Pankaj Tripathi ने सिनेमा में स्टारडम के नुकसान और भ्रम के बारे में कहा, 'एक्टर खुद को ईश्वर समझने लगते हैं'

Pankaj Tripathi on Stardom: एक के बाद एक अपनी फिल्मों और किरदारों से दर्शकों के दिल में जगह बना चुके अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने हाल ही में एक इवेंट के दौरान न्यूकमर्स को सलाह देते हुए कहा कि, "किसी कैरेक्टर की तैयारी में दो-तीन दिन लगते हैं, लेकिन अभिनेता बनने की तैयारी में 25-30 साल।"
अपने सफर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "एक्टिंग कुश्ती नहीं है, कि छह मिनट के अंदर आप अपने प्रतिद्वंद्वी को हरा सकते हैं। दो कलाकार एक साथ एक परफेक्ट सीन दे सकते हैं, और इसमें कोई जीत या हार नहीं होती है। मैं 2004 में एनएसडी आया था, और एनएसडी में आने से पहले, मैंने पटना में नौ साल तक नाटकों में अभिनय किया। ये सफर 25-30 साल का रहा है और मैं कह सकता हूं कि अभी सीख रहा हूं। यह बिल्कुल सच है। एक्टर के प्रोसेस में वक्त लगता है, कैरेक्टर के प्रोसेस में कम टाइम लगता है।"
सिनेमा भम्र क्रिएट करता है
वहीं, पंकज त्रिपाठी ने सिनेमा में स्टारडम के नुकसान और भ्रम के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा, "सिनेमा बहुत जल्दी दिमाग खराब करता है। शूटिंग पर 200-400 लोग आ जाते हैं, तो अभिनेता को लगता है कि मैं बहुत शक्तिशाली हूं। लेकिन हमें ये नहीं पता कि एक सिपाही भी रोक कर, आप को भीतर (जेल में) भेज सकता है। सिनेमा भ्रम क्रिएट करता है, और सिनेमा का एक्टर उस भ्रम में पड़ के खुद को ईश्वर समझने लगता है। फिर वो किसी और ट्रैक पर निकलते हैं। जिस से अभिनेता के कला का भी नुक्सान होता है।"
परफेक्ट एक्टर जैसा कुछ नहीं होता है
परफेक्ट एक्टर की परिभाषा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, "अब, जब मैं दस साल पहले किए गए काम को देखता हूं, जब मैंने NSD से स्नातक किया था, तो मुझे लगता है कि मैं कितना बुरा अभिनेता था। मैं जानता हूं कि दस साल बाद मैं अपना मौजूदा काम देखूंगा और मैं तभी भी ऐसा ही सोचूंगा। बेस्ट एक्टर बोल कर कुछ नहीं होता। एक्टिंग का कोई पैरामीटर नहीं है, कि 'ये परफेक्ट एक्टर है'। यह जीवन भर सीखने की प्रक्रिया है। उसेन बोल्ट बेहतरीन धावक हो सकते हैं, लेकिन अभिनय में 'सर्वश्रेष्ठ' नाम की कोई चीज नहीं होती।"


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