'फ़िल्मों में टिकना है तो धैर्य चाहिए'

मुख्य भूमिका में न होने के बावजूद छोटे से रोल में ही मंजरी फडनिस अपनी मौजूदगी दर्ज करवा गईं. मंजरी कहती हैं कि फ़िल्मों में टिकना है तो बहुत धैर्य रखना पड़ता है. उनके लिए सफलता का फ़ॉर्मूला है 99 फ़ीसदी मेहनत और एक फ़ीसदी किस्मत.
बीबीसी ने मंजरी फडनिस से बात की:
आपको सबसे पहले 2004 में फ़िल्म 'रोक सके तो रोक लो' में देखा था, सनी दयोल भी थे उसमें. उसके बाद आप ज़्यादा नज़र नहीं आईं. फिर पिछले साल मुंबई सालसा आई और अब 'जाने तू या जाने न' में नज़र आई हैं. इस बीच फ़िल्में क्यों नहीं कीं?
मैने बहुत सोच समझकर कुछ साल काम नहीं किया. मेरी पहली फ़िल्म चली नहीं थी. मैं चाहती थी कि एक ताज़गी के साथ लौटूँ. अगर मैं लगातार सुर्खि़यों में रहती और कई फ़िल्मों में काम करती तो ऐसा नहीं हो पाता. मैं एक अच्छी फ़िल्म का इंतज़ार करना चाहती थी. इसलिए फ़िल्में करने के बजाय मैने दो साल तक ख़ुद को संवारा.. मैने बहुत फ़िल्में देंखी, शामक दावर के इंस्टीट्यूट से डांस सीखा और वज़न कम किया क्योंकि मैं मोटी थी.
रोक सको तो रोक लो के बाद मैने जो पहली हिंदी फ़िल्म साइन की थी वो जाने तू ही थी. लेकिन ये रिलीज़ बाद में हुई.
आपके किरदार को 'जाने तू या जाने न' में बहुत पसंद किया गया. फ़िल्म की ख़ासियत शायद यही थी कि इसमें हर किरदार अपनी छाप छोड़ जाता है चाहे उसका रोल छोटा हो या बड़ा.
इसके लिए मैं फ़िल्म के निर्देशक अब्बास टायरवाला का शुक्रिया करना चाहूँगी, उन्होंने जो स्क्रिप्ट लिखी थी उसका कमाल था. उनकी यही ख़ासियत है. अब्बास कहानी में जितने भी किरदार गढ़ते हैं वो उभरकर सामने आते हैं- चाहे वो मुख्य किरदार हो या सह कलाकार. इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर उन्होंने बहुत रिसर्च किया था.
फ़िल्म के सभी सितारे युवा थे, जाने तू...में सब लोगों की केमिस्ट्री देखकर लगता है कि असल में भी शूटिंग के दौरान आप लोगों ने काफ़ी मज़ा किया है.
पूरी स्टारकास्ट ही यंग थी, ऊर्जा से भरपूर. हर कोई दुनिया को दिखाना चाहता था कि हम भी कुछ कर सकते हैं. यही ऊर्जा और उत्साह स्क्रीन पर झलकता है.
शूटिंग का अनुभव बहुत अच्छा था. जब असल ज़िंदगी में केमिस्ट्री इतनी बेहतरीन हो तो ये स्वभाविक है कि वो पर्दे पर भी नज़र आती है.
फ़िल्म की शूटिंग से पहले हम लोग एक वर्कशॉप के लिए पंचगनी गए थे. वहाँ हम सब लोगों की ख़ूब जमी. हम लोगों को एक दूसरे का असली नाम लेने की इजाज़त नहीं थी. जैसे मैं इमरान को जय कहती थी ( फ़िल्म में जो उनका नाम था), जिनिलिया को अदिति कहती थी और मुझे सब लोग मेघना कहकर बुलाते थे. काम भी किया और मस्ती भी की.
आमिर खान ने फ़िल्म का निर्माण किया है. उनकी छवि परफ़ेक्शनिस्ट वाली है. क्या आपके मन में कुछ आशंका या डर था उनके साथ जुड़ने में.
अब्बास इतने अच्छे निर्देशक हैं कि आशंका का सवाल ही नहीं उठता. जब मैं ऑडिशन के लिए गई थी तो जिस तरीके से अब्बास मुझे चीज़ें समझा रहे थे तभी मुझे लग गया था कि अब्बास बहुत सुलझे हुए हैं और उन्हें पता है कि मुझसे कैसे काम लेना है. बतौर कलाकार हम शूटिंग से पहले कुछ होमवर्क करते हैं लेकिन इस फ़िल्म में हमें होमवर्क की भी ज़रूरत नहीं पड़ी. पूरा होमवर्क अब्बास ने पहले ही करके रखा था.
फ़िल्म की सफलता के बाद क्या बतौर अभिनेत्री आपकी तरफ़ लोगों का नज़रिया बदला है.
लोग अब मुझे थोड़ी गंभीरता से लेने लगे हैं. बाहर जाती हूँ तो आम दर्शक मुझे पहचानते हैं. ये देखकर अच्छा लगता है.
किसी भी नए कलाकार के लिए बॉलीवुड में आकर पैर जमा पाना , क्या ये मुश्किल काम है?
| फ़िल्म उद्योग में प्रतिस्पर्धा इतनी ज़्यादा है कि अपनी जगह बनाना मुश्किल हो जाता है. न जाने कितने हुनरमंद लोग एक ब्रेक में इंतज़ार में रहते हैं. ख़ासकर अगर आप ग़ैर फ़िल्मी पृष्ࢠभूमि से आते हैं तो और भी मुश्किल हो जाता है. यहाँ आकर आपको बहुत धैर्य रखना पड़ता है. यहाँ किस्मत का भी बड़ा हाथ है. 99 फ़ीसदी मेहनत और एक फ़ीसदी किस्मत |
आपके घर के लोगों का फ़िल्मों से कोई लेना-देना नहीं था तो आप फ़िल्म उद्योग में कैसे आईं.
आर्मी में कई जगहों पर रहना पड़ता है, कई संस्कृतियाँ देखने को मिलती हैं. इसका फ़ायदा ये है कि जब आप अभिनय करते हैं तो आप किसी भी हालात में आसानी से ढल जाते हैं.
कोई ख़ास अभिनेता जिनके साथ काम करना चाहती हों?
मुझे रिचर्ड गीयर के साथ काम करना है. बॉलीवुड में मुझे शाहरुख़ खान, ऋतिक रोशन, अभिषेक बच्चन......हर किसी की साथ. लंबी लिस्ट है.
आपने बांग्ला फ़िल्म में भी काम किया है?
मैने बंगाली फ़िल्म फालतू में काम किया है जिसे हाल ही में राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया गया था.
अब कौन सी फ़िल्म आने वाली है?
मेरी हिंदी फ़िल्म आएगी आई एम 24. इसमें रजत कपूर, रणवीर शूरी, नेहा धूपिया और विजय राज़ काम कर रहे हैं. मैं अच्छी फ़िल्म का इंतज़ार कर रही हूँ.


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