लता मंगेशकर के निधन पर ग़मगीन पाकिस्तान: आज भारत ने जो खोया उसकी भरपाई 1000 पाकिस्तान भी नहीं कर पाएंगे

संगीत धर्म, ज़ात और सरहद की दीवार पार कर जाता है। इस बात को एक बार फिर साबित किया आज लता मंगेशकर के निधन ने। लता मंगेशकर के निधन पर जहां भारत पूरी तरह क्षुब्ध है वहीं पाकिस्तान भी ग़मगीन है। ट्विटर पर लता मंगेशकर के पाकिस्तान फैन्स के ट्वीट इस समय काफी वायरल हो रहे हैं।

जहां पाकिस्तान के टीवी चैनल, दिन भर लता मंगेशकर को ट्रिब्यूट देते रहे वहीं एक ट्विटर यूज़र ने भावुक होकर लिखा - आज भारत ने जो खोया है उसकी भरपाई 1000 पाकिस्तान मिलकर भी नहीं कर पाएंगे।

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पाकिस्तान के एक मंत्री ने भी अपने ट्वीट में बताया कि लता मंगेशकर का निधन पाकिस्तान के लिए भी क्षति है। यहां का कोई घर ऐसा नहीं होगा जिसने उनके गानों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा ना बनाया हो। पाकिस्तान के कुछ स्टार्स और सिंगर्स ने भी लता मंगेशकर को श्रद्धांजलि दी। वहीं कई फैन्स ने उन्हें पाकिस्तान की नूर जहां के बराबर रखा।

गौरतलब है कि लता मंगेशकर के बारे में कई दिलचस्प किस्से हैं जो फैन्स को नहीं पता है। और अगर पता है भी तो उन्हें बार बार दोहराया जाता है। ये किस्से अब केवल उनकी यादें बन कर रह चुके हैं।

सात दशकों का करियर

सात दशकों का करियर

लता मंगेशकर ने अपने करियर की शुरूआत 1942 में की थी। वहीं उन्होंने अपने करियर के लिए आखिरी गाना गाया 2015 में। सात दशकों के इस योगदान के लिए उन्हें उनके 90वें जन्मदिन पर देश की बेटी की उपाधि से सम्मानित किया गया था। लता मंगेशकर, स्वर कोकिला, सुर साम्राज्ञी जैसे बहुत से नामों से मशहूर हैं। जितना स्टारडम उन्होंने अपने करियर में देखा है, वैसा कम ही लोगों को मिलता है। पाकिस्तान में लता मंगेशकर का गीत ऐ मालिक तेरे बंदे हम, स्कूलों में प्रार्थना के तौर पर गाया जाता है।

लता जी के शौक और नियम

लता जी के शौक और नियम

गाने को ही पूजा मानने वाली लता मंगेशकर कभी भी रिकॉर्डिंग रूम में चप्पल पहनकर नहीं जाती थीं और साड़ियां भी सिर्फ सफेद रंग की ही पहनती थीं। लता मंगेशकर को फोटोग्राफी का बेहद शौक था। उनकी ली हुई तस्वीरें कई बार विदेशों में भी प्रर्दशनी में लगी चुकी है। गाने के अलावा लता मंगेशकर को क्रिकेट देखना बहुत पसंद है।क्रिकेट का मक्का कहे जाने वाले लॉर्डस् क्रिकेट स्टेडियम में उनके लिए गैलरी रिर्जव रखी जाती थी ताकि वो अपना पसंदीदा खेल देख सकें।

गाने के साथ एक्टिंग

गाने के साथ एक्टिंग

लता मंगेशकर सिर्फ हिन्दी नहीं बल्कि अंग्रेजी, असमिया, बांग्ला, ब्रजभाषा, डोगरी, भोजपुरी, कोंकणी, कन्नड़, मगधी, मैथिली, मणिपुरी, मलयालम, हिंदी, सिंधी, तमिल, तेलुगू, उर्दू, मराठी, नेपाली, उडिया, पंजाबी,संस्कृत, सिंहली आदि भाषाओं में गाने गाए हैं। बतौर अभिनेत्री लता ने कई हिन्दी व मराठी फिल्मों में काम मिया है। हिन्दी में वे बड़ी माँ, जीवन यात्रा, सुभद्रा, छत्रपति शिवाजी जैसी फिल्मों में आ चुकी हैं।

मिली थी राज्यसभा की सदस्यता

मिली थी राज्यसभा की सदस्यता

1999 में लता मंगेशकर को राज्यसभा का सदस्य बनाया गया लेकिन खराब तबियत की वजह से वो संसद नहीं आ पाती थीं। इस दौरान उन्होंने सैलेरी के रूप में एक रूपए भी नहीं लिए और ना दिल्ली में सांसदों को मिलने वाला बंगला लिया। लता मंगेशकर ने उनकी पहली परफॉर्मेंस 9 सितंबर 1938 को शोलापुर में की थी। कुछ ही समय पहले ये बात शेयर करते हुए उन्होंने अपने सोशल मीडिया में लिखा था कि यकीन ही नहीं होता है कि उन्हें गाते हुए 87 साल हो गए हैं। उनका जन्म 1929 में हुआ था और 1948 से वो बॉलीवुड का हिस्सा हैं।गौरतलब है कि लता मंगेशकर, सात दशकों से म्यूज़िक इंडस्ट्री को अपना योगदान दे रही हैं।

रेडियो पर गाया था पहला गाना

रेडियो पर गाया था पहला गाना

16 दिसंबर 1941 को लता मंगेशकर ने रेडियो पर पहली बार गाया था। लता मंगेशकर ने उस समय दो नाट्यगीत गाए थे जिसे सुनकर उनके पिताजी काफी ज्यादा खुश हुए थे। उन्होंने लता जी की मां को बताया कि लता जी को रेडियो पर गाना गाते सुन अब वो निश्चिंत हैं और उन्हें किसी बात की चिंता नहीं है।

रिजेक्ट हो गया था पहला ऑडीशन

रिजेक्ट हो गया था पहला ऑडीशन

लता मंगेशकर ने पहला ऑडीशन 1948 की फिल्म शहीद के लिए दिया था और उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया था। उस दौर में लता जी के गुरू ने कहा था कि एक वक्त होगा जब लोग उनके पैर पड़कर उनसे गाने गंवाने की भीख मांगेंगे। लता जी को पहली बार स्टेज पर गाने के लिए 25 रुपये मिले थे। इसे वह अपनी पहली कमाई मानती हैं। 1949 में लताजी को पहला मौका फ़िल्म "महल" के आयेगा आनेवाला गीत से मिला। इस गीत को उस समय की सबसे खूबसूरत और चर्चित अभिनेत्री मधुबाला पर फ़िल्माया गया था।

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे

1962 में जब लताजी 32 साल की थी तब उन्हें स्लो प्वॉइजन दिया गया था। उनकी बेहद करीबी पदमा सचदेव ने इसका ज़िक्र अपनी किताब 'ऐसा कहां से लाऊं'में किया है। इसके बाद राइटर मजरूह सुल्तानपुरी कई दिनों तक उनके घर आकर पहले खुद खाना चखते, फिर लता जी को खाने देते थे। उनके जाने से संगीत जगत को बहुत बड़ी क्षति हुई है। इस वक्त हर कोई उनके निधन से क्षुब्ध है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।

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