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    'युवाओं में धार्मिक मूल्यों की कमी है'

    By पीयूष श्रीवास्तव
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    आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर का कहना है कि चरमपंथ से निपटने के लिए सख़्त क़ानून की ज़रुरत है. उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

    दुनिया को 'जीवन जीने की कला' सिखाने वाले श्री श्री रविशंकर आज ना सिर्फ आध्यात्म बल्कि विश्व भर में शांति और सदभाव को बढ़ावा देने के लिए जाने जाते हैं. पिछले दिनों श्री श्री रविशंकर ने गुर्जर आंदोलन और जम्मू ज़मीन विवाद जैसे कई सामाजिक मुद्दों को सुलझाने में अहम भूमिका निभाई. उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

    भारत में चरमपंथ दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है. क्या भारत चरमपंथ से निपटने के लिए कड़ा रुख़ नहीं अपना रहा है?

    यकीनन भारत एक 'सॉफ़्ट स्टेट' है. दरअसल भारत में चरमपंथ के दो चेहरे हैं. पहला एक विचारधारा है, जो आतंक को बढ़ावा दे रही है. कुछ लोग युवाओं को भड़का रहे हैं. युवाओं के मन में ज़बरदस्ती ऐसा भरा जा रहा है कि सिर्फ उनका धर्म ही सही है और दूसरे धर्म के लोग उनके दुश्मन हैं. धार्मिक ग्रंथों की ग़लत व्याख्या कर कुछ धार्मिक नेता युवाओं को कट्टरपंथी बना रहे हैं. इसके अलावा दूसरे वे लोग हैं जो सिर्फ़ हिंसा की भाषा ही जानते हैं और शांति से उनका कोई वास्ता नहीं है. ऐसे लोगों से सख्ती से निपटना चाहिए.

    चरमपंथ समाजिक मूल्यों और इंसानियत के पतन को दर्शाता है. तथाकथित धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देने के नाम पर हमारे युवाओं को अहिंसा और धैर्य जैसे मूल्यों से दूर किया जा रहा है. ये मूल्य ही भारत की धरोहर हैं. दरअसल इन युवाओं में धार्मिक ज्ञान के अलावा धार्मिक मूल्यों की भी कमी है.

    क्या आपको लगता है कि चरमपंथ के नाम पर एक समुदाय विशेष को निशाना बनाया जा रहा है?

    बार बार हो रही आतंकवादी घटनाओं की वजह से ऐसा हो रहा है. दुनिया में हर आतंकवादी घटना के बाद लगभग एक ही समुदाय से जुड़े लोगों का नाम आता है. ऐसे में एक समुदाय विशेष के ऊपर शक की सुई जाना लाज़मी है. इन घटनाओं की वजह से भारत में स्थिति कुछ ज्यादा ही ख़राब है. लेकिन कुछ लोगों की हरकतों की वजह से पूरे समुदाय को शक की निगाह से देखना सरासर ग़लत है.

    इस समस्या का हल क्या है?

    धार्मिक नेताओं को आगे आकर आतंक फैलाने वाले इन लोगों को दुनिया को सामने लाना चाहिए. धार्मिक नेताओं का कर्तव्य है कि वे तमाशबीन बनने के बजाय आतंकी हरकतों से जुड़े लोगों के ख़िलाफ़ सख़्ती बरतें. आतंक फैलाने वाले लोगों को सिर्फ इसलिए पनाह देना की वे एक ही धर्म से जुड़े हैं, ये सरासर ग़लत है. आतंक को रोकने के लिए सख़्त से सख़्त क़ानून बनाने की ज़रूरत है.

    आपको लगता है कि 'आर्ट ऑफ लिविंग' चरमपंथियों को भी बदल सकता है.

    बिल्कुल. दुनिया भर में आज झगड़े और विवाद की सबसे बड़ी वजह मानसिक तनाव है. आर्ट ऑफ लिविंग में ऐसे कई कोर्स हैं जिनसे किसी भी व्यक्ति को तनाव से मुक्ति मिल सकती है. हम दुनिया के कई आतंकवादग्रस्त इलाक़ों में ऐसे कोर्स चला रहे हैं और इससे लोगों को काफी फ़ायदा भी हुआ है.

    पिछले दिनों उड़ीसा सहित दक्षिणी भारत के कुछ इलाक़ों में अल्पसंख्यकों पर धर्म परिवर्तन जैसी वजहों का हवाला देकर हमले हुए हैं. आपको लगता है कि अल्पसंख्यकों को हिंदू संगठन निशाना बना रहे हैं?

    धर्मपरिवर्तन निश्चय ही इस हिंसा का एक बड़ा कारण है. जहां तक उड़ीसा का सवाल है तो वहां पुरानी जनजातियों के बीच बर्षों से चली आ रही दुश्मनी हिंसा का बड़ा कारण है. कुछ दिनों पहले एक हिंदू स्वामी की हत्या के बाद वहां पर जातीय तनाव बढ़ा है लेकिन वो भी सिर्फ कंधमाल तक ही सीमित है. लेकिन मैं मानता हूं कि कुछ हिंदू कट्टरपंथी हैं जिनका स्थानीय तौर पर कोई वजूद नहीं है लेकिन वे हिंसा का सहारा लेकर अपनी मौजूदगी जताना चाहते हैं, जैसा कि कर्नाटक में हो रहा है. लेकिन ऐसी घटनाओं पर जब राजनीति होने लगती है तब ये निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है.

    आप गुर्जर आंदोलन और जम्मू ज़मीन विवाद जैसे कई सामाजिक मुद्दों में उलझे दिखाई पड़े. इन मुद्दों पर आपको सफलता भी मिली, ये लोग आपके अनुयायी भी नहीं है लेकिन फिर भी आपकी बातें मानते हैं...

    मुझे लगता है कि कोई भी अगर लोगों के दिलो-दिमाग़ को जोड़ने के लिए सच्ची कोशिश करे तो लोग उसे ज़रूर सुनेंगे और सिर्फ मैं ही नहीं, कोई भी अगर सच्ची कोशिश करे तो लोग ना सिर्फ उसे सुनेंगे बल्कि स्वीकार भी करेंगे.

    श्री श्री रविशंकर कौन हैं- एक आध्यात्मिक गुरू, एक धर्म नेता, सामाजिक कार्यकर्ता या समाज सुधारक?

    ऐसा और वैसा क्यों, मैं एक साथ कई भूमिकाएं अदा करता हूं. सिर्फ़ मैं ही नहीं हर कोई कई भूमिकाएं अदा कर सकता है. हर किसी को ज़िंदगी में कई भूमिकाएं अदा करनी होती हैं और कोई भी ऐसा कर सकता है. कई बार हमें शिक्षक की भूमिका भी अदा करनी होती है और कई बार छात्र की भी. इसी तरह हर कोई नेता भी हो सकता है और सुधारक भी.

    आप एक बार फिर नोबेल पुरस्कार से वंचित रह गए, क्या आप निराश हैं.

    ये उनकी इच्छा है. मैं इससे बिल्कुल भी निराश नहीं हूं. और वैसे भी मैं किसी पुरस्कार के लिए काम नहीं करता हूं. लेकिन काफ़ी लोगों को निराशा ज़रूर हुई है.

    क्या आप सामाजिक बदलाव या आध्यात्मिक आंदोलन लाना चाहते हैं.

    आप इन दोनों ही चीज़ों को अलग कर के नहीं देख सकते हैं. एक समाज जो बदल नहीं सकता वो आध्यात्मिक नहीं हो सकता, और आध्यात्म जो समाज को नहीं बदल सकता वो ज्यादा दिन तक टिक नहीं सकता. एक उचित सामाजिक बदलाव के लिए आध्यात्मिक आंदोलन बेहद ज़रूरी हो गया है. आध्यात्म किसी भी विषय में गहराई लाता है. आध्यात्म भारत से आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी समस्याओं को जड़ से खत्म कर सकता है.

    दुनिया भर में वित्तीय संकट चल रहा है, लोगों की ज़िंदगी भर की पूंजी डूब रही है. ऐसे लोगों के लिए कुछ कहना चाहेंगे.

    हमें बिज़नेस को समाज और आध्यात्म से जोड़ना होगा. आध्यात्म से अलग होने से बिज़नेस में लालच आ जाता है. मौजूदा वित्तीय संकट लालच की वजह से ही है, कम समय में ज्यादा से ज्यादा पैसे बनाने की होड़ की वजह से ये हालात पैदा हुए हैं. इन हालात में अपना धैर्य खोने से कोई फायदा नहीं होगा, लोगों को थोड़ा सा धैर्य रखना होगा और जल्द ही हालात फिर से सुधरेंगे. इन हालात में ज़रूरी है कि लोग खुद को जानने की कोशिश करें. इसके लिए उन्हे थोड़ा ध्यान और कुछ प्राणायाम करने की जरूरत है.

    आर्ट ऑफ लिविंग बनाने के पीछे क्या सोच थी.

    दुनिया के कोने कोने में जीवन जीने के ज्ञान को फैलाना ही ऑर्ट ऑफ लिविंग बनाने के पीछ एक मात्र उद्देश्य है. सुदर्शन क्रिया को बनाने के बाद हमें एक ऐसे सिस्टम की जरूरत पड़ी जिससे इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाया जा सके. संस्था से ज्यादा आर्ट ऑफ़ लीविंग दुनिया भर के लोगों के चेहरे पर सच्ची मुस्कान लाने की सोच है.

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