ज़माने के साथ मुशायरे भी बदल रहे हैं

By Staff
ज़माने के साथ मुशायरे भी बदल रहे हैं

मिर्ज़ा एबी बेग

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, दिल्ली से

जश्ने-बहार के मुशायरे में इस बार का विषय था अमन यानी शांति और इसी के संदेश के साथ मथुरा रोड पर स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल में मुशायरा हुआ जिसमें भारत और पाकिस्तान के अलावा ब्रिटेन, कनाडा, अफ़ग़ानिस्तान और पहली बार नेपाल का प्रतिनिधित्व हुआ था.

मुशायरे तो आम तौर पर दिल्ली और उर्दू की परंपरा और संस्कृति का अटूट हिस्सा है लेकिन जश्ने-बहार में शायरों को सुनने वालों से पहले मीडिया के हवाले किया जाना कुछ नया है.

इस बार उर्दू के सफ़र को मुशायरे से पहले एक भाषण के बीच इलेक्ट्रॉनिक तौर पर पेश किया गया.

हमारी मुलाक़ात सारे शायरों से हुई जिनमें ज़िक्र मुशायरों की परंपरा का हुआ, पुराने शायरों का हुआ, मुशायरे की गिरते स्तर का हुआ.

इसी संदर्भ में अशफ़ाक़ हुसैन ज़ैदी ने कहा अब उस स्तर के शायर नहीं रहे. अशफ़ाक़ हुसैन ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर चार किताबें लिखी हैं इसलिए उनके बिना बात तो बनती ही नहीं थी.

उन्होंने कहा फ़ैज़ मुशायरे के शायर बिलकुल नहीं थे लेकिन उनका कलाम इतना बेहतर था की मुशायरों की शान हुआ करता था.

लाहौर से आने वाले प्रोफ़ेसर असग़र नदीम सैयद ने इस मुशायरों के बदलते मंज़र और गिरते स्तर के हवाले से कहा कि पहले लोग शायर होते थे और फिर फ़िल्मों में जाते थे और अब फ़िल्मों में लोकप्रियता हासिल करने के बाद मुशायरों में सुने जाते हैं.

बहरहाल, ज़माने के हिसाब से मुशायरा भी हाईटेक हो रहा है, सुनने वाले लोगों में शेर को समझने वाले से अधिक मीडिया के लोग और गणमान्य व्यक्ति हुआ करते हैं.

अशफ़ाक़ हुसैन ने कहा मुशायरे के शायर होने के लिए सिर्फ़ शायरी ही ज़रूरी नहीं रही, पढ़ने का अंदाज़, आवाज़, अदायगी, माहौल और फिर शायर की अपनी शख़्सियत भी अहम है, जबकि अच्छी शायरी को इनमें से किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं.

असग़र नदीम का कहना था कि अच्छी शायरी ख़ुद को मनवा कर रहती है.

अशफ़ाक़ हुसैन ने कनाडा या विदेश में होने वाली उर्दू शायरी के हवाले से कहा कि वहां की शायरी में अपने वतन से बिछु़ड़ने का एहसास, दर्द और अपनी संस्कृति और सभ्यता से दूरी का एहसास काफ़ी हद तक पाया जाता है.

इसी संदर्भ में हिंदुस्तान और पाकिस्तान की उर्दू शायरी के हवाले से असग़र नदीम ने कहा जहां की जैसी समस्या है वहां वैसी शायरी हो रही है.

एक सवाल के जवाब में अशफ़ाक़ हुसैन ने कहा कि फ़ैज़ साहब आधुनिकता और क्लासिकी शायरी दोनों का बेहतरीन मिश्रण हैं. उन्होंने सन 1935 के आसपास ही अपना पांव दिखा दिया था.

उनकी नज़्म रक़ीब से अपने प्रतिद्वंद्वी को देखने का एक नया और अनूठा अंदाज़ है जिसे उनसे पहले किसी ने भी नहीं सोचा लेकिन सबने उन्हें काफ़ी सराहा है.

बहरहाल मुशायरे में नेपाल से आने वाले शायर ख़्वाजा मुअज़्ज़म शाह बुनियादी तौर पर मीलाद (पैगंबर मोहम्मद की याद में आयोजित समारोह) पढ़ने वाले ज़्यादा हैं. लेकिन उन्होंने उर्दू को अपने ख़ानदान में ज़िंदा रखा है और कहते हैं कि वह उर्दू में बात करने को तरस जाते हैं इसीलिए उन्होंने अपनी किताब का नाम रेगज़ार रखा है.

मुशायरे में मुनव्वर राना के साथ सबसे से ज़्यादा अशफ़ाक़ हुसैन को सराहा गया और ख़ास तौर से उनकी नज़्म को. किश्वर नाहीद ने अपनी नज़्म हम गुनहगार औरतें पढ़ीं लेकिन ज़्यादा दाद हासिल न कर सकीं.

वहीं कराची से आने वाली अनीस फ़ातिमा ज़ैदी के कलाम को काफ़ी सराहा गया. जावेद अख़्तर से कुछ नया सुनाने की फ़रमाइश की गई. लंदन से तशरीफ़ लाए सोहन लाल राही जो अपने गीत के लिए मशहूर हैं उन्होंने ग़ज़लों में अपना लोहा मनवाया.

कुछ पसंद किए जाने वाले शेर आप भी सुनते चलें.

समुंदर पार कर के अब परिंदे घर नहीं आतेअगर वापस भी आते हैं तो पर लेकर नहीं आते (सोहन राही, लंदन से)

शहीदों की ज़मीं है जिसको हिंदुस्तान कहते हैंये बंजर होके भी बुज़दिल कभी पैदा नहीं करती

हमने भी संवारे हैं बहुत गेसू-ए-उर्दू दिल्ली में अगर आप हैं, बंगाल में हम हैं (मनव्वर राना, कोलकता)

तेरे पहलू में तेरे दिल के क़रीँ रहना है मेरी दुनिया है यहीं, मुझको यहीं रहना है

काम जो उम्रे-रवां का है उसे करने देमेरी आंखों में सदा तुझको हंसी रहना (फ़ातिमा हसन, कराची)

एक हम हैं कि परश्तिश पे अक़ीदा ही नहीं हैऔर कुछ लोग यहां बनके ख़ुदा बैठे हैं

समुंदर ये तेरी ख़ामोशियां कुछ और कहती हैंमगर साहिल पे टूटी कश्तियाँ कुछ और कहती हैं

हमारी शहर की आँखों ने मंज़र और देखे थेमगर अख़बार की ये सुर्ख़ियाँ कुछ और कहती हैं (सुखबीर सिंह शाद, लखनऊ)

शाम से कौन मेरे ध्यान में है रौशनी हर तरफ़ मकान में है

शोर कैसा ये आसमान में है एक परिंदा अभी उड़ान में है (शिव कुमार, निज़ाम, मुंबई)

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