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    बाल कलाकारों पर फ़िल्म

    By Neha Nautiyal
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    इस सप्ताह रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘पंख’ हिंदी फ़िल्मों में बाल कलाकार किन परेशानियों से गुज़रते हैं उस पर प्रकाश डालती है. फ़िल्म में एक मां अपने बेटे को एक लड़की की भूमिका में फ़िल्मों में लाती है. इस बात का उस लड़के के जीवन पर गहरा नकारात्मक असर पड़ता है.

    फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाईं हैं बिपाशा बासु, मैराडोना रेबेलो और महेश मांजरेकर ने. साथ ही इस फ़िल्म में रॉनित रॉय एक मेहमान कलाकार के रुप में नज़र आएँगे.

    फ़िल्म के निर्देशक सुदीप्तो चट्टोपाध्याय कहानी के बारे में बताते हैं कि बचपन में फ़िल्मों में लड़कियों का किरदार करने के बाद, वो लड़का बड़ा होकर मानसिक पीड़ा से गुज़रता है और उसके जीवन में काफ़ी उथल पुथल आ जाती है.

    फ़िल्म को काफ़ी संवेदनशील बताते हुए सुदीप्तो चट्टोपाध्याय कहते हैं, “ये हिंदी फ़िल्म उद्योग में बहुत ही अजीब मुद्दा है जहां बाल कलाकारों को उनके माता-पिता उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ फ़िल्मों में धकेल देते हैं.”

    मानसिक दवाब

    साठ और सत्तर के दशक में बहुत सी लड़कियां फ़िल्मों में लड़कों का किरदार निभाया करतीं थीं. डेज़ी इरानी, हनी इरानी, सारिका, मास्टर गुड्डु और मास्टर बिट्टू जैसे कई उदाहरण हैं.

    फ़िल्म के निर्देशक को इस फ़िल्म की प्रेरणा दिलीप घोष की फ़िल्म ‘द चिल्ड्रन ऑफ़ द सिल्वर स्क्रीन’ से मिली. चट्टोपाध्याय कहते हैं, “मुझ़ पर इस फ़िल्म का गहरा असर पड़ा क्योंकि अधिकतर बाल कलाकार बड़े होकर सिनेमा में कामयाब नहीं हो पाते और काफ़ी मनोविज्ञानिक दवाब में रहते हैं.”

    फ़िल्म में काम कर रहे रॉनित रॉय भी अपनी निर्देशक की एक पेचीदा विषय पर फ़िल्म बनाने की कोशिश को सराहते हैं.

    रॉनित को पंख में महेश मांजेरकर के साथ काम करने में ख़ूब मज़ा आया क्योंकि उनका किरदार गंभीर है जिसमें थोड़ा-बहुत हंसी-मज़ाक मांजेरकर की वजह आ जाता है.

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