आलोचनाओं से नहीं घबराता: रणदीप हुड्डा

By Staff
आलोचनाओं से नहीं घबराता: रणदीप हुड्डा

लेकिन इसी हफ़्ते रिलीज़ हुई निर्देशिका मधुरिता आनंद की फ़िल्म 'मेरे ख़्वाबों में जो आए' और केतन मेहता की आने वाली चर्चित और विवादित फ़िल्म 'रंग रसिया' से लगातार चर्चा में रहने वाले रणदीप को इन आरोपों और आलोचनाओं से कोई शिकायत नहीं.

उनका मानना है कि वे केवल अपने काम की तरफ़ ध्यान देते हैं. अगर वे लोगों के बारे में सोचना शुरू करेंगे तो बहुत जल्द उन्हें अपने घर हरियाणा के रोहतक लौटना पड़ेगा.

हालाँकि पिछले दिनों पोलो के एक मैच में लगी चोट का असर उनकी टांग में अभी भी दिखाई देता है लेकिन अपनी आने वाली फ़िल्मों के बारे में बात करते हुए वे उत्साह से भरे भी दिखते हैं.

पहचान नहीं होने जैसी बातें और आलोचनाएँ किसी भी कलाकार के करियर के लिए शुभ संकेत नहीं माने जाते?

मैं लोगों के पूर्वाग्रहों की चिंता नहीं करता. मैंने शुरू से लेकर अब तक जितनी भी फ़िल्में की हैं उनमें मेरा काम लोगों को पसंद आया. मैं इसे बॉक्स ऑफ़िस से ज़्यादा लोगों की समझ से जुडा मामला मानता हूँ. कोई भी आदमी किसी फ़िल्म को देखे बग़ैर उसके अच्छे या बुरे होने के बारे में नहीं कह सकता.

'मेरे ख़्वाबों में जो आए' और केतन मेहता की 'रंग रसिया' के बारे में क्या सोचते हैं. मेरे ख़्वाबों में... आपने अठारह चरित्र निभाएं हैं और रंग रसिया मशहूर पेंटर राजारवि वर्मा की जिंदगी से जुड़े विवादित विषय पर बनी है?

मेरे ख़्वाबों में जो आए का विषय संभावनाओं की एक अनोखी विचारधारा से जुड़ा है, जिसमें एक स्त्री के सपनों के पूरे होने की कहानी है. यह एक फ़तांसी और काल्पनिक चरित्र ज़रूर है लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में यह हमेशा प्रासंगिक बना रहता है.

इसमें मेरे सभी किरदार नए जीवन प्रतीकों वाले हैं. लेकिन मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म रंग रसिया ही है. जिसे आप एक तरह से मेरे करियर में की गई अब तक की रफ्फ़ एंड ट्फ़्फ़ भूमिकाओं से अलग एक ऐसी भूमिका भी कह सकते हैं जिसे हर अभिनेता करना चाहता है.

आप राजारवि वर्मा के बारे में कितना जानते हैं?

पहले मैं नहीं जानता था. केतन मेहता ने भी जब मुझे इसकी कहानी और पटकथा के बारे में बताया तो मुझे यह काफ़ी नीरस लगी थी, लेकिन जैसे-जैसे मैं उसे पढ़ता गया और फ़िल्म आगे बढ़ती गई मुझे लगा जिस आदमी के बनाए चित्रों के कैलेंडरों वाले देवी देवताओं और प्रेम के नायक नायिकाओं को हम देखते और दीवाली पर पूजते रहें हैं वे केवल चित्र भर नहीं हैं. उनमे एक चित्रकार के जज़्बात, दीवानगी और रचनात्मकता के नए सृजनों का संघर्ष भी है.

भारत की आज़ादी के संघर्ष के दौरान बनाए गए इन चित्रों में सिर्फ़ भारतीय इतिहास ही नहीं बल्कि समकालीन समाज में एक कलाकार की स्वतंत्रता, नैतिकता, धर्म के प्रति असहनशीलता और सेंसर की सीमाएं भी बताई गई हैं.

इस फ़िल्म में कला के नाम पर बोल्डनेस और एक्सपोज़र की सारी सीमाएं तोड़ने की वजह से ही यह चर्चा और विवादों में हैं, इसलिए इसके भारत में प्रदर्शन को लेकर भी सवाल उठाये जा रहे हैं?

रणदीप हुड्डा का कहना है कि वो लोगों के पूर्वाग्रहों की चिंता नहीं करते

ऐसी बात नहीं. जब राजारवि वर्मा ने 19वीं सदी में ये चित्र बनाए तभी उनके काम पर एक बहस शुरू हो गई थी.

मराठी के उपन्यासकार रणजीत देसाई का उनकी ज़िंदगी से रूबरू करवाने वाला उपन्यास भी जब आया तो उसकी चर्चा हुई. इसकी वजह थी कि उनकी तस्वीरों में रूढीवादियों और कट्टरवादियों को अश्लीलता और अनैतिकता नज़र आती थी, लेकिन सही मायनों में वे पारंपरिक साहित्य और भारतीय पुराणों पर आधारित चित्र ही हैं.

जहाँ तक उसमें हमारी नायिका सुगंधा बनी नंदना सेन के दृश्यों की बात है तो लंदन के फ़िल्म समारोह में जब इसका प्रदर्शन हुआ तो उनके पिता अमर्त्य सेन भी वहां थे. उन्हें यह फ़िल्म अब तक ऐसे विषयों पर बनी फ़िल्मों में उत्कृष्ट लगी.

दरअसल रंग रसिया एक चित्रकार और उनकी नायिका के प्रेम के वैश्विक संबंध का चित्रण है. इसकी कलात्मकता और मेकिंग पर चर्चा और बहस होनी चाहिए ना कि विवाद.

आपने अभी तक जितनी फ़िल्में की उनपर ना कोई चर्चा हुई और ना बहस?

इसमें मैं क्या कर सकता हूँ, लेकिन मैं इससे कभी नर्वस नहीं होता. मैं तो ऑस्ट्रेलिया में बिज़नेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहा था. तीन साल वहां रहते हुए मैंने एक रेस्तरां मे काम करने से लेकर टैक्सी चलाने तक जैसे काम किए.

ज़िंदगी को मैं समझता हूँ, पर कभी अभिनय के बारे में नहीं सोचा. लेकिन मीरा नायर की फ़िल्म में मिली भूमिका से दिशा बदल गई.

भारत लौटा तो मैंने रंगमंच पर काम शुरू किया. रामू की फ़िल्म डी क़ायदे से मेरी पहली फ़िल्म थी जिसने मुझे अभिनेता साबित किया. लोगों ने मेरी सूरत की तुलना नसीर से करनी शुरू कर दी.

किसी ने रामू का प्रोडक्ट कहा और किसी ने सुष्मिता सेन के सहारे करियर की तलाश करने वाला अभिनेता. पर लोग नहीं जानते कि मैंने उनके साथ केवल एक फ़िल्म 'करमा: कंफ़ेशन एंड होली' ही की.

आपकी डी, रिस्क और अब रंग रसिया भी वास्तविक जीवन के चरित्रों पर बनी फ़िल्में हैं, कितना मुश्किल है यह?

बहुत. डी दाऊद और रिस्क दया नायक की जिंदगियों से प्रेरित फ़िल्में थीं और अब रंग रसिया राजा रविवर्मा से. पर मेरे लिए यह चुनौती भरा है.

मैंने अब तक जितनी भूमिकाएं की वे समकालीन चरित्रों वाली थी जिनके बारे में मैं जनता समझता था लेकिन राजारवि वर्मा की अभिव्यक्ति, उनकी शारीरिक भाषा और प्रतीकों को समझने के लिए मैंने पेंटिंग सीखी. इसे करते हुए मैंने रंग, चित्रकार और एक स्त्री की भावनाओं को भी समझा.

मुझे लगता है कि मेरे लिए यह एक तरह से ट्रांजिशन का समय है जिसमें मैंने थोड़े से समय में ही कई तरह की भूमिकाएं कर लीं हैं.

अब आने वाली फ़िल्मों में आप किस तरह की भूमिकाओं में दिखेंगे?

सबसे महत्वपूर्ण तो रंग रसिया के बाद करमा ही है, जिसमें न्यूयार्क में रहने वाले एक एक जोड़े की प्रेम और संबधों की कहानी है और जो भारत आकर होली पर अपने संबंधों का अहसास करतें हैं.

एक फ़िल्म खुसड़ प्रसाद का भूत और लव खिचड़ी है, जिसमें मैं एक साथ सात हीरोइनों के साथ प्रेम करता दिखाई दूँगा. श्रीनिवास भाषायम की इस फ़िल्म में मेरे साथ रितुपर्णो सेन गुप्ता, सोनाली कुलकर्णी और दिव्या दत्ता जैसी अभिनेत्रियाँ हैं.

आपकी पिछली फ़िल्मों के इतिहास को देखते हुए अब इन फ़िल्मों से आप क्या उम्मीद कर रहे हैं?

मैं चाहूँ तो भी अपनी फ़िल्मों के हिट या फ्लॉप होने के बारे में कुछ नहीं तय कर सकता. यह लोगों के ऊपर है. मैं हमेशा अपनी फ़िल्मों में मेहनत करता हूँ. मेरा काम अपना काम बेहतर करना है बाक़ी तो लोगों के ऊपर है.

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