Salaam Bombay का वो बच्चा, जिसने 12 साल की उम्र में जीता नेशनल अवॉर्ड, आज पेट पालने के लिए चला रहा ऑटो

Salaam Bombay child actor Shafiq Syed now: 'सलाम बॉम्बे!' एक ऐसी फिल्म है जिसे टाइमलेस क्लासिक की कैटेगरी में रखा जाता है। इस फिल्म को मीरा नायर का आर्ट बताया जाता है। आपको इस फिल्म का वो मासूम चेहरा याद है? 12 साल की उम्र में जिसने पूरी दुनिया का दिल जीत लिया था।
जिस बच्चे ने बच्चों की दुनिया से निकलकर बॉलीवुड की चमचमाती दुनिया में कदम रखा था। लेकिन अफसोस... किस्मत उस बच्चे का ज्यादा साथ नहीं दे पाई और उस मासूम पर ऐसी मार पड़ी कि आज वो मुंबई की सड़कों से दूर, बेंगलुरु की गलियों में ऑटो चलाकर अपने परिवार का पेट पाल रहा है।
बचपन में भागकर आया मुंबई
बेंगलुरु का एक छोटा सा लड़का... उम्र बस 10-11 साल, आंखों में फिल्मी दुनिया का सपना, और जेब में फूटी कौड़ी नहीं। लेकिन हिम्मत ऐसी कि अकेले ही घर से भागकर मुंबई चला आया। उसके ख्वाब बड़े थे- वह देखना चाहता था कि क्या सच में हिंदी फिल्मों जैसी जिंदगी होती है?
चर्चगेट स्टेशन के पास एक गली में वह रहने लगा। वहीं एक महिला की नजर उस पर पड़ी और उसने एक्टिंग वर्कशॉप का ऑफर दिया- रोज के 20 रुपये और पेट भर वड़ा पाव। दूसरे बच्चे डर गए, लेकिन ये छोटा सा बच्चा भूखा था, सपनों से प्यासा था, तो झट से मान गया।
मीरा नायर की 'सलाम बॉम्बे!' से जीता दिल
1988 में मीरा नायर की फिल्म 'सलाम बॉम्बे!' में उसे चाय बेचने वाले कृष्ण (उर्फ चायपाव) का लीड रोल मिल गया। स्क्रीन पर उसकी आंखें कुछ कहती थीं, उसका मासूम चेहरा हर दिल को छू जाता था। फिल्म ने दुनियाभर में तारीफें बटोरी, ऑस्कर नॉमिनेशन मिला और शफीक को मिला नेशनल फिल्म अवॉर्ड वो भी Best Child Artist के लिए।
दूसरा मौका नहीं मिला
आपको जानकर हैरानी होगी कि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान शफीक को हर दिन सिर्फ 20 रुपये मिलते थे। दोपहर में खाने को वड़ा पाव और बदले में इंटरनेशनल स्टारडम। शफीक को जिंदगी की पहली हिट फिल्म तो मिल गई... लेकिन दूसरा मौका कभी नहीं मिला। 1994 में उन्होंने पतंग फिल्म की, फिर फिल्मी दरवाजें मानों उनके लिए बंद हो गए हों। मायानगरी ने उन्हें भुला दिया, जैसे लोग बीते कल की खबरें भुला देते हैं।
कैमरा छोड़, ऑटो का हैंडल पकड़ा
कभी कैमरे के सामने चमकता चेहरा अब बेंगलुरु की ट्रैफिक में ऑटो चलाते दिखता है। एक पत्नी, चार बच्चे और जिम्मेदारियों का ऊंचा पहाड़, ऐसे में गुजारा करने के लिए उन्होंने ऑटो चलाना शुरू किया। टीवी इंडस्ट्री में कुछ समय कैमरा असिस्टेंट का काम भी किया, लेकिन काम पर्मानेंट नहीं था। बच्चों को स्कूल भेजने, पेट भरने और किराया चुकाने के लिए उन्हें वही करना पड़ा जो सबसे स्टेबल था... और वो था ऑटो चलाना।
'सलाम बॉम्बे' के बाद की कहानी
शफीक ने अपने सफर को कलमबंद किया है। 180 पेज की आत्मकथा 'After Salaam Bombay' में उन्होंने हर वो मोड़ लिखा है, जहां उन्होंने अपने सपनों को कुचलते हुए हर दर्द को जाहिर किया है। वे चाहते हैं कि इस पर एक फिल्म बने- एक ऐसी कहानी जो 'Slumdog Millionaire' से ज्यादा ईमानदार हो।
शफीक की कहानी एक आईना है, फिल्म इंडस्ट्री के उस पहलू का जो सिर्फ हिट्स और हंसते चेहरों तक सीमित नहीं। सवाल यह है कि इतने टैलेंट के बाद भी शफीक को क्यों नहीं मिला दूसरा मौका? क्या वजह थी कि एक स्लम बॉय को सिर्फ उसी इमेज तक सीमित रखा गया और भुला दिया गया?


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