उनसठ की हुईं शबाना

By Staff

प्रतीक्षा घिल्डियाल

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

साल था 1974. श्याम बेनेगल की फ़िल्म अंकुर में लक्ष्मी का किरदार निभाने वाली एक युवती ने अपने सशक्त अभिनय से समानांतर सिनेमा के दर्शकों को इतना प्रभावित किया कि उसे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया.

सत्यजीत रे जैसे फ़िल्मकार ने शबाना आज़मी को भारत की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्रियों में से एक गिनाया. फिर आगे जाकर निशांत, शतरंज के खिलाड़ी, मंडी और स्पर्श जैसी फ़िल्मों ने उन्हें एक अभिनेत्री के तौर पर अपनी प्रतिभा और निखारने का मौक़ा दिया.

अंकुर के अलावा निशांत और मंडी जैसी फ़िल्मों में शबाना को डायरेक्ट कर चुके श्याम बेनेगल कहते हैं,"शबाना अपने किरदार को निभाने से पहले उसे पूरी तरह समझने की कोशिश करती हैं और उसमें छुपे पहुलुओं को उभार कर लाती हैं. कोई भी किरदार करने से पहले वो उसके बारे में डायरेक्टर के साथ विस्तार से बातचीत करती हैं".

ऐसा नहीं कि शबाना ने सिर्फ़ समानांतर सिनेमा में नाम कमाया हो. अमर अक़बर एंथनी और परवरिश जैसी मसाला फ़िल्मों में भी उनको सराहा गया.

"शबाना किसी भी फ़िल्म में हों, उनकी प्रतिभा को कोई नज़रअंदाज़ नहीं कर पाता. उनमें प्रतिभा तो है ही, साथ ही अनुशासन और प्रतिबद्दता भी. यही वजह है कि वो इतनी दमदार कलाकार हैं", श्याम बेनेगल कहते हैं.

शबाना को पांच बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है. इसके अलावा उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिले हैं.

1984 में जब शबाना अपने फ़िल्मी करियर की चोटी पर थीं, उन्होंने लेखक और गीतकार जावेद अख़्तर से शादी कर ली. ख़ुद जावेद अख़्तर भी शबाना की प्रतिभा के बहुत बड़े प्रशंसक हैं.

"शबाना और मेरी दोस्ती इतनी गहरी है कि शादी भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकी", जावेद अख़्तर कहते हैं. "शबाना एक बहुत ही भरपूर इंसान हैं. वो असल ज़िंदगी में भी अपने सभी किरदार बख़ूबी निभाती हैं भले ही वो पत्नी का हो, बेटी का या एक ज़िम्मेदार नागरिक का".

नब्बे के दशक में शबाना ने सिटी ऑफ़ जॉय, फा़यर और 1947 अर्थ जैसी फ़िल्मों से काफ़ी अंतरराष्ट्रीय ख़्याति भी पाई है. फ़ायर में उनके समलैंगिक किरदार ने काफ़ी बवाल भी मचाया.

फ़ायर और हरी-भरी में शबाना के साथ काम कर चुकीं अभिनेत्री नंदिता दास कहती हैं, "शबाना अपने किरदार में जान फूंक देती हैं. स्मिता पाटिल तो नहीं रहीं लेकिन अगर आज समानांतर सिनेमा की सबसे बड़ी और जानी-पहचानीं अभिनेत्री कोई हैं तो वो शबाना ही हैं".

पिछले कुछ साल में शबाना ने हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड, लायन्स ऑफ़ पंजाब प्रेज़ेंट्स और सॉरी भाई जैसी हल्की-फुल्की फ़िल्मों में काम करके अपनी कॉमेडी का हुनर भी दिखाया है.

शबाना सिर्फ़ अपनी कला के लिये ही नहीं अपने सामाजिक कामों के लिये भी जानी जाती हैं. उन्होंने एड्स, सामाजिक असमानताओं और भेदभाव के क्षेत्र में बहुत काम किया है.

मासूम में शबाना को डायरेक्ट कर चुके शेखर कपूर कहते हैं, "कुछ लोग एक ही ज़िंदगी में इतने काम कर जाते हैं कि पूछिये मत. शबाना ने न सिर्फ फ़िल्मों में काम किया है बल्कि सामाजिक कार्य, राजनीति और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी उनका बहुत योगदान है. वो जो भी करती हैं पूरे मन से करती हैं".

शबाना को सिनेमा जगत में क़दम रखे 35 साल हो चुके हैं और उन्होंने जिस तरह के विभिन्न किरदार और फ़िल्में की हैं, बहुत कम अभिनेत्रियों ने ही ये मुक़ाम हासिल किया है.

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