फ़िल्म स्कूल न जाने का पछतावा:शेखर कपूर

अभी हाल ही में शेखर कपूर और गुलज़ार फ़िल्मकार सुभाष घई के फ़िल्म स्कूल 'व्हिस्लिंग वुड्स" के दीक्षान्त समारोह के मौक़े पर मौजूद थे. इस अवसर पर शेखर कपूर ने कहा, “मैं कभी फ़िल्म स्कूल नहीं गया. इस वजह से मुझे प्रयोग करने के मौके नहीं मिले. मैंने जबसे फ़िल्में बनानी शुरु की, तब से मुझ पर फ़िल्म के रीलीज़ होने का, कमर्शियल फ़िल्म बनाने का दबाव रहा है."
इस दबाव से उबरने के लिए शेखर अब डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बना रहे हैं. वो कहते हैं, “पिछले साल मैंने चार शॉर्ट फ़िल्में बनाईं . ये फ़िल्म स्कूल वापिस जाने जैसा है क्योंकि फ़िल्म स्कूल में आपको शॉर्ट फ़िल्म बनाने की कोई वजह नहीं चाहिए. आप ऐसा करते हैं क्योंकि आप उन विषयों पर फ़िल्म बनाना चाहते हैं."
शेखर कपूर ये भी कहते हैं कि भविष्य में भारतीय सिनेमा के सामने कई चुनौतियों के साथ ही कई नए मौके भी आएंगे. वो कहते हैं, “भविष्य में इंटरनेट के ज़रिए फ़िल्में दिखाई जाएंगीं. शायद अगले दस साल में ये जो बड़े-बड़े मल्टीप्लेक्स न रहें. दुनिया भर में लोग फ़िल्में कंप्यूटर स्क्रीन या मोबाइल पर हमारी फ़िल्में देखें. इन नई चुनौतियों और तकनीक को जांचकर, इनके ज़रिए दर्शकों को कहानियां बताना भी नया तरीका है."
शेखर कपूर ये भी कहते हैं कि आज भारतीय सिनेमा का आम दर्शक उससे दूर जा रहा है क्योंकि आज फ़िल्में अप्रवासी भारतीयों के लिए बन रही हैं. शेखर कहते हैं कि उन दर्शकों को वापस लाने और उनकी संख्या बढ़ाने के लिए कदम उठाने की ज़रूरत है.
शेखर कपूर की ही तरह फ़िल्ममेकर, गीतकार और शायर गुलज़ार भी मानते हैं कि आज हिंदी फ़िल्में एन आर आई और शहरी दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं. गुलज़ार कहते हैं, “जब तक आप अपने अनुभव का, अपनी सोच का दायरा नहीं बढ़ाएंगे, तब तक आप पुराने लीक की फ़िल्में ही बनाते रहेंगे. इसलिए जब तक आपको ज़िंदगी में अलग-अलग अनुभव नहीं होंगे, तब तक आपके पास कुछ भी नया कहने को नहीं होगा."


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