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    स्लामडॉग मिलियनेयर में भारत दिखेगा

    By वंदना
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    लंदन फ़िल्म फ़ेस्टिवल का समपान निर्देशक डैनी बॉएल की बहुचर्चित अंग्रेज़ी फ़िल्म 'स्लामडॉग मिलियनेयर' से होगा. ये बेस्टसेलर लिस्ट में शामिल रहे उपन्यास 'क्यू एंड ए' पर आधारित है जिसे भारतीय कूटनीतिज्ञ विकास स्वरूप ने लिखा है.

    फ़िल्म की कहानी एक भारतीय उपन्यास 'क्यू एंड ए' पर आधारित है. बेस्टसेलर लिस्ट में शामिल रही ये क़िताब कूटनयिक विकास स्वरूप ने लिखी है. इस पर बने रेडियो ड्रामा को सोनी रेडियो अवॉर्ड भी मिला है.

    वर्तमान में विकास स्वरूप दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय उप उच्चायुक्त हैं और इससे पहले ब्रिटेन, अमरीका और तुर्की में पदस्थ रहे हैं.

    कहानी एक ऐसे ग़रीब भारतीय किशोर की है जो 'कौन बनेगा करोड़पति' जैसे शो में जैकपॉट जीत लेता है लेकिन उस पर आरोप लगाया जाता है कि उसने धोखाधाड़ी की है. फ़िल्म ब्रितानी निर्देशक डैनी बॉएल ने बनाई है. इसमें अनिल कपूर और इरफ़ान ख़ान हैं और मुख्य भूमिका ब्रिटेन के युवा अभिनेता देव पटेल ने निभाई है.

    पेश है विकास स्वरूप से बातचीत के मुख्य अंश.

    स्लामडॉग मिलियनेयर को काफ़ी सराहा जा रहा है, आपकी प्रतिक्रिया?

    मैं तो बहुत ख़ुश हूँ कि फ़िल्म 'स्लमडॉग मिलियनेयर' लंदन फ़िल्म फ़स्टिवल में दिखाई जा रही है क्योंकि ये फ़िल्म मेरी पुस्तक पर आधारित है जिसका नाम था 'क्यू एंड ए'. अभी तक तो मैने फ़िल्म देखी नहीं है. अभी तक जैसी प्रतिक्रिया आई है उसे देखकर लगता है कि डैनी साहब ने उपन्यास की मूल भावना को क़ैद करने की पूरी कोशिश की है, भारत को संपूर्णता में क़ैद करने की कोशिश की है. शायद इसी वजह से अच्छे रिव्यू मिल रहे हैं.

    काफ़ी दिलचस्प कहानी लगती है. कोई ख़ास वजह या प्रेरणा जब आपने ये कि़ताब लिखनी शुरू की होगी.

    जब 2003 में मैने ये पुस्तक लिखी थी तो मेरी पोस्टिंग लंदन में ही थी. ये पुस्तक मैने दो महीनों में ख़त्म कर दी थी. उस समय भारत में कौन बनेगा करोड़पति की चर्चा थी. लंदन में भी 'हू वांट्स टू बी ए मिलियनेयर' नाम का शो चल रहा था.

    उसी दौरान एक विवाद हुआ था कि ब्रितानी सेना के एक मेजर शो में आए थे. उन्होंने एक मिलियन पाउंड तो जीत लिया था लेकिन उन पर इल्ज़ाम लगा था कि उन्होंने धोखाधड़ी की थी. बाद में जाँच हुई तो पता चला कि मेजर साहब का एक साथी भी शो के दौरान आया हुआ था जो खाँस-खाँस कर उन्हें सही जवाब बता रहा था.

    उससे मेरे दिमाग़ में कौतूहल पैदा हुआ कि अगर एक ब्रितानी मेजर पर भी धोखा देने का आरोप लग सकता है तो क्यों न एक ऐसी कहानी लिखी जाए जिसमें एक प्रतियोगी पर शर्तिया ही शक़ किया जाएगा. क्योंकि हमारी धारणा होती है कि हम स्कूल जाते हैं, अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ते हैं इसलिए हमें तो दुनिया की जानकारी होगी ही लेकिन हमारे नौकर, ड्राइवर या माली हैं इन्हें कुछ पता नहीं है. मैं ये दिखाना चाहता था कि उन्हें भी काफ़ी कुछ पता है, शायद दूसरी तरह की चीज़ें पता हों. हमारे यहाँ ये धारणा है कि चूँकि हमने औपचारिक शिक्षा ली है इसलिए हम सब जानते हैं लेकिन ये ग़लत है.

    क्या आप आसानी से तैयार थे कि आपकी क़िताब पर फ़िल्म बने?

    अकसर तो यही होता है कि पुस्तक के लेखक और फ़िल्म के निर्माता के बीच हमेशा मतभेद हुए हैं, लेखक आमतौर पर दुखी ही होते हैं फ़िल्म से. लेकिन मुझसे फ़िल्मवालों ने तभी बात कर ली थी जब पुस्तक छपी भी नहीं थी. फिर मुझे बताया कि साइमन बूफ़ॉय साहब जैसे लेखक फ़िल्म का स्क्रीनप्ले लिखेंगे और डैनी बॉएल निर्देशन करेंगे.

    ये लोग ऐसे हैं जिनका पहले से ही नाम है, एक विश्वनीयता है. सॉइमन बूफ़ॉय जी की तो ऑस्कर के लिए नामांकित किया गया था 'द फ़ुल मॉन्टी' के लिए. हाँ ये तो मैं मानकर चल रहा था कि पुस्तक और फ़िल्म अलग-अलग माध्यम हैं, इसलिए थोड़ी बहुत रियायत तो देनी ही पड़ेगी. फ़िल्म पुस्तक से काफ़ी भिन्न है. लेकिन अगर निर्देशक क़िताब की आत्मा को पर्दे पर उतार पाएँ हैं तो काबिले तारीफ़ बात है.

    कहानी के अलावा भी आप किसी तरह फ़िल्म से जुड़े रहे थे?

    फ़िल्म की अभिनेत्री फ़्रीडा पिंटो, अभिनेता देव पटेल और निर्देशक डैनी बॉएल

    नहीं, मेरे पास केवल क्रिएटिव कंट्रोल था इसलिए मैने क्रिएटिव इनपुट दिए थे. जब पहला स्क्रीनप्ले दिखाया गया थो मैने कुछ टिप्णीयाँ दी थीं सॉमन बुफ़ॉय को, उसके आधार पर दूसरा स्क्रीनप्ले लिखा गया.

    मेरा रोल यहीं तक था. फ़िल्म के अभिनेता के चयन वगैरह में मेरा कोई योगदान नहीं था.

    आप कूटनयिक है, ज़ाहिर है ये ज़िम्मेदारी वाला काम है, बहुत व्यस्त रहते हैं. लेखन और कूटनीति के काम में तालमेल कैसे बिठा पाते हैं. आपने इस साल अपना दूसरा उपन्यास भी निकाला है- सिक्स सस्पेक्टस.

    तालमेल में तो ये है कि अनुशासन बहुत ज़रूरी है ज़िंदगी में. 'क्यू एंड ए' ( जिस पर फ़िल्म स्लमडॉग मिलियनेयर' आधारित है) मैने लंदन में उस समय लिखी थी जब इराक़ के साथ युद्ध चल रहा था. मैं पॉलिटिकल काउंसलर था तो मुझे रिपोर्टिंग भी करनी होती थी. मैं तो बस शनिचर और इतवार को ही लिख पाता था. एकाएक मेरे दिमाग़ में समझो पूरी पुस्तक ही आ गई थी. लेकिन दूसरी पुस्तक जो मैने दक्षिण अफ़्रीका में लिखी थी 'द सिक्स सस्पेक्टस' उसमें मुझे डेढ़ साल लगे. अगर जीवन में अनुशासन हो तभी आप लिख सकते हैं. बीबीसी वाले शायद उस दूसरे उपन्यास पर फ़िल्म बना रहे हैं.

    आपकी पुस्तक 'क्यू एंड ए' पर बीबीसी ने रेडियो ड्रामा भी बनाया था.

    हाँ, इस रेडियो ड्रामा को सोनी रेडियो अकादमी अवॉर्ड में सर्वश्रेष्ठ ड्रामा का पुरस्कार मिला है. इसी कि़ताब पर ऑडियो बुक भी बनी हैं जिसे सर्वश्रेष्ठ फ़िक्शन ऑडियो बुक ऑफ़ द ईयर का सम्मान मिला था. उम्मीद करते हैं कि फ़िल्म के साथ भी ऐसा ही होगा. अ

    भी तक भारत बॉलीवुड के नाम से जाना जाता है. बॉलीवुड को बाहर लोग मेनस्ट्रीम नहीं कहते हैं, कहा जाता है कि वो सिर्फ़ भारतीय लोगों के लिए ही है. इसलिए अगर एक ऐसी विदेशी फ़िल्म जो भारत पर आधारित है और वो भारतीयों को ही नहीं बाक़ी देशों के लोगों को भी पसंद आती है तो ये एक उपलब्धि है. ये दर्शाता है कि इस समय लोग भारत के बारे में जानने को आतुर हैं.

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