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कोई सरहद न इन्हें रोके...

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कोई सरहद न इन्हें रोके...

यूँ तो पाकिस्तानी फ़िल्म उद्योग की हालत पिछले लंबे अरसे से अच्छी नहीं रही है लेकिन हाल के वर्षों में ख़ुदा के लिए और रामचंद पाकिस्तानी जैसी चंद फ़िल्में आई हैं जिन्हें भारत और पाकिस्तान समेत कई जगह पसंद किया गया.

'रामचंद पाकिस्तानी' की युवा निर्देशक मेहरीन जब्बार ने फ़िल्मों से पहले पाकिस्तानी टीवी में बहुत नाम कमाया है.

नंदिता दास अभिनीत अपनी पहली फ़िल्म रामचंद पाकिस्तानी से उन्होंने फ़िल्मी दुनिया में पिछले साल क़दम रखा था. मेहरीन जब्बार ने न्यूयॉर्क से फ़ोन पर बीबीसी संवाददाता वंदना से विशेष बातचीत की.

आपकी पहली फ़िल्म रामचंद पाकिस्तानी पिछले साल रिलीज़ हुई और फ़िल्म की काफ़ी तारीफ़ हुई. इसका विषय काफ़ी अलग है. अपनी पहली फ़िल्म के लिए इस विषय को चुनने की कोई ख़ास वजह?

मैने कोई बहुत सोच समझकर या विचार विमर्श के बाद ये विषय नहीं चुना था. विषय जैसे ख़ुद ब ख़ुद मेरे पास आ गया. ये सच्ची कहानी थी जो मेरे पिताजी ने मुझे बताई. वे उस बाप-बेटे से मिले थे जिनपर फ़िल्म बनी है. उस वक़्त वे भारतीय जेल से रिहा हुए थे. मेरे पिताजी ने मुझे ये कहानी लिखकर दी. दो मज़हबों और दो देशों के इर्द-गिर्द ये कहानी मुझे छू गई. मुझे लगा कि मैं अपनी पहली फ़िल्म इस कहानी पर बना सकती हूँ.

आपकी फ़िल्म हिंदुस्तान में भी रिलीज़ हुई थी. अब हिंदुस्तानी फ़िल्में पाकिस्तान में भी रिलीज़ हो रही हैं. लेकिन एक तबका इसके ख़िलाफ़ है. आप क्या मानती हैं.

मैं ये मानती हूँ कि जो भी समस्याएँ या राजनीतिक मतभेद दोनों देशों में हों, कला संस्कृति एक ऐसा ज़रिया है जिसकी मदद से लोगों को आप समझ सकते हैं. लोगों में नासमझी और नफ़रत ख़त्म हो सकती है. आप दूसरों का संगीत सुनेंगे, उनके ड्रामे, फ़िल्में और कला देखेंगे तो दूसरे लोगों को ज़्यादा अच्छे तरीके से समझ सकेंगे. चाहे कुछ भी हो जाए कला-संस्कृति के ज़रिए संपर्क हमेशा रहना चाहिए.

रामचंद पाकिस्तानी, ख़ुदा के लिए..ये चंद पाकिस्तानी फ़िल्में हैं जिनकी तारीफ़ हुई है. पाकिस्तान फ़िल्म इंडस्ट्री पर आपकी क्या राय है.

अभी तो सूरते हाल अच्छी नहीं है. दरअसल पाकिस्तानी फ़िल्म उद्योग काफ़ी मुश्किलों से गुज़रा है. एक या दो अच्छी फ़िल्में उसमें दोबारा जान नहीं डाल सकती. सरकार को, निर्माताओं को और सिनेमा मालिकों को लगातार कोशिश करनी होगी कि वे जोखिम उठाएँ और फ़िल्म उद्योग में नई जान फूंके.

पाकिस्तान में हालात भी अच्छे नहीं है तो सिनेमाघरों में दर्शक भी कुछ कम हैं. हमारे यहाँ बहुत हुनरमंद कलाकार, संगीतकार और निर्देशक हैं जो फ़िल्म बनाना चाहते हैं लेकिन अच्छे माहौल के लिए लगातार अच्छी फ़िल्मों का आना ज़रूरी है तभी हालत सुधरेगी.

बतौर फ़िल्म निर्देशक कौन सी चीज़ों आपको प्रभावित करती हैं?

मैं वास्तविकता के करीब रहकर फ़िल्में बनाना पसंद करती हूँ- कहानी को हक़ीकत के रूप में दिखाना. ज़्यादा मसाला डालना मुझे पसंद नहीं क्योंकि कहानी और काम इतना ज़बरदस्त होना चाहिए कि वो अपने आप ही बोले. सत्यजीत रे, मीरा मायर और श्याम बेनेगल ने मुझे प्रभावित किया है. पाकिस्तान में ड्रामा डाइरेक्टर शहज़ाद खालिद और साहिरा काज़मी. ज़्यादा धूम धड़ाके वाली फ़िल्में मैं कम देखती हूँ. हालांकि वो फ़िल्में भी बुरी नहीं है. वैसी फ़िल्म भी शायद एक-दो बार मैं बना लूँ ज़िंदगी में.

आ पकी फ़िल्म रामचंद पाकिस्तानी पर भी बॉलीवुड का असर देखा जा सकता है. एक किरदार है उसमें जो श्रीदेवी की दीवानी है.

बॉलीवुड का असर और उसकी लोकप्रियता को नकारना नहीं चाहिए. बॉलीवुड में बहुत अच्छी कहानियाँ, संगीत और अभिनय देखा जा सकता है. मैं ये कभी नहीं कहूँगी कि बॉलीवुड को दरकिनार कर दें. पाकिस्तान और हिंदुस्तान में आम लोगों की ज़िंदगियों पर हिंदी फ़िल्मों का गहरा असर है और इसे स्वीकार करना चाहिए.

अगर कुछ आपके बारे में जानना चाहें.. आपने पाकिस्तानी टीवी में उम्दा काम किया है और फिर फ़िल्म बनाई. इस मीडियम से रिश्ता कैसे जुड़ा.

मैं पैदा ही इस माहौल में हुई, मेरा और कोई चारा नहीं था. मेरे माता-पिता की विज्ञापन एजेंसी थी. मेरे पिता ने 70 के दशक में पहली अंग्रेज़ी पाकिस्तानी फ़िल्म बनाई थी जो बॉम्बे फ़िल्म फ़ेस्टिवल में 1974-75 में प्रीमियर हुई थी. मैने हमेशा कैमरे ही देखे आस-पास. और मुझे कुछ आता नहीं है. अगर ये काम न करूँ तो पता नहीं भूखी मर जाऊँ.

हिंदुस्तान में महिला निर्देशक हैं लेकिन ज़्यादा नहीं है. पाकिस्तान में क्या सूरते हाल है.

पाकिस्तान में टीवी में तो बहुत सारी महिलाओं ने अच्छा काम किया है. साहिरा काज़मी का मैने नाम लिया. मरीना खान, रूबीना अशरफ़ जैसी अभिनेत्रियाँ निर्देशन कर रही हैं. फ़िल्म उद्योग में जिसे लॉलीवुड कहते हैं उसमें दो बड़ी निर्देशक रहीं- शमीम आरा और संगीता. इन दोनों ने बहुत हिट फ़िल्में दी थीं. हालांकि हर जगह ही कमोबेश महिला निर्देशक कम हैं. वैसे रूझान धीरे-धीरे बढ़ रहा है.

पाकिस्तान और हिंदुस्तान के कलाकारों को लेकर एक फ़िल्म बनानी हो, तो आपकी लिस्ट में कौन-कौन होंगे.

कई सारे कलाकार पसंद हैं. कोंकणा सेन शर्मा मुझे अच्छी लगती है. आमिर खान और तब्बू भी हैं. इतने हैं कि किस किस का नाम लूँ. पाकिस्तान से तो बहुत हैं.

अगली फ़िल्म के बारे में क्या इरादा है?

ज़हन में कहानी पक रही है, तड़का लग रहा है. अगले साल तक शायद कुछ हो जाए. फ़िलहाल मैं टीवी सिरीयल कर रही हूँ ताकि व्यस्त रहूँ.

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