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तीख़े सवाल करती एक किताब

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तीख़े सवाल करती एक किताब

राजेश जोशी

बीबीसी संवाददाता

भूटान में भारत के राजदूत पवन कुमार वर्मा ने कहा है कि विश्व-पटल पर स्थान पाने का इच्छुक भारत जैसा बड़ा राष्ट्र जब तक औरों के निर्देश पर चलना नहीं छोड़ता तब तक वो मौलिक सोच वाला राष्ट्र नहीं बन सकता.

बीबीसी हिंदी सेवा से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, “कोई भी बड़ा राष्ट्र – ख़ास तौर पर भारत जैसा ब़ड़ा राष्ट्र जो वैश्विक स्थान के लिए प्रयास कर रहा है – जब तक नक़लचीपन, विवेकहीन अनुकरण यानी औरों के निर्देश पर चलना नहीं छोड़ेगा वो असल तौर से एक मौलिक सोच का मुल्क या राष्ट्र नहीं बन सकता.”

अपनी नई किताब – ‘भारतीयता की ओर: संस्कृति और अस्मिता की कहानी’ के ज़रिए पवन वर्मा ने औपनिवेशिक व्यवस्था का उसके उपनिवेशों की संस्कृति, अस्मिता, वास्तु, भाषा और विचार पर होने वाले असर को लेकर कई तीखे सवाल उठाए हैं. पेंग्विन बुक्स और यात्रा बुक्स ने मूलत: अँग्रेज़ी में लिखी गई किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया है.

मॉस्को, लंदन, न्यूयॉर्क में भारत के प्रतिनिधि रह चुके पवन वर्मा साइप्रस में भारत के राजदूत रहे हैं और इन दिनों थिम्पू में इसी पद पर हैं.

सुनिए पवन वर्मा से बातचीत

उनका कहना है कि उपनिवेशवाद का लक्ष्य लोगों के दिमाग़ और मानसिकता को बदलना होता है. इसलिए उपनिवेश बना दिए गए “पुराने समाजों में जो विषमताएँ आ जाती हैं अगर उनको समझा नहीं जाएगा तो हमारी आर्थिक नीतियों पर भी असर पड़ेगा और हमारी राजनीतिक नीतियों पर भी असर पड़ेगा.”

अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि की निजी कहानी से किताब की शुरुआत करके वर्मा ने दर्शाया है कि किस तरह उनके दादा ने अँग्रेज़ी अदालतों में सफल वकील बनने के लिए अँग्रेज़ी सीखी और किस तरह उनके पिताजी ने उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जैसे छोटे क़स्बे के हिंदी माध्यम के स्कूल से पढ़ाई करके आईसीएस की प्रतियोगिता में सफलता हासिल की.

पूरी ज़िंदगी पवन वर्मा के पिता ने ख़ुद को अँग्रेज़ी संस्कृति के अनुरूप ढाला, उनकी चाल-ढाल और बर्ताव को अपनाने की कोशिश की. लेकिन रिटायरमेंट के बाद को घर में धोती-कुर्ता पहनना पसंद करते थे और कभी कभी कविताएँ लिखते थे तो हिंदी में.

किताब में भाषा के सवाल पर वो सभी सवाल काफ़ी गंभीरता से उठाए गए हैं जो हर उस आदमी के दिमाग़ में रहते हैं जिसकी पहली भाषा अँग्रेज़ी नहीं है. पवन वर्मा कहते हैं ये कहना कि मैं अँग्रेज़ी का विरोधी हूँ, मेरे तर्कों को काफ़ी सरलीकृत तरीक़े से पेश करने जैसा है.

वर्मा ख़ुद सेंट कोलम्बस और सेंट स्टीफ़ंस जैसे आभिजात्य स्कूलों में पढ़े हैं. अँग्रेज़ी में सोचते हैं और अँग्रेज़ी में ही लिखते हैं. लेकिन उनके सवाल उन लोगों के सवाल हैं जिन्हें ये एहसास करवा दिया जाता है कि उनकी भाषा, सोच, संस्कृति, रीति-रिवाज, स्थापत्य आदि सभी निकृष्ट कोटि के हैं.

पवन वर्मा ने कई महत्वपूर्ण सवालों पर कुछ नहीं कहा है

ये उन लोगों के सवाल हैं जो अँग्रेज़ी भाषा, सोच-विचार और जीवन शैली की ओर चकित निगाहों से देखते बड़े होते हैं और इस प्रक्रिया में अपनी भाषा, अपनी बोली, अपने लोग, अपनी जीवन शैली और त्यौहार-व्यवहार पर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं.

या फिर हीन भाव उन्हें एक दूसरे तरह की प्रतिक्रिया की तरफ़ धकेलता है जिसमें वो एक ख़तरनाक क़िस्म की तंग-नज़र के शिकार हो जाते हैं और वैलेंटाइंस डे को डंडे लेकर प्रेमी जोड़ों की तलाश में निकल पड़ते हैं. या फिर लड़कियों के जीन्स और स्कर्ट पहनने को अपनी अस्मिता पर हमला मान लेते हैं.

चार साल तक शोध करने के बाद लिखी गई इस किताब में बताया गया है कि राष्ट्रपति भवन और नई दिल्ली की नींव रखने वाला अँग्रेज़ आर्किटेक्ट लटियंस हिंदुस्तानियों से किस क़दर घृणा करता था. वो यहां के लोगों और यहाँ की कला-स्थापत्य को निम्न कोटि का मानता था. लेकिन कुछ समय पहले लटियंस की तीसरी पीढ़ी के वारिस दिल्ली आए तो अँग्रेज़ी में बोलने-सोचने वाला और शैम्पेन पीने वाला वर्ग उनके सामने बिछ-बिछ जा रहा था.

इसी तरह जवाहरलाल नेहरू ने आज़ादी के बाद ला कार्बूज़िए को चंडीगढ़ शहर बसाने के लिए आमंत्रित किया. यूरोप में उसके स्थापत्य की कड़ी आलोचना होती रही है लेकिन भारत में एक मुरदार शहर को जन्म देने वाले इस पश्चिमी वास्तुविद के स्थापत्य को आलोचना की कसौटी पर कसने की हिम्मत किसी की नहीं हुई. कला और संस्कृति पर औपनिवेशिक व्यवस्था के नकारात्मक असर पर पवन वर्मा ने इस किताब में काफ़ी ईमानदार से पड़ताल की है. लेकिन वो ऐसे विवादास्पद प्रश्नों को नहीं छूते जिनके लिए सीधे प्रधामनमंत्री मनमोहन सिंह, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया जैसे लोग ज़िम्मेदार हैं.

मसलन वो इस विषय पर कुछ नहीं कहते कि वैश्वीकरण के दौर में भारत की आर्थिक नीतियाँ, अंधा बाज़ारीकरण, किसानों को उनकी ज़मीन से बेदख़ल करना, मॉल-संस्कृति और कॉरपोरेट संस्कृति को बढ़ावा, किसानों की अबाध आत्महत्याएँ, आदिवासियों के संघर्ष आख़िर किसकी देन है?

यहाँ पवन वर्मा सिद्ध करते हैं कि वो एक सिद्धहस्त कूटनयिक हैं और मुश्किल सवालों से बच निकलने में माहिर भी.

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