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    विरोध के बावजूद, लोगों ने देखी 'ख़ान'

    By Neha Nautiyal
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    शिवसेना के विरोध के वाबजूद शाहरुख़ ख़ान अभिनीत फ़िल्म मुंबई सहित देश भर में रिलीज़ हो गई.

    पिछले कई दिनों से मुंबई में 'माई नेम इज़ ख़ान' के पोस्टर फाड़े और जलाए जा रहे थे और सिनेमाघरों में तोड़फोड़ की जा रही थी.

    शिवसेना के ज़बरदस्त विरोध के बावजूद मुंबई में मल्टीप्लेक्स मालिकों ने कड़ी सुरक्षा के बीच फ़िल्म दिखाने का फ़ैसला किया और दर्शकों की तरफ़ से भी अच्छी प्रतिक्रिया देखने को मिली.

    हालांकि दोपहर तक इस फ़िल्म का प्रदर्शन कुछ गिने चुने सिनेमाघरों में ही हुआ लेकिन दो बजे के बाद लगभग सभी थिएटरों में ये फ़िल्म दिखाई गई. इतनी अफ़रातफ़री के बाद भी इसे देखने के लिए अच्छी संख्या में दर्शक पहुँचे.

    गुजरात में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन के बाद कुछ शुरुआती शो रद्द कर दिए गए लेकिन बाद में वहाँ भी फ़िल्म बिना किसी बाधा चलती रही.

    समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार दिल्ली, बंगलोर, कोलकाता, चेन्नई सहित कई प्रमुख शहरों सिनेमाघर हाउसफुल रहे.

    इस बीच शाहरुख़ ख़न बर्लिन से ट्विटर के माध्यम से अपने संदेश लोगों तक पहुँचाते रहे. उन्होंने दुनिया भर में अपने प्रशंसकों को हुई तकलीफ़ के लिए माफ़ी मांगी. बाद में स्पष्ट भी किया कि वे शिवसेना से माफ़ी नहीं मांग रहे हैं.

    विवाद का विरोध

    मुंबई के अंधेरी इलाक़े में स्थित फ़न सिनेमा के बाहर इस फ़िल्म को देखने आए लोगों ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि फ़िल्मों को राजनीति से बिल्कुल दूर रखा जाना चाहिए.

    इस बीच सिनेमाघर मालिकों के मन में ये डर बैठा हुआ था कि शिवसैनिक उनके थिएटरों को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

    सिनेमेटोग्राफ़ एक्ज़ीबिटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट आर.वी. वदानी ने बीबीसी से बातचीत में पहले सवाल उठाया था कि बाहर तो पुलिस सुरक्षा दे देगी लेकिन शिवसैनिक अगर अंदर घुस आए और थिएटर को नुक़सान पहुँचाया तो क्या होगा?

    लेकिन धीरे-धीरे सिनेमा मालिकों के रुख़ में बदलाव आया और फ़िल्म का प्रदर्शन शुरु हुआ.

    नुक़सान भी हुआ

    इधर फ़िल्म जानकारों ने भी इस फ़िल्म के प्रदर्शन के विरोध को ग़लत बताया और उनका मानना है कि ये फ़िल्म काफ़ी अच्छी है और इसे लोगों को ज़रुर देखना चाहिए.

    वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक तरन आदर्श कहते हैं कि "ऐसा कोई विवाद होना नहीं चाहिए क्योंकि ये काफ़ी अच्छी फ़िल्म है. विदेशों में इसकी शानदार ओपनिंग हुई है. मैने ये फ़िल्म पिछले हफ्ते ही देखी है और मैं लोगों को इसे देखने की सलाह दूँगा."

    हांलाकि वो ये मानते हैं कि इस विवाद से फ़िल्म को लगभग दस से बारह करोड़ रुपए का नुक़सान ज़रुर हो सकता है.

    वहीं जाने-माने फ़िल्म समीक्षक राजीव मसंद का कहते हैं, "देखिए हम ऐसा नहीं कह सकते कि नुक़सान नहीं हुआ है क्योंकि इस विवाद के चलते ढेर सारे मल्टीप्लेक्सों ने इस फ़िल्म को सुबह से दिखाना शुरु नहीं किया. इससे पहले एडवांस बुकिंग रद्द की गईं हैं और सुबह के सारे शोज़ रद्द किए गए."

    वे कहते हैं, "सिनेमा मालिक अपनी प्रापर्टी को लेकर डरे हुए थे क्योंकि हमने देखा है कि इस तरह की हिंसा में उनका काफ़ी नुकसान होता रहा है. लेकिन जैसे-जैसे दिन बढ़ता गया उन्होंने इसका प्रदर्शन शुरु किया. तो कुछ नुकसान तो जरुर हुआ है, लेकिन अच्छी बात ये है कि कल तक जो स्थिति थी वो बाद में नहीं रही जो कि काफ़ी अच्छी बात है."

    विवाद की शुरुआत

    इस विवाद की शुरुआत शाहरुख़ ख़ान के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में पाकिस्तान के खिलाड़ियों को खिलाने की वकालत की थी.

    इसके बाद शिवसेना ने उनका विरोध शुरु कर दिया था और उन्हें 'गद्दार' तक कहा था.

    शाहरुख़ ख़ान का यह विरोध बाद में उनकी फ़िल्म माई नेम इज़ ख़ान के विरोध में बदल गया.

    सिनेमा घरों में इस फ़िल्म के पोस्टर फाड़े गए और कई जगह पोस्टरों पर कालिख़ लगा दी गई.

    शिवसेना ने शाहरुख़ ख़ान से माफ़ी मांगने को कहा था लेकिन शाहरुख़ ख़ान ने माफ़ी मांगने से इनकार कर दिया कि उन्होंने कोई ग़लत बात नहीं की थी.

    महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री अशोक चव्हाण ने शिवसेना की धमकियों के बाद सिनेमा घरों को सुरक्षा का आश्वासन दिया था.

    मुंबई पुलिस ने बुधवार और गुरुवार को 1800 से अधिक शिवसैनिकों को एहतियातन हिरासत में लिया था. कई शिवसैनिकों को तोड़फोड़ के आरोप में गिरफ़्तार भी किया गया था.

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