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'मुंबई मेरी जान में दिलचस्प है मेरा रोल'

By दुर्गेश उपाध्याय

सोहा की फ़िल्म रंग दे बसंती ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामित की गई थी.
सोहा अली ख़ान शुरुआत से ही लीक से हटकर फ़िल्में करने के लिए जानी जाती हैं. 'मुंबई मेरी जान' में भी वह चुनौतीपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.

फिर चाहे वो 'रंग दे बसंती' का मॉडर्न लेकिन देशभक्त किरदार हो या सुधीर मिश्रा की फिल्म 'खोया खोया चांद' का पारंपरिक और भावुक किरदार.

उन्होंने दोनों जगह अपने अभिनय से लोगों की तारीफें बटोरी हैं. फ़िल्म 'मुंबई मेरी जान' में भी वो एक चुनौतीपूर्ण भूमिका में नज़र आने वाली हैं.

मुंबई ट्रेन हादसों से प्रभावित ये फ़िल्म शुक्रवार को रिलीज़ हो गई है.

संजीदा अभिनेत्री

सोहा अली ख़ान का इंटरव्यू करना हमेशा एक मज़ेदार अनुभव रहा है. सोहा को साफ़गोई बहुत ही पसंद है. अपने काम को लेकर वो बेहद संजीदा हैं और इंटरव्यू में किसी भी सवाल का लंबा और सार्थक जवाब देना उनकी ख़ासियत है.

वह इन दिनों शूटिंग में काफ़ी व्यस्त हैं. लेकिन जब मैने इंटरव्यू के लिए समय मांगा तो इस बार भी शूटिंग में काफ़ी व्यस्त होने के बावजूद उन्होंने बीबीसी से अपनी फ़िल्म के बारे में बातचीत की.

सोहा अपनी इस फ़िल्म को लेकर काफ़ी उत्साहित हैं. मुंबई मेरी जान 11 जुलाई 2006 को मुंबई में हुए ट्रेन बम धमाकों की पृष्ठभूमि पर आधारित फ़िल्म है.

सोहा कहती हैं, "मुझे ये फ़िल्म काफ़ी पसंद है. सबसे पहले इस फ़िल्म के निर्देशक निशिकांत के साथ काम करके मेरा अनुभव काफ़ी अच्छा रहा है. स्क्रिप्ट सुनने के बाद मुझे लगा कि मुझे इस फ़िल्म का हिस्सा बनना चाहिए. मेरा रोल लंबा तो नहीं है लेकिन काफ़ी दिलचस्प है."

मुंबई में हुए इन बम धमाकों ने कई लोगों की ज़िंदगी बदल कर रख दी थी, 'मुंबई मेरी जान' की भी कहानी कुछ ऐसे लोगों की है. जिनकी ज़िंदगियाँ इस हादसे के बाद बिल्कुल बदल गईं
मुंबई में हुए इन बम धमाकों ने कई लोगों की ज़िंदगी बदल कर रख दी थी, 'मुंबई मेरी जान' की भी कहानी कुछ ऐसे लोगों की है. जिनकी ज़िंदगियाँ इस हादसे के बाद बिल्कुल बदल गईं.

सोहा ने बताया, "आपको याद ही होगा कि 11 जुलाई को जो हादसा हुआ था उसे हम सब याद करते हैं. उस घटना के चार-पांच दिन बाद कुछ ऐसे लोग थे जिनके जीवन पर उसका गहरा असर हुआ था."

उन्होंने कहा कि लोगों की भावनाओं को एक फ़िल्म के ज़रिए दिखाने की कोशिश की गई है. जैसा कि ये एक फ़िल्म है इसमें हंसी के भी क्षण हैं और रुलाई के भी हैं. ढेर सारी जानकारियों को इकट्ठा करके ये फ़िल्म बनाई गई है.

यादगार अनुभव

सोहा फ़िल्म में अपने किरदार को लेकर काफ़ी ख़ुश हैं. उनका कहना है कि इसे करना उनके लिए एक यादगार अनुभव रहा है.

फ़िल्म में अपने रोल के बारे में सोहा कहती हैं, "मैं इस फ़िल्म में एक टीवी जर्नलिस्ट की भूमिका निभा रही हूँ. बहुत कठिन काम है. ख़ासकर ऐसी दुर्घटनाओं के वक़्त जिस तरह से मीडियाकर्मी अपना काम करते हैं वो बहुत ही कठिन है लेकिन एक और बात कि कई बार ऐसा करते हुए संवेदनशीलता का ध्यान नहीं रख पाते हैं. मुझे पता नहीं कि आप लोगों को मेरा ये रोल कैसा लगेगा."

फ़िल्म में उनके अलावा परेश रावल, इरफ़ान ख़ान और केके मेनन भी हैं. कैसा रहा इतने दिग्गज कलाकारों के साथ काम करना, वह कहती है, "बहुत अच्छा अनुभव रहा. मुझे लगता है कि ऐसे कलाकारों के साथ काम करना ही एक बड़ी उपलब्धि है."

सोहा 'दिल कबड्डी' और 'ढूंढ़ते रह जाओगे' नाम की कॉमेडी फ़िल्मों में काम भी कर रहीं हैं

सोहा मानती है कि अभिनय प्रतिक्रियात्मक होती है. सामने अगर बेहतरीन कलाकार हों तो आप भी अच्छे हो जाते हैं.'

शुरुआत से ही सोहा फ़िल्मों को चुनने के मामले में काफ़ी सचेत रही हैं तो किसी भी रोल को स्वीकार करने का उनका क्या मानक है?

इस सवाल पर सोहा कहती हैं, "स्क्रिप्ट अच्छी होनी चाहिए फिर रोल चाहे जैसा हो, कोई ऐसी फ़िल्म जिसमें एक संदेश हो उसमें काफ़ी मेहनत भी करनी पड़ती है तो फ़िल्म अच्छी होनी चाहिए. वैसे आजकल मैने कॉमेडी फ़िल्में भी करनी शुरु की हैं और मुझे काफ़ी मजा आ रहा है.'

सोहा इन दिनों 'दिल कबड्डी' और 'ढूंढ़ते रह जाओगे' नाम की दो कॉमेडी फ़िल्मों में काम भी कर रहीं हैं.

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