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    गुलज़ार को लाइफ़ टाइम पुरस्कार

    By Staff
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    पाणिनी आनंद

    बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

    दिल्ली में ओसियान सिनेफ़ैन फ़िल्म समारोह की शुरुआत शनिवार की शाम हो गई. राजधानी में एशियाई और अरब सिनेमा का यह 11वाँ वार्षिक आयोजन है.

    समारोह की शुरुआत हुई भारत के जाने-माने लेखक-फ़िल्मकार और गीतकार गुलज़ार को सम्मानित किए जाने से.

    संपूरन सिंह गुलज़ार को सिनेमा में उनके विशेष योगदान के लिए लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

    गुलज़ार पिछले पाँच दशकों से भारतीय सिनेमा जगत में कभी अपने गीतों, कभी अपने कथानकों और कभी अपने निर्देशन से लोगों को आश्चर्यचकित करते रहे हैं.

    साहित्य अकादमी अवार्ड हो या स्लमडॉग के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑस्कर जैसा सम्मान, गुलज़ार के काम को समय-समय पर पहचान और सम्मान मिलता रहा है.

    ओसियान सिनेफ़ैन ने इससे पहले यानी पिछले वर्ष जाने-माने भारतीय फ़िल्मकार मृणाल सेन को यह पुरस्कार दिया था.

    लाइफ़टाइम एचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किए जाने पर गुलज़ार ने कहा कि जब किसी कलाकार के काम को पहचान मिलती है, उसे सम्मानित किया जाता है तो इससे कलाकार का मनोबल बढ़ता है और बेहतर देने की प्रेरणा भी मिलती है.

    आंधी, परिचय, किनारा, माचिस, हूतू-तूतू, ओंकारा, बंटी और बबली, स्लगडॉग जैसे न जाने कितने नाम हैं जिनसे गुलज़ार जुड़े रहे, जिनको गुलज़ार की वजह से पहचान मिली.

    11वाँ फ़िल्मोत्सव

    समारोह की शुरुआत हुई रोमेनियन फ़िल्म हुक्ड से. इसबार देश और दुनिया की क़रीब 100 छोटी-बड़ी फ़िल्मों का प्रदर्शन इस समारोह के दौरान होगा.

    हालांकि इसबार का समारोह अपने पिछले आयोजनों से क़द में कुछ छोटा है. कुछ जानकारों का कहना है कि इसके पीछे आर्थिक कारण भी हो सकते हैं.

    पिछले एक वर्ष में मंदी की मार ओसियान समूह पर भी पड़ी है. पर ओसियान के कर्ता-धर्ता इस बात को स्वीकार नहीं करते.

    समारोह का आयोजन प्रतिवर्ष जुलाई में होता था. इसबार यह टला और अक्टूबर में इसे करने का फ़ैसला लिया गया.

    पिछले आयोजनों के दौरान 10 दिनों तक दिल्ली में सिनेप्रेमियों के बीच उत्साह का कारण बना रहनेवाला यह समारोह इसबार केवल सात दिनों का ही है.

    फ़िल्मों की तादाद और उनके दिखाए जाने वाले अलग-अलग वर्गों की तादाद भी घटा दी गई है. हालांकि फ़िल्म समारोह के प्रभारी जाने-माने फ़िल्मकार मणि कौल कहते हैं कि इसके पीछे कारण कुछ और नहीं, गुणवत्ता है.

    वो बताते हैं कि इसबार से चीजों को बदलने की कोशिश की जा रही है ताकि यह फ़िल्म समारोह अन्य समारोहों से बेहतर और ज़्यादा उत्पादक साबित हो. अगले वर्ष से आयोजन 15 दिन का होगा.

    हरबार दक्षिण एशियाई फ़िल्मों को जिसमें पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से भी फ़िल्में आती थीं, समारोह में जगह नहीं मिली है. फ़ोकस है भारतीय सिनेमा और ऐसी बॉलीवुड फ़िल्में जिन्होंने बॉलीवुड की मुख्यधारा से अलग काम करके भी दर्शकों के बीच अच्छा प्रदर्शन और कारोबार किया है. कमीने, देव डी और ओए लक्की लक्की ओए जैसी फ़िल्में इसमें शामिल हैं.

    पर बॉलीवुड पर फ़ोकस के बावजूद अरब और यूरोप सहित दुनिया के 16 से भी ज़्यादा देशों की फ़िल्में समारोह में हैं. मणिकौल जैसे फ़िल्मकार के हाथ में इसकी बागडोर है और समारोह में बहस, सिनेमा पर चर्चा और संवाद के लिए इसबार ज़्यादा अवसर भी.

    देखना यह है कि सिने प्रेमी समारोह के कलेवर में आए बदलाव और चयन के नए पैमानों पर जुटाई गई फ़िल्मों से सजे इस 11वें आयोजन को कितना पसंद करते हैं.

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