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    गुरुदत्त की प्यासा

    By Bbc
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    गुरुदत्त बेहतरीन निर्देशक ही नहीं अच्छे कलाकार भी थे

    फ़िल्मकार गुरुदत्त की फ़िल्म प्यासा को टाइम पत्रिका ने दस सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों की सूची में रखा है जिसके बाद गुरुदत्त के समकालीनों ने एक बार फिर गुरुदत्त का लोहा माना है.

    गुरुदत्त के साथ प्यासा और कागज़ के फ़ूल जैसी फ़िल्मों में अभिनय कर चुकी वहीदा रहमान कहती हैं कि जब प्यासा बन रही थी कि किसी को नहीं लगा था कि ये इतनी महान फ़िल्म के रुप में सामने आएगी.

    टाइम की सूची में प्यासा

    वो कहती हैं, ‘‘गुरुदत्त जब प्यासा बना रहे थे तो उन्हें ये नहीं पता था कि वो कोई महान फ़िल्म बनाने जा रहे हैं. अगर उन्हें ये पता होता तो प्यासा वैसी फ़िल्म नहीं बन पाती जैसी बनकर सामने आई. वो मेरे ज़ेहन में एक कलाकार से ज़्यादा बतौर निर्देशक असर छोड़ गए हैं. वो कलाकारों को बख़ूबी समझते थे.’’

    गुरुदत्त के साथ काम करने वाली माला सिन्हा कहती हैं कि गुरुदत्त जैसे संवेदनशील निर्देशक कम हुए हैं. वो कहती हैं कि गुरुदत्त अपने कलाकारों से काम निकलवाने में माहिर थे.

    उनका कहना था, ‘‘.प्यासा के वक़्त जब मैं उनके साथ काम कर रही थी तो कई अच्छी यादें हैं. किसी को नहीं डांटते थे. बहुत चुपचाप तरीके से काम करते थे. प्यासा को ही देख लीजिए. फ़िल्म बनाने के दौरान कभी किसी से उसके बारे में कोई बात नहीं की. और जब प्यासा रिलीज़ हुई तो सबको पता है एक धमाका जैसा हो गया. ’’

    जाने माने अभिनेता ओमपुरी कहते हैं कि प्यासा जैसी फ़िल्में कम ही बनती हैं क्योंकि ये ऐसी फ़िल्म है जिसने लोगों को झकझोर कर रख दिया था.

    ओमपुरी बताते हैं कि जब पंडित नेहरु ने यह फ़िल्म देखी थी तो वो रो पड़े थे.

    गुरदत्त के पुत्र अरुण दत्त बताते हैं कि जब तक गुरुदत्त ज़िंदा रहे उन्हें वो सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था.

    अरुण कहते हैं, ‘‘80 के दशक में जब उनकी फ़िल्में यूरोप में दिखाई गईं और जब उन फ़िल्मों ने ज़बरदस्त प्रशंसा बटोरी तब जाकर लोगों का नज़रिया उनके प्रति बदला. एक इंसान के तौर पर कहूं तो वो ज़्यादा किसी से बात नहीं करते थे. उनके मन में क्या चल रहा होता था किसी को पता भी नहीं चलता था.’’

    गुरुदत्त अत्यंत प्रतिभाशाली फ़िल्मकारों की श्रेणी में आते हैं और उनकी फ़िल्मों में तकनीक, कहानी और संपादन पर विशेष ध्यान दिया जाता था.

    गुरुदत्त ने चुनिंदा फ़िल्में बनाई लेकिन वो आज भी कालजयी मानी जाती हैं.

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