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    स्थानीय होकर भी सार्वभौमिक है फ़िराक़: नंदिता

    By वंदना
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    नंदिता दास बतौर निर्देशक अपनी पहली फ़िल्म फ़िराक़ लेकर तैयार हैं. टोरंटो और पुसान फ़िल्म उत्सवों को बाद इस फ़िल्म को लंदन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी दिखाया जा रहा है. गुजरात की पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म फ़िराक़ में नसीरुदीन शाह, परेश रावल और दीप्ति नवल ने काम किया है.

    गुजरात में हुई हिंसा की पृष्टभूमि में बनी इस फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह, परेश रावल, दीप्ति नवल, संजय सूरी और टिस्का चोपड़ा ने काम किया है. लंदन फ़िल्म उत्सव 15 से लेकर 30 अक्तूबर तक चलेगा. भारत में फ़िराक़ जनवरी में रिलीज़ होगी.

    लंदन फ़िल्म उत्सव में बतौर निर्देशक तो नंदिता है हीं, अभिनेत्री के तौर पर भी उनकी फ़िल्म रामचंद पाकिस्तानी यहाँ दिखाई जाएगी.

    नंदिता दास से हुई बातचीत के मुख्य अंश :

    आपकी फ़िल्म फ़िराक़ लंदन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाई जा रही है, अभी भारत में तो रिलीज़ नहीं हुई है. सबसे पहले तो फ़िल्म के बारे में बताइए.

    फ़िराक़ उर्दू का लफ़ज़ है- उसके दो मतलब हैं एक तो जुदाई या अलगाव और दूसरा तलाश के संदर्भ में इस्तेमाल होता है. इस फ़िल्म में पांच-छह कहानियाँ हैं-कुछ जुड़ी हुई हैं और कुछ अलग-अलग हैं. फ़िल्म में यही दिखाया है कि समाज में होनी वाली हिंसा का हमारे रिश्तों पर क्या असर पड़ता है. किस तरह से ख़ौफ़ का माहौल बढ़ रहा है, पूर्वाग्रह पैदा हो रहे हैं, उसी के बारे में है फ़िल्म. इसकी पृष्ठभूमि गुजरात की है.

    फ़िल्म कई दूसरे उत्सवों में भी गई है, टोरंटो में दिखाई गई, कैसी प्रतिक्रिया रही है?

    फ़िल्म में नसीरुदीन शाह और राजपाल यादव भी हैं

    हम फ़िराक़ को टेलूराइड, टोरंटो और पुसान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में लेकर गए हैं. प्रतिक्रिया काफ़ी दिलचस्प रही है- चाहे वो एशिया के लोग हों, अमरीका के या कनाडा के लोग. क्योंकि मानव भावनाएँ और इच्छाएँ एक जैसी होती हैं. कहीं न कहीं लोग हिंसा से तंग आ चुके हैं, इसे समझने भी चाह रहे हैं और शांति भी लाना चाहते हैं. इन्हीं भावनाओं को शायद फ़िराक़ दिखाने की कोशिश करती है.

    कनाडा में एक लड़की में मुझसे कहा कि उसे फ़िल्म देखकर अपने देश श्रीलंका की याद आ गई, हिंसा के कारण उसकी एक दोस्त के साथ जो दूरी बढ़ गई है वो याद आ गई. पुसान में एक लड़की ने मुझसे कहा कि उसे जापान और कोरिया के बीच तनाव की याद आ गई जबकि मेरी फ़िल्म की पृष्ठभूमि गुजरात की है. लोग अपने-अपने संदर्भ में फ़िल्म को देख रहे हैं. कभी-कभी स्थानीय फ़िल्में भी यूनिवर्सल हो सकती हैं.

    आपने पहली बार फ़िल्म का निर्देशन किया है यानी आप कैप्टन ऑफ़ द शिप थीं. कैसा था ये अनुभव?

    निर्देशन की तुलना में अभिनय केकवॉक है, अभिनय में भी चुनौती होती है पर फिर भी दायरा कुछ हद तक सीमित होता है. लेकिन जब आप निर्देशक होते हैं तो हर चीज़ में आपको फ़ैसला लेना पड़ता है. आप ये नहीं कह सकते कि ये मेरा काम नहीं है- कपड़े कौन से पहनने हैं, पर्दे का रंग क्या होगा, एडिटिंग में कितना हिस्सा रखना है सब कुछ.

    बाकी लोगों का योगदान ज़रूरी तो है पर अंतत निर्देशक पर ही निर्भर करता है कि फ़िल्म अच्छी बनती या बुरी. अभिभावक की तरह फ़िल्म से जुड़े लोगों को भी संभालना होता है. सबका अपना अपना अहम होता है, कभी कोई नोकझोंक हो जाती है. अब मैं निर्देशकों की शायाद और भी ज़्यादा इज़्ज़त करने लगी हूँ क्योंकि अब मुझे पता चला है कि कितना कुछ करना पड़ता है निर्देशकों को.

    फ़िल्म में बहुत उम्दा लोगों ने काम किया है, नसीरुद्दीन शाह, दीप्ति नवल, परेश रावल. क्या ऐसे लोगों को निर्देशित करना चुनौतीपूर्ण था ?

    रॉक ऑन के बाद शहाना गोस्वामी फ़िराक़ में दिखाई देंगी

    एक तरह से मुश्किल भी था और आसान भी. कुछ कलाकारों के साथ मैने पहले काम किया था और कुछ अच्छे दोस्त हैं. मिल-मिलाकर काम होता है. नसीरूद्दीन शाह हों, परेश रावल या फिर दीप्ति नवल.. सब मझे हुए कलाकार हैं. कुछ थिएटर के लोग हैं जिन्होंने पहली बार कैमरे के सामने काम किया.

    युवा लोग भी हैं जैसे शहाना गोस्वामी जिन्होंने रॉक ऑन में काम किया है. संजय सूरी और टिस्का चोपड़ा भी हैं. कलाकार मुझते कहते थे कि क्योंकि मैं अभिनेत्री भी हूँ इसलिए मुझे उनसे क्या चाहिए मैं वो बख़ूबी उन्हें समझा पाती हूँ.

    क्या ये मन नहीं हुआ कि ख़ुद को भी फ़िल्म में कास्ट करें ?

    मुझे लगा कि पूरा ध्यान निर्देशन में ही लगाना चाहिए क्योंकि काम बहुत ज़्यादा था. एक बार ज़रूर ऐसा हुआ था कि एक किरदार को लेकर दिक्कत आ रही थी, कोई फिट नहीं बैठ रहा था. तब लगा कि मैं अभिनय करूँ. पर अब वो किरदार टिस्का चोपड़ा कर रही हैं क्योंकि मुझे लगा कि बेहतर है कि रोल कोई और ही करे.

    कई लोगों ने कहा कि एलफ़्रेड हिचकॉक की तरह एक बार कहीं फ़िल्म में शक्ल दिखा दो. लेकिन ये कोई मज़े वाली फ़िल्म नहीं है कि लोग कहें अरे नंदिता दास फ़िल्म में दिखीं.

    हिंसा से होने वाले असर को फ़िल्म में दिखाया गया है. आप कई सामाजिक मुद्दों से जुड़ी रही हैं और साथ ही फ़िल्म कलाकार भी हैं. क्या ये कहना सही होगा कि इस फ़िल्म के ज़रिए आपकी उन दो चीज़ों का संगम हुआ है जो आपके दिल के करीब है.

    संगम ज़रूर हुआ है. मैने चाहे फ़िल्में की हों या फिर सामाजिक काम दोनों का मकसद एक होता है. मेरे अलग-अलग पैशन फ़िराक़ में एक साथ जुड़ पाए हैं. समाज में होने वाली हिंसा से मुझे बेहद तकलीफ़ होती है, मैने कई बार इस विषय पर चर्चाओं में भी हिस्सा लिया है. फिर भी लगता था कि ये काफ़ी नहीं है. इस फ़िल्म के ज़रिए सामाजिक चेतना का मुद्दा और मेरा रचनात्मक पहलू यानी फ़िल्म दोनों मैं एक साथ कर पाई हूँ.

    इस फ़िल्म के काम में आप काफ़ी मसरुफ़ रही हैं, दूसरी फ़िल्म डाइरेक्ट करने का इरादा है?

    अभी थोड़े दिन का ब्रेक ज़रूरी है. लोग एक के बाद एक फ़िल्म बनाते हैं लेकिन पता नहीं कैसे कर पाते हैं. मेरे लिए तो मुश्किल है. एक तो वैसी कहानी होनी चाहिए जो दिल को छू जाए. फ़िल्म की स्क्रिप्ट, इसकी प्री-प्रोडक्शन में भी काफ़ी समय लगता है. अब कुछ दिन अभिनय करना चाहूँगी. मेरा मानवाधिकार का काम भी नज़रअंदाज़ हुआ है, वो भी करना चाहूँगी. एक-दो साल बाद ज़रूर दूसरी फ़िल्म निर्देशित करूँगी.

    लंदन फ़िल्म फ़ेस्टविल में आपकी फ़िल्म रामचंद पाकिस्तानी भी दिखाई जा रही है जिसमें आपने अभिनय किया है.पाकिस्तानी फ़िल्म में काम करने का अनुभव कैसा रहा.

    रामचंद पाकिस्तानी की निर्देशक महरीन जब्बार को मैं आठ सालों में जानती हूँ. हम हमेशा कहते थे कि एक दिन ज़रूर साथ काम करेंगे. रोल तो मुझे उतना एक्साइटिंग नहीं लगा था क्योंकि मैं वैसा रोल कर चुकी हूँ लेकिन कहानी बहुत ज़रूरी है भारत और पाकिस्तान के लिए.

    भारत-पाक रिश्तों में हमेशा शक़ का माहौल रहा है, ऐसा बना दिया गया है कि वो हमारा दुश्मन देश है. कोई भी चीज़ जो इसे कम कर सके ऐसे कामों में मैं जुड़ना चाहूँगी. पाकिस्तान में काम करने का अलग अनुभव था. पहले जब भी पाकिस्तान गई तो शहरों में ही गई लेकिन इस फ़िल्म की शूटिंग के लिए पहली बार सिंध के गाँवों में जाने का मौका मिला. वो गाँव भी वैसे ही हैं जैसे हमारे यहाँ कच्छ और राजस्थान है. मुझे ख़ुशी है कि लंदन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में मैं बतौर अभिनेत्री भी हूँ और बतौर निर्देशक भी हूँ.

    भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की अलग ही दास्तां रही है. क्या वाकई फ़िल्मों में इतनी क्षमता होती है कि भारत-पाक जैसे जटिल मुद्दों पर लोगों की राय बदल सके?

    फ़िल्म से कभी कोई बड़ी क्रांति नहीं हुई. लेकिन मानसिकता पर कई चीज़ों का प्रभाव पड़ता है. कोई फ़िल्म अगर दिल और दिमाग़ को छू जाए तो उसका असर कुछ तो ज़रूर पड़ेगा. आसान हल तो कभी नहीं मिलेगा. दो घंटे में पूरी दुनिया की समस्याएँ तो नहीं सुलझ सकतीं. लेकिन हम दो-चार अच्छे सवाल ही उठा पाएँ तो वो भी ज़रूरी है क्योंकि तभी जवाब ढूँढ पाएँगे.

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