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रमा पाण्डेय के नाटक संग्रह का विमोचन

By Staff
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रमा पाण्डेय के नाटक संग्रह का विमोचन

'रमा पाण्डेय की नायिकाएँ दबी-कुचली नारियाँ नहीं हैं. वे सब अपने-अपने परिवेश में विद्रोह का बिगुल बजाने की क्षमता रखती हैं'- यह कहना है काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी का.

मौक़ा था लंदन के नेहरू सेंटर में निर्माता, निर्देशिका और लेखिका रमा पाण्डेय की भारतीय मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी पर लिखे नाटक संकलन फ़ैसले और उन नाटकों पर बने डीवीडी के विमोचन का.

कथा यूके ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था. इस मौक़े पर ज़किया ज़ुबैरी ने कहा, "रमा पाण्डेय केवल ग़रीब तबक़े की महिलाओं के बारे में बात नहीं करती हैं. वे पूरी शिद्दत से महसूस करती हैं कि मुसलमानों के पढ़े-लिखे वर्ग में भी औरत की हैसियत दोयम दर्जे की ही है. एक तरफ़ सुल्ताना, हाजरा और शाइस्ता ग़रीब और पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं तो वहीं सियासत, रेड और परवीन की नायिकाएँ मुस्लिम समाज के पढ़े लिखे तबक़े से आती हैं. रमा पाण्डेय का हर नाटक समाज को सच्चा आइना दिखाता है."

कार्यक्रम का संचालन करते हुए बीबीसी हिंदी की पूर्व प्रमुख, साहित्यकार और कथा यूके की उपाध्यक्षा डॉ. अचला शर्मा ने रमा पाण्डेय के नाटकों और टेलीफ़िल्म पर सारगर्भित टिप्पणी करते हुए कहा, "हीरो बनने के लिए कोई बहुत बड़ा काम करने की ज़रूरत नहीं होती. छोटे-छोटे क़दम, छोटी-छोटी कोशिशें, छोटे-छोटे फ़ैसले भी एक आम व्यक्ति को, अपनी नज़र में और कुछ लोगों की नज़र में हीरो बना सकते हैं. ऐसी ही कुछ हीरोइनें रमा पाण्डेय की किताब फ़ैसले और उस पर आधारित फ़िल्म श्रृंखला की नायिकाएँ हैं."

कथा यूके के महासचिव तेजेंद्र शर्मा ने रमा पाण्डेय की फ़िल्म सुल्ताना पर टिप्पणी करते हुए कहा, "रमा जी की फ़िल्म मुस्लिम औरत की दो स्थितियों का चित्रण करती है. पहली स्थिति जिसके विरुद्ध वे टिप्पणी करना चाहती हैं और दूसरी स्थिति जिसमें वे अपनी नायिका को देखना चाहती हैं. उनके सभी नाटक सकारात्मक अंत लिए हुए हैं."

पश्तो की लेखिका सोफ़िया हलीमी का कहना था कि इस किताब के पृष्ठों का अनुवाद ज़रूरी है, ताकि यह बात उन सभी लोगों तक पहुंचे जिनके बारे में यह सीरियल बना है.

रमा पाण्डेय ने दर्शकों को बताया कि उनके सभी नाटकों की नायिकाएँ हाड़-मांस की जीती-जागती नारियां हैं.

अपने नाटकों में मुस्लिम चरित्रों के बारे में उन्होंने बताया कि वे चाहती थीं कि दुनिया को दिखा सकें कि मुस्लिम औरतें भी विद्रोह करना जानती हैं.

कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त जाने-माने अंग्रेज़ी उपन्यासकार लारेंस नारफ़ॉक, कैलाश बुधवार, यावर अब्बास, प्रो. मुग़ल अमीन, मधुप मोहता, रज़ा अली आबिदी, ममता गुप्ता, विजय राणा, ललित मोहन जोशी, मीरा कौशिक, केसी मोहन, विभाकर बख़्शी, हिना बख़्शी, दिव्या माथुर, सोहन राही, महेंद्र दवेसर, रमेश पटेल, मंजी पटेल, क्लासिकल गायक सुरेंद्र कुमार, डॉ. कृष्ण कुमार, चित्रा कुमार, शैल अग्रवाल, डॉ. नरेंद्र अग्रवाल, स्वर्ण तलवाड़, अनुराधा शर्मा, नीना पॉल, जय वर्मा, डॉ. महिपाल वर्मा, महेंद्र वर्मा, उषा वर्मा और शमील चौहान शामिल थे.

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