मुल्क के बटवारे से गमजदा थे मेहदी हसन: हंस राज हंस

सूफी गायन के माहिर हंसराज हंस ने मीडिया से बातचीत में हसन के बारे में बताया, मुल्क के टूटने से वह सबसे अधिक गमज़दा थे। उनकी गायकी में , उनकी ग़ज़ल में, उनके चेहरे पर और उनकी बातचीत में यह ग़म साफ झलकता था। हंस ने बताया, अंतिम बार वह लगभग 13-14 साल पहले जालंधर आए थे । जिमखाना क्लब में उन्होंने प्रस्तुति दी थी जहां मैं मंच संभाल रहा था।
गायन के लंबे दौर के बाद वह होटल गए जहां वह सोये नहीं और पूरी रात मुल्क के टूटने के बारे में बातचीत करते रहे । हंस ने बताया, उन्होंने मुझसे कहा कि सबकुछ सामान्य था और अचानक एक दिन पता चला कि हमारा मुल्क अब हमारा नहीं है । हमें यहां से जाना पड़ा । वहां ऐसा लगा जैसे अनजाने मुल्क में, अजनबियों के बीच आ गया हूं।
यह गम हमेशा मेरे साथ रहेगा । हंसराज हंस ने मेहदी के जालंधर प्रवास की तस्वीरें भी दिखायीं । उनके पास पाकिस्तान यात्रा के दौरान मेहदी से मुलाकात की तस्वीरें भी हैं । उन्होंने बताया कि जब मेहदी पाकिस्तान जाते थे तब भी यही बात होती थी । उनके दिल में मुल्क के टूटने और अपनों से बिछड़ने का गम हमेशा रहा ताउम्र वह इससे उबर नहीं पाये हंसराज हंस ने कहा, मेहदी हसन साहब अच्छे खाने के शौकीन थे । भारत आने पर उन्होंने हमेशा राजस्थानी लजीज खाना ही पसंद किया । वह बार बार भारत आना चाहते थे । जब मेरी पाकिस्तान में उसने अंतिम मुलाकात हुई थी तब भी उन्होंने भारत आने की इच्छा जाहिर की थी। पर समय ने साथ नहीं दिया।
जब वह बीमार थे तब भी भारत के प्रति उनके दिल की मोहब्बत कई बार जाहिर हुई और वह यहां आने के लिए हुलस उठते थे । ग़ज़लों की दुनिया के इस शहंशाह के बारे में उन्होंने बताया, बंटवारे के बाद वह पाकिस्तान चले गए । संगीत से गुज़ारा मुमकिन नहीं था । बाद में वह साइकिल रिपेयर का काम करने लगे । इसके बाद मोटर मैकेनिक बन गए।
इन सब के बावजूद संगीत का रियाज चलता रहा । एक बार उन्हें पाकिस्तान रेडियो पर गाने का मौका मिला उसके बाद फिर सब कुछ आसान होता चला गया । शास्त्रीय संगीत में रूचि रखने वाले जालंधर निवासी एक बुजुर्ग बी एस नारंग ने बताया, अंतिम बार जब वह जालंधर आए थे तो गाते गाते उनके सीने में दर्द उठा। वह रूक गए। जांच हुई और जब आराम लगा तो लोगों ने हाल चाल पूछा।
हसन ने कहा, जाम टकराना छोड़ दिया इसलिए सीने में दर्द उठा है । मेहदी हसन कई बार जालंधर आए । एक बार जब वह जालंधर आए थे तो उनका कार्यक्रम अब बंद हो चुके और टूट चुके लाल रतन थियेटर में हुआ था । उसमें उन्होंने एक गाना गाया था जो आज भी उस दौर के लोगों को याद है जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा । वर्ष 1979 में मेहदी को जालंधर में के एल सहगल पुरस्कार से नवाजा गया था।


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