»   »  नवकेतन ने पूरे किए 60 बरस

नवकेतन ने पूरे किए 60 बरस

By Staff
Subscribe to Filmibeat Hindi
नवकेतन ने पूरे किए 60 बरस

वंदना

बीबीसी संवाददाता

बेहतरीन सिनेमा के कद्रदान अभिनेता-निर्देशक गुरुदत्त का नाम बड़े अदब से लेते हैं. कौन भुला सकता है ज़ीनत अमान जैसी दिलकश अभिनेत्री को या फिर तब्बू जैसी बेमीसाल अदाकारा को. तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले संगीत निर्देशक जयदेव आज भले ही न हों लेकिन उनके गीत ज़हन में ताज़ा हैं.

इन सब कलाकारों में एक बड़ी समानता है और वो ये कि इन्हें पहली दफ़ा मौके देने या तराशने का काम किया है नवकेतन फ़िल्मस ने- वो बैनर जिसे 1949 में शुरु किया था सदाबहार देव आनंद ने.

1949 वो समय था जब दो साल पहले आज़ाद हुआ भारत खुली हवा में साँस लेना सीख रहा था, नौजवानों में कुछ नया करने की चाह थी. उसी दौरान युवा देव आनंद ने अपने भाइयों की मदद से शुरु की अपनी प्रोडक्शन कंपनी- नवकेतन. और आज नवकेतन के पूरे 60 बरस पूरे हो गए हैं.

1949 में बैनर तले पहली फ़िल्म बनी थी अफ़सर जिसमें देव आनंद और सुरैया ने काम किया था. निर्देशन किया था देव आनंद के भाई चेतन आनंद ने जो पहले से ही काफ़ी चर्चित थे. उनकी फ़िल्म नीचा नगर को 1946 में कान फ़िल्मोत्सव में पाम ड्योर मिला था.

एक बार नवकेतन ने फ़िल्में बनाने का जो सिलसिला शुरु किया तो मानो रुकने का नाम ही नहीं लिया. देव आनंद ने 1951 में अपने एक बहुत अज़ीज़ दोस्त को नवकेतन की फ़िल्म बाज़ी के निर्देशन की कमान सौंपी और इस तरह फ़िल्म इंडस्ट्री को मिला गुरु दत्त जैसा निर्देशक.

लीक से हट कर

बाज़ी का एक गाना था- ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले, अपने पे भरोसा है तो इक दांव लगा ले’. यही ख़ूबी थी नवकेतन और इससे जुड़े तीनों भाइयों की- देव, चेतन और विजय आनंद की- अंजाम का परवाह किए बगैर दांव लगाना.

नवकेतन के बैनर तले ऐसी फिल्में बनी जिन्होंने लक्ष्मण रेखाओं को तोड़ नए आयाम स्थापित किए- कभी रूढ़ीवादी परपंराओं को चुनौती देते विषयों पर फ़िल्में बनाई, कभी नई-नई तकनीकों का इस्तेमाल तो कभी ऐसे गीत-संगीत का प्रयोग जो आपने पहले न कभी सुना हो न कल्पना की हो.

काला पानी, काला बाज़ार, हम दोनों और तेरे घर के सामने जैसी हिट फिल्मों के बाद 60 के दशक में नवकेतन बैनर की फ़िल्म गाइड आई जिसे विजय आऩंद ने निर्देशित किया.

इस फ़िल्म में सब कुछ किसी भी पारंपरिक भारतीय फ़िल्म की परिभाषा से बिल्कल उलट था. विवाहोत्तर संबंध और बिन शादी के साथ रहते हीरो-हिरोइन जिसे आज लिव-इन कहते हैं. गाइड की रोज़ी यानी वहीदा रहमान कोई ‘सती-सावित्री’ वाली छवि में बंधी हुई अभिनेत्री नहीं थी और न ही रोज़ी को इस बात का मलाल था. न ही हीरो यानी राजू गाइड अच्छाइयों का पुलिंदा था.

पचास और 60 के दशक को भारतीय सिनेमा का गोल्डन युग कहा जाता है. उस समय का पूरा माहौल ही कुछ अलग मिजाज़ का था. देव आनंद, राज कपूर, दिलीप कुमार, मनोज कुमार जैसे अभिनेताओं का बोल-बाला था.

राज कपूर आरके फ़िल्मस के बैनर तले आवारा, बूट पॉलिश, श्री 420 जैसी फ़िल्मों में अभिनय भी कर रहे थे और निर्देशन भी. मनोज कुमार उपकार जैसी फ़िल्में बना रहे थे. नवकेतन भी इस दौरान अपने शीर्ष पर था. यानी सृजनशीलता की कोई कमी नहीं थी.

60 के दशक में चेतन आनंद ने अपना अलग प्रोडक्शन बैनर बना लिया और हक़ीकत,हीर रांझा और कुदरत जैसी फ़िल्में बनाईं. लेकिन नवकेतन का सफ़र थमा नहीं. विजय आनंद और देव आनंद ने मिलकर ज्वेल थीफ़ और जॉनी मेरा नाम बनाई.

पारखी नज़र

नवकेतन ने एक सौगात समय-समय पर हमेशा हिंदी सिनेमा को दी- नए हुनरमंद अभिनेता-अभिनेत्रियाँ, कलाकार और निर्देशक. गुरु दत्त का किस्सा तो आपने पहले पढ़ा ही.

अपनी कॉमिक टाइमिंग से सबको मात देने वाले जॉनी वॉकर को नवकेतन की फ़िल्म बाज़ी ने ही ढूँढा. देव आनंद जब ख़ुद निर्देशन करने लगे तो उन्होंने 1978 में टीना मुनीम को देखा, परखा और देस परदेस में पर्दे पर उतारा.

स्वामी दादा में बॉलीवुड के जग्गू दादा यानी जैकी श्रॉफ़ को भी मौका दिया. हिंदी फ़िल्मों की अभिनेत्रियों को एक अलग ही रंग में रंगने वाली ज़ीनत अमान भी नवकेतन की देन है.

नवकेतन वो बैनर रहा जिसने समसामयिक और सामाजिक महत्व के विषयों को फ़िल्मों में उठाने से कभी गुरेज़ नहीं किया. 70 के दशक में प्रचलित हिप्पी कल्चर, ड्रग्स...इसी सब को मुद्दा बनाया देव आनंद ने नवकेतन की फिल्म हरे कृष्णा हरे राम जो आज कल्ट फ़िल्म मानी जाती है.

1971 में आई इस फ़िल्म का विषय बोल्ड था, इसका फ़िल्मांकन प्रयोगात्मक था, हीरोइन भी पारंपरिक छवि से दूर पाश्चात्य कपड़े पहने, कश भरती एक लड़की थी.

संगीत में भी ये फ़िल्में अव्वल मानी जाती थीं. एसडी बर्मन ने काला पानी, गाइड, बाज़ी, ज्वेल थीफ़, टैक्सी ड्राइवर जैसी फ़िल्मों में नवकेतन को कई ख़ूबसूरत गाने दिए. आरडी बरमन, राजेश रोशन और कल्याणजी आनंदजी जैसे संगीतकारों ने भी नवकेतन के साथ काम किया.

अच्छा जी मैं हारी (काला पानी), आज फिर जीने की तमन्ना है (गाइड), होठों पे ऐसी बात( ज्वेल थीफ़), दम मारो दम, अभी न जाओ छोड़ कर, मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया, ( हम दोनों), जाएँ तो जाएँ कहाँ (टैक्सी ड्राइवर)... नवकेतन से निकले कुछ नगीने हैं.

किस राह पर नवकेतन

लेकिन 80 का दशक आते-आते फ़िल्मी परिदृश्य बदलने लगा. विजय आनंद की फ़िल्म बनाने की रफ़्तार कम ही गई, सदाबहार देव आनंद फ़िल्में बनात तो रहे लेकिन बॉक्स ऑफ़िस की कसौटी पर ये फ़िल्में पिटती गईं.

ये फ़िल्में कब आती हैं और कब चली जाती हैं बहुत से लोगों को शायद पता भी नहीं चलता. लेकिन एक फ़िल्म के पिटने के साथ ही देव आनंद एक नई महत्वाकांक्षी फ़िल्म की घोषणा कर देते हैं.

चेतन और विजय आनंद इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं और सदाबहार देव आनंद ने अपनी ज़िंदादिली से आज भी नवकेतन को ज़िंदा रखा हुआ है.

इसकी चमक फ़ीकी पड़ गई है, बॉक्स ऑफ़िस पर खनक कम हो गई है लेकिन अपने नाम के अनुरुप नवकेतन फिर भी कुछ नया करने की कोशिश करने में जुटा हुआ है-अंदाज़ और अंजाम फिर कुछ भी हो.

इनदिनों देव आनंद फ़िल्म चार्जशीट बना रहे हैं और तमन्ना है इसे कान फ़िल्मोत्सव में ले जाने की. वे कहते हैं कि नवकेतन और फ़िल्मों का साथ वे नहीं छोड़ेंगे- जज़्बा कुछ वैसा ही कि.. मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया.

For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS
For Daily Alerts

    रहें फिल्म इंडस्ट्री की हर खबर से अपडेट और पाएं मूवी रिव्यूज - Filmibeat Hindi

    X
    We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Filmibeat sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Filmibeat website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more