

मैंने करीब तीस साल टीवी पर काम किया. मैंने उस समय 'फूल खिले हैं गुलशन गुलशन' शुरू किया जब कोई दूरदर्शन पर फ़िल्मी शो के बारे में सोच भी नहीं सकता था. इस शो ने मुझे टीवी क्वीन बना दिया लेकिन बदले हुए टीवी के गुलशन में अब वह खुशबू नहीं रही. जहाँ तक राजश्री की बात है तो वो अपने बैनर में टीवी के लिए एक शो एक राधा एक श्याम बना रहा था. इसके बाद भी मुझे कई शो के प्रस्ताव मिले थे पर मेरा मन नहीं बना.

आज टीवी और फ़िल्मों में जो औरत दिखाई जा रही है उससे आप इत्तेफ़ाक रखती हैं?

डर लगता है उसे देखकर. उसने स्त्री को स्त्री का ही सबसे बड़ा दुश्मन बना दिया है. हमारे ज़माने में देविका रानी, मीना कुमारी, वहीदा रहमान, माला सिन्हा, आशा पारिख और नर्गिस जी ने मदर इंडिया, गाइड, धूल का फूल और पाकीज़ा जैसी फिल्मों में स्त्री की जो छवि बनाई वो दोहराई नहीं जा सकी.

पर ये बदले हुए भारत की महिलाओं की तस्वीर भी तो हो सकती है?

मैं भारत को जितना जानती हूँ उसमें रानी लक्ष्मी बाई, इंदिरा गांधी और प्रतिभा पाटिल जैसी महिलाओं के साथ इंदिरा नुई जैसे महिलाएं भी तो हैं. मैं फ़िल्म और टीवी की मरदाना औरतों में शामिल नहीं होना चाहती.

आप पहली महिला एंकर हैं जिन्हें दादा साहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया गया है?

यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है. सुनील दत्त साहेब ने मुझे यह अवार्ड दिया था. उस पल को मैं आज तक नहीं भूली हूँ.

साठ साल बाद अब आपकी तीसरी पीढ़ी से आपकी पोती खुशी भी फिल्मों में आ रही है?

मुझे लगता है मेरी बचपन की कोई ख्वाहिश पूरी हो रही है. मैंने जब खुशी के पिता होशांग को लेकर ख़ुद 'हम तुम पर क़ुर्बान' बनाई थी तो नहीं जानती थी कि बिना स्टार पुत्रों के आप सफल नहीं हो सकते लेकिन अब लगता है कि मैं ग़लत थी. उसके बाद एक और फ़िल्म 'अजीब दास्ताँ और करतूत' भी बनाई लेकिन नहीं चलीं, अब खुशी की फ़िल्म 'हम फिर मिलें ना मिलें' शिमला फ़िल्म वाले बना रहे हैं. इसके निर्देशक मनीष गोयल हैं .

उसके बाद अपने फ़िल्म बनाने की नहीं सोची?

नहीं. पर मैंने टीवी के लिए 'जीना इसी का नाम है', 'गीत के रूप संगीत के रंग' और 'महकती बातें' जैसे शो बनाए. मेरा बेटा हीरो नही बना इस बात का दुःख रहा पर बतौर मां मैं जीवन का सच स्वीकार करना जानती हूँ.

सच तो यह भी है कि आप एक मुसलमान हैं और आपके परिवार का इतिहास देश के सबसे अग्रणी धर्मनिरपेक्ष लोगों के उदाहरणों में हैं.

मुझे गर्व है कि मैं एक मुसलमान हूँ लेकिन मुझे दुःख होता है जब कोई मुसलमान ख़ुद को भारत में अल्पसंख्यक बताता है. जिस देश में राष्ट्रपति और सुपर स्टार मुसलमान हो सकते हों और तीन तीन खान फ़िल्म इंडस्ट्री पर राज करते हों उसमे कोई मुसलमान कैसे असुरक्षित हो सकता है.

आपकी अपनी पसंदीदा फ़िल्में, अभिनेता, अभिनेत्री और निर्देशक कौन से रहे?

मुझे अपनी सारी फ़िल्में बहुत पसंद हैं लेकिन 'बापबेटी', 'जोगन', 'धर्मपुत्र', 'दीदार', 'बैजू बावरा' मेरी सबसे अच्छी फ़िल्में हैं. मैंने अशोक कुमार से लेकर इमरान खान तक के काम को पसंद ही नहीं किया बल्कि महबूब खान, नितिन बोस, बिमल रॉय और सोहराब मोदी से लेकर बीआर चोपड़ा , यश चोपड़ा और कैफ़ी आजमी तक के साथ काम किया. मैं शायद पहली ऐसी अभिनेत्री हूँ जिसने इंडस्ट्री की एक साथ छह पीढ़ियां देखी हैं.

नई पीढ़ी में आप किसे पसंद करती हैं?

नई पीढ़ी फ़िल्म और टीवी में नए तरह के प्रयोग कर रही हैं. नए तरह का सिनेमा दुनिया भर में पहुँच भी रहा है लेकिन मेरी उनसे गुज़ारिश है कि अपनी परंपरा और संस्कृति को भूलकर प्रयोग न करें. आने वाले समय में जब फ़िल्म और टीवी का इतिहास लिखा जाएगा तो मुझे यकीन है कि उसे सुनहरे हर्फ़ों में जगह मिलेगी.

अब आप क्या कर रही हैं?

अभी भी मेरा 'तबस्सुम हिट परेड' दुनिया भर में चल रहा है. कुछ समय पहले हमने एक और शो 'तबस्सुम भजन संध्या और भक्ति में मस्ती' शुरू किया है. इसके अलावा होशांग अपने प्रोडक्शन का काम भी देखते हैं. हो सकता है एक बार फिर फ़िल्मों के निर्माण में हाथ आजमाएँ.

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